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गणतंत्र दिवस: नई चुनौतियों के बीच, जीवंत स्वरूप के मूल्यांकन का समय
Mon, 26 Jan 2026 07:17 AM IST
पवन पांडेय
अमर उजाला
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Published by: पवन पांडेय
Updated Mon, 26 Jan 2026 07:17 AM IST
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सार
भारत का 77वां गणतंत्र दिवस हमें संविधान के साथ-साथ उसके जीवंत और मजबूत स्वरूप पर विचार करने का अवसर देता है। दुनिया के कई गणतंत्र राजनीतिक, सैन्य या वैश्विक दबावों में कमजोर दिखते हैं, जबकि भारत अपनी संस्थागत परिपक्वता, संवैधानिक निरंतरता और नागरिक चेतना के कारण स्थिर बना हुआ है।
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देश में गणतंत्र दिवस की धूम
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विस्तार
आज जब भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, तब यह अवसर सिर्फ संविधान को स्मरण करने का नहीं, बल्कि उसके जीवंत स्वरूप के मूल्यांकन का भी है। दुनिया भर के गणतंत्रों में जो स्थितियां बन रही हैं, उस संदर्भ में हमारा लोकतंत्र बाकियों की तुलना में अधिक मजबूत नजर आता है। जाहिर है कि हममें कोई तो शक्ति निहित है, जिसकी बदौलत न तो बाहरी दबाव और न ही आंतरिक चुनौतियां इसे विचलित कर पा रही हैं।हमारे गणतंत्र की वास्तविक स्थिति समझनी हो, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे तथाकथित घोषित गणतंत्रों की ओर देखना ही पर्याप्त है, जहां लोकतांत्रिक संस्थाएं बार-बार सैन्य या राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार होती रही हैं। दूसरी तरफ, वेनेजुएला और यूक्रेन जैसे देश हैं, जहां चुनाव तो होते हैं, लेकिन वैश्विक शक्तियां अपने हितों के अनुसार उन्हें दबाए रखती हैं। इसके उलट, भारत में कुछ बात तो है कि उस पर कोई हाथ तक नहीं डाल पाता। यह ‘कुछ बात’ हमारी संस्थागत परिपक्वता, सांविधानिक निरंतरता और नागरिकों की लोकतांत्रिक चेतना का सम्मिलित परिणाम है।
हालांकि गणतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की सुरक्षा और सम्मान से भी मापी जाती है। ग्रेटर नोएडा में हाल ही में युवा पेशेवर के साथ हुआ हादसा संविधान की भावना पर ही प्रश्नचिह्न लगाता है। इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में सरकार ने पुराने श्रम कानूनों की जगह चार नई श्रम संहिताएं लागू करने की घोषणा की है, जिसे स्वतंत्रता के बाद श्रमिकों के लिए सबसे बड़े और प्रगतिशील सुधारों में से एक माना जा रहा है।
यह गणतंत्र दिवस हमें संघीय ढांचे की चुनौतियों पर सोचने के लिए भी बाध्य करता है। दक्षिण के राज्यों में राज्यपाल और निर्वाचित मुख्यमंत्रियों के बीच बढ़ते टकराव ने सांविधानिक मर्यादाओं पर बहस को और तेज कर दिया है। दोनों को ही समझना होगा कि हमारा गणतंत्र तभी मजबूत रहेगा, जब केंद्र और राज्य, दोनों एक-दूसरे के अधिकारों और सीमाओं का सम्मान करेंगे। गणतंत्र की मजबूती का एक और पैमाना हमारी वैश्विक भूमिका भी है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते को लेकर यूरोपीय देशों का संघ जिस तरह से उत्साहित है, वह वैश्विक पटल पर भारतीय बाजारों की ताकत को ही दर्शाता है। आज जब दुनिया भर के लोकतंत्रों पर अविश्वास बढ़ रहा है, चुनावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं और संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं, हमारा गणतंत्र एक अपवाद की तरह दिखता है।