{"_id":"5ed1b65a8ebc3e90501834f2","slug":"revolution-on-work-from-home-mode","type":"story","status":"publish","title_hn":"वर्क फ्रॉम होम मोड पर क्रांति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
वर्क फ्रॉम होम मोड पर क्रांति
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
प्रतीकात्मक तस्वीर
सोशल मीडिया की गोद में लोरी सुन रहे बुद्धिजीवी देश में कोरोना के पीक पर पहुंचने का उसी तरह इंतजार कर रहे हैं, जैसे कोई ऊंचे पुल पर बैठा नदी की बाढ़ के विकराल होने का इंतजार करता है। पुल पर पानी आएगा, तभी वे बाढ़ की विभीषिका को महसूस करेंगे। पुल पर पानी से कमतरीन बाढ़ उन्हें विभीषिका नहीं लगती।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सियासत को नाबदान का कीड़ा समझने वाले ये लोग आम आदमी को भी अपने मकान के नाबदान में रखते हैं! आजादी के बाद से ही इन्हें शिकायत रही है कि आम आदमी ही क्रांति में रोड़ा है। बीमार परिजनों को लेकर श्रमिक सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल लेंगे, पर क्रांति नहीं करेंगे।
ये श्रमिक समस्त क्रांतियों को पलीता लगा रहे हैं। बुद्धिजीवी इन श्रमिकों की नादानी पर रोज लेख लिखकर डस्टबिन में डाल देते हैं। बुद्धिजीवियों में इस कदर गुस्सा है कि लॉकडाउन न हुआ होता, तो इस श्रमिक को पकड़ कर डस्टबिन में फेंक देते! बुद्धिजीवियों को यह भ्रम भी है कि उनका इल्म-ए-सेहत इतना पुख्ता है कि महामारी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। बहरहाल यह तय है कि सियासत के पीक पर पहुंचने के बाद अब देश में यह बीमारी जल्दी ही पीक पर पहुंच जाएगी। सियासत से वह ऑक्सीजन खींच रही है!
देश के बुद्धिजीवियों की दिक्कत यह है कि ग्लोबल वार्मिंग पर लिखे उनके लेख इस दौर में रिडक्शन सेल में भी नहीं बिक रहे! उनका प्रिय विषय ओजोन की परत में छेद निस्तेज हो गया है, क्योंकि यह छेद अपने आप भरने लगा है। जैविक खेती हो या बीटी बैंगन या पर्यावरण, इन बुद्धिजीवियों ने सभी मसलों पर अपने एनजीओ के जरिये सेमिनार लगाए थे।
मगर लॉकडाउन में पर्यावरण इस कदर शुद्ध हुआ है कि तेंदुए शहर में घूमने लगे हैं। अब इन चिंतकों के एनजीओ भोजन के पैकेट बांटने तक सीमित रह गए हैं। गुजिश्ता वक्त में जिस इंडेक्स के सहारे ये अग्रिम पंक्ति में बैठे थे, इस बीमारी ने उसे बेमानी कर दिया। अब पहली पंक्ति में वह सफाईकर्मी आ बैठा है, जिसे कोरोना वॉरियर्स कहा जाता है। पिछली पंक्ति में बैठे बुद्धिजीवी लिखते-लिखते ठिठक पड़ते हैं।
उधर सियासत का थिसारस इस महामारी में भी वर्णनात्मक बना हुआ है। वहां परिस्थितियों के अनुसार अर्थ संकोच और अर्थ विस्तार को जगह देने की परंपरा कायम है। देश के तमाम 'एक्सप्रेस वे' चीख-चीखकर कह रहे हैं कि वे हवाई जहाज को सुरक्षित उतार सकते हैं, पर पैदल चलते श्रमिकों को सुरक्षित पहुंचाने की गारंटी नहीं लेते। सियासत के बस में कुछ नहीं है, इसलिए वह 'बस' के जरिये त्वरा दिखा रही है। महामारी हो या सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा, दोनों ही स्थितियों में सांस उखड़ जाती है।
समूचे सिस्टम पर फाजिल गिरा है। मुकद्दस नाम लेकर जय बोलने वाले नदारद हैं। भून देने वाली धूप में कोई सियासी नुमाइंदा सड़क पर नहीं उतरता। कलफ लगे कुर्ते-पाजामे अलमारियों में टंगे हैं। देश में ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ का सिद्धांत पूरी तरह तारी है। बहाना लाइलाज महामारी का है। श्रमिकों के नाजिम नदारद हैं। कल फिर प्रलोभनों के पैकेज के साथ उपस्थित हो जाएंगे।
सड़क पर पैदल चल रहे बच्चों की सूटकेस यात्रा फोटो खींचने के काम आती है, जिसे सोशल मीडिया की गोद में बैठे बुद्धिजीवी अपनी पोस्ट के साथ अटैच करते हैं। सड़क के कारुणिक दृश्यों के वीडियो बनाने वाला एसी कार में बैठकर निकल लेता है। बुद्धिजीवियों को ऐसे दृश्य विचलित नहीं करते, बोर करते हैं। एक ही थीम पर बनी फिल्में कब तक देखें? शादी के गिद्ध भोजन पर व्यंग्य लिखने वाले भोजन के लिए लाइन लगाकर जद्दोजहद करते मुफलिसों पर नहीं लिख रहे।
बुद्धिजीवियों को पूरा विश्वास है कि पुराने दिन लौटेंगे। उन्हें फिर से पहली पंक्ति में बैठने का मौका मिलेगा। ये बुद्धिजीवी चार किसानों के आंदोलन में ही उनके साथ धरने पर बैठ जाते थे। कारखानों के बाहर श्रमिकों के साथ नारा लगाते हुए पाए जाते थे। सड़क पर रोज हजारों श्रमिक पैदल जा रहे हैं, तो क्या बुद्धिजीवी उनके साथ चल पड़ें? नहीं, यह प्रैक्टिकल नहीं है। कोरोना वायरस के वाहक श्रमिकों से उन्हें खतरा लगता है। कोरोना काल में क्रांतियां भी वर्क फ्रॉम होम मोड पर हैं। वे घर बैठकर क्रांति कर रहे हैं।