सपनों का गणतंत्र या दहशत का?
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वर्ष 2014 में प्रकाशित अपनी किताब, द ट्रू अमेरिकन ः मर्डर ऐंड मर्सी इन टेक्सास, में लेखक और न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार आनंद गिरिधरदास ने दो अमेरिका और वहां के दो जीवन की ऐसी कहानी सामने रखी थी, जो बड़ी क्रूर तरीके से एक दूसरे से टकराते हैं। उन्होंने इसे 'सपनों का गणतंत्र' और 'दहशत का गणतंत्र' बताया था। अमेरिका की दुविधा वस्तुतः भारत का भी यथार्थ है। करीब सवा अरब के इस देश में क्या सपने यथार्थ में बदल सकते हैं, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा दहशत में जीता हो? उनका भय इस पर है कि अगर वे अपनी व्यक्तिगत रुचि को तरजीह देने लगें, चाहे वह उनका भोजन हो या सोच, तो उसका क्या नतीजा होगा!
पिछले दिनों कैलिफोर्निया के सेन जोस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब डिजिटल इंडिया का नारा दिया था, तब सपनों का भारत न केवल अखबारों की सुर्खियां बना था, बल्कि प्राइम टाइम टेलीविजन में भी इसे इतना ही महत्व दिया गया था। तकनीकी क्षेत्र के दिग्गजों से बात करते हुए, जिनमें से अधिकतर भारतवंशी थे, नरेंद्र मोदी ने तब डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान से समृद्ध अर्थव्यवस्था के अपने नजरिये के बारे में बताया था।
जिस देश में हजारों गांवों में अभी तक बिजली नहीं पहुंची है, वहां यह सोच दूर की कौड़ी ही ज्यादा लगती है। लेकिन सपनों की भी ताकत होती है। मोबाइल कनेक्टविटी और इंटरनेट से देश के कई हिस्सों में क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। और सपनों की ताकत ने ही सुंदर पिचाई और सत्या नडेला जैसी शख्सियतों को शिखर पर पहुंचाया है; इनमें से एक गूगल के सीईओ हैं, दूसरे माइक्रोसॉफ्ट के। ये दोनों ही साधारण परिवारों से थे, लेकिन अपनी प्रतिबद्धता, कठिन परिश्रम और जिद से वे अपने सपनों को साकार कर पाए।
आज के भारत में सपने देखने वालों के लिए अवसरों की कमी नहीं है। गूगल ने भारत के पांच सौ रेलवे स्टेशनों में मुफ्त वाई-फाई मुहैया करने की घोषणा की है, जबकि माइक्रोसॉफ्ट ने इस देश के करीब पांच लाख गांवों में कम लागत में ब्रॉडबैंड तकनीक देने की बात कही है।
लेकिन दहशत में जी रहे लोगों के लिए सपनों का क्या मतलब है? इस सप्ताह उत्तर प्रदेश में ग्रेटर नोएडा के दादरी स्थित बिसाहड़ा गांव के एक व्यक्ति मोहम्मद इकलाख की इस अफवाह पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई कि उन्होंने गोकशी की थी और उनके घर में गोमांस है। उनके बेटे को भी निर्ममता से पीटा गया, जो इस समय अस्पताल में है। इकलाख के हत्यारों ने उसके घर के फ्रिज तोड़ दिए तथा घर की महिला सदस्यों को भी निशाना बनाया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, स्थानीय मंदिर से एलान करके भीड़ इकट्ठा की गई।
उस 'मांस' की फोरेंसिक वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं। दूसरी ओर इकलाख की विलाप करती हुई बेटी साजदा सवाल करती है कि अगर जांच में साबित हुआ कि वह मांस बीफ नहीं था, तो क्या वे लोग मेरे मृत पिता को वापस ला देंगे? इस हत्याकांड से जुड़े छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और गोमांस की राजनीति एक बार फिर केंद्र में है। पर सबसे परेशान करने वाली बात है भय का पसरता हुआ माहौल। इकलाख के परिवार के लोग अपने रिश्तेदारों के संपर्क में हैं, और शायद वे बिसाहड़ा छोड़कर किसी दूसरे सुरक्षित गांव में चले जाएंगे। वायुसेना में नौकरी करता इकलाख का एक बेटा चेन्नई में रहता है। वह शायद अपने परिवार को वहां ले जाए।
गोकशी पर उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में प्रतिबंध है। यह पहली बार नहीं है, जब इस भावनात्मक मुद्दे पर किसी की हत्या हुई है। लेकिन बिसाहड़ा की यह घटना ठीक तब हुई है, जब लोगों की व्यक्तिगत पसंद पर लगातार हो रहे हमलों से भय का माहौल पहले से ही बना हुआ था। एक के बाद एक कई तर्कवादियों की सिर्फ इसलिए हत्या की गई, क्योंकि वे अपनी बातों पर अड़े रहे। लोगों के खान-खान पर प्रतिबंध लगाने की कई घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि एक आदमी क्या खाता है, यह अब उसका व्यक्तिगत मामला नहीं है। ऐसे समूहों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता, जिनके खाने, सोचने, महसूस करने, पूजा करने, पढ़ने-लिखने का तरीका बहुसंख्यक समाज से अलग है, सपनों के गणतंत्र के बजाय दहशत के गणतंत्र के बारे में ही ज्यादा बताती है।
सपने उन्हीं के साकार होते हैं, जो न सिर्फ सपने देखते हैं, बल्कि उन्हें पूरा करने के लिए बाधाओं की भी परवाह नहीं करते। गांवों और छोटे शहरों के हजारों युवक-युवतियों ने आने वाले अच्छे दिनों का सपना देखा है। अनेक लोग सिलिकॉन वैली में पहुंचने का सपना देखते हैं। लेकिन भय के माहौल में सपने दुःस्वप्न में तब्दील हो जा रहे हैं। आज हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारत की करीब पांच हजार साल पुरानी सभ्यता इसीलिए इतनी विशिष्ट रही कि इसने हर आदमी, हर विश्वास और हर आदत का स्वागत किया। जैसा कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी चर्चित कविता भारत तीर्थ में लिखा है, यह एक ऐसा देश है, जहां हर नस्ल के लोग आकर एक शरीर से जुड़ गए। ऐसे में, अगर शरीर का एक हिस्सा लगातार भय में जीए या उसे शरीर से अलग कर देने की सोच पैदा होने लगे, तो यह भारत स्वस्थ नहीं रहेगा।