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स्मरण: अनूठे पत्रकार थे हरीश चन्दोला, कम उम्र में ही नाप लिए थे देश के कई कोने
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पत्रकार हरीश चन्दोला
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सोशल मीडिया
विस्तार
हरीश चन्दोला (छह मार्च 1929-26 मार्च 2023) के निधन के साथ उस युग का अंत हो गया, जो युग राष्ट्रीय संग्राम की आखिरी लहरों के साथ शुरू हुआ था। मौजूदा उत्तराखंड में गढ़वाल जिले के डोलिंडा पल्ला गांव में जब उन्होंने जन्म लिया था, तब सविनय अवज्ञा आंदोलन करीब था। बचपन में हरीश ने गांव में हैजे से मरते लोग देखे थे।
प्रतिभाशाली हरीश का सामान्य ज्ञान औसत से उपर था। वर्ष 1936 में स्कूल की पत्रिका में उनकी कहानी छपी, फिर लिखने में रुचि बढ़ती गई। वर्ष 1937 में उन्होंने पौड़ी में नेहरू को देखा, तो विश्वयुद्ध में हजारों पहाड़ी युवकों को जाते भी। 1942 के आंदोलन में स्थानीय संग्रामियों के गिरफ्तार होने पर उनके पीछे जुलूस बनाकर चलने वाले छात्रों में वह भी थे। हाई स्कूल करते ही उनकी सरकारी नौकरी ताऊ ने लगा दी। उन्होंने इंटर किया, फिर बीए करने इलाहाबाद गए।
वर्ष 1950 में वह दिल्ली आकर सीधे हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक देवदास गांधी से मिले, फिर उनके संपादकीय सहायक बने। उनके साथ तब एस मुलगांवकर, दुर्गादास और कुलदीप नैयर भी थे। जून, 1952 में संपादक से सहमति लेकर वह भोटिया व्यापारियों के साथ माणा दर्रे से तिब्बत गए।
तिब्बत में सड़क निर्माण और बनती फौजी छावनियों को देख आए हरीश से लेख की मांग किसी ने नहीं की। उनके सहयोगी सोच रहे थे कि वह जिंदा भी है कि नहीं! 1954 में वह फिर तिब्बत गए। इस बार सेना और कैंपों से बचते रहे। पर तिब्बत में हो रहे बदलाव को पकड़ना उनके लिए मुश्किल न था। सेना और कैंपों में वृद्धि देखी। दिल्ली वापसी में इंदिरा गांधी से मुलाकात हुई, तो उन्होंने यह सब बताया। उनके अखबार ने इस बार भी उनसे लिखने को नहीं कहा। लेकिन स्टेट्समैन के अपने मित्र के कहने पर जब उन्होंने वहां लिखा और लंदन आब्जर्वर ने भी उसे छापा, तो उनसे जवाब-तलब किया गया। ऐसे में, टाइम्स ऑफ इंडिया उनका दूसरा अखबार बना। 1956 में बुद्ध परिनिर्वाण के 2,500 साला समारोह में दलाई लामा के भारत आने पर उन्होंने लिखा। इसी बीच असम, नेफा और नगालैंड हो आए। परमिट लेकर बमडीला से पैदल चले। पासीघाट, कोहिमा और मुकुकचांग होकर दिल्ली लौटे।
उनकी उस रिपोर्ट की अधिक चर्चा हुई, जिसमें इसका जिक्र था कि सेना की अति उपस्थिति और नौकरशाही की जिद के कारण कैसे नेहरू को मांगपत्र सौपने का समय न देने और लाठीचार्ज के कारण नगा समुदाय 30 मार्च, 1953 को कोहिमा की उस सभा से उठकर जाने लगा था, जिसमें नेहरू बर्मा के प्रधानमंत्री के साथ पहुंचे थे। उस समाचार को सरकारी विभागों ने सेंसर किया था।
वर्ष 1954 में वह वियतनाम, कंबोडिया, लाओस ओर चीन की यात्रा पर गए। 25 साल के चंदोला तब देश के सबसे अधिक घूमे हुए पत्रकार थे। कठिन इलाकों में जाने वाले वह अकेले थे और उन्हें दक्षिण पूर्व एशिया का जानकार माना जाने लगा। वर्ष 1955 में लंदन के टाइम्स और एडिनबर्ग के द स्कॉट्समैन ने ब्रिटिश उच्चायुक्त के माध्यम से उन्हें अपने यहां काम करने का न्योता दिया। वह साल भर से ज्यादा इन दोनों अखबारों में बारी-बारी रहे।
भारत लौटने पर 1959 में उन्हें दलाई लामा के भारत आगमन और ल्हासा-तिब्बत के हाल जानने और लिखने का काम सौपा गया। फिर उन्हें पूर्वोत्तर भारत का प्रतिनिधि बनाकर शिलांग भेजा गया। उन्होंने नगा भूमिगत आंदोलन तथा अन्य आंदोलनों की रिपोर्टिंग की। उन्होंने पूर्व और वर्तमान नगा तथा अन्य नौकरशाहों द्वारा बिना भूमिगत नगाओं से संवाद किए नगालैंड को केंद्र शासित प्रदेश बनाने को समस्या का हल नहीं माना।
उन्हें दिल्ली बुला लिया गया और उनकी रिपोर्टों को भी कम महत्व दिया जाने लगा। तभी उनके पुराने संपादक फ्रैंक मोरेस द इंडियन एक्सप्रेस के संपादक बने, तो वह काहिरा में उसके संवाददाता बन गए और वहां से मिस्र के साथ केन्या, रोडेशिया, जांबिया आदि अनेक अफ्रीकी देशों व क्षेत्रों तथा अल्जीरिया युद्ध को कवर किया।
जवाहरलाल नेहरू के देहांत के बाद लालबहादुर शास्त्री ने उन्हें नगा शांति वार्ता का जिम्मा दिया, पर नौकरशाही तथा नए राज्यपाल बीके नेहरू ने उन्हें काम नहीं करने दिया और उन्हें गिरफ्तार किया गया। पहली बार जब उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास हुआ था, तो एक नगा ने उनसे अपनी बेटी का विवाह कर इतिहास रचा था। दूसरी बार एक और नगा बुजुर्ग ने उन्हें अपना बेटा बनाया और उनकी गिरफ्तारी न होने देने की कोशिश की।
वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी पर उन्हें फिर बुलाया गया, पर अब नौकरशाही के कारण उनकी बड़ी भूमिका नगा मामले में नहीं रह गई थी। वर्ष 1993 में वह पहाड़ पर लौटे और जोशीमठ में मकान बनाया। वर्ष 1994 में उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को देखा और उस पर लिखा। मैंने नगालैंड के खोनोमा गांव में उनकी ससुराल और फिजो का बंद घर देखा था। हममें से कोई उनकी सादगी और मुस्कान नहीं भूलेगा।