धर्म ही सच्चा साथी है

शिवकुमार गोयल Updated Fri, 25 Oct 2013 07:03 PM IST
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आचार्य बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। वह देवताओं से कहा करते थे, दुर्जनों की संगति तथा अहंकार से अनेक जन्मों के संचित पुण्य भी क्षीण हो जाते हैं। दुर्व्यसनी का साथ कभी नहीं करना चाहिए। साधु जनों और सत्य पर अटल रहनेवालों का सत्संग कर ही लोक-परलोक सुधारा जा सकता है।
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एक बार युधिष्ठिर बृहस्पति जी के सत्संग के लिए पहुंचे। उन्होंने पूछा, देवगुरु, मनुष्य का सच्चा सहायक कौन है? आचार्य बृहस्पति ने बताया, राजन, प्राणी अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही दुख से पार होता है और अकेला ही दुर्गति भोगता है।
कुटुंबजन तो मरते ही दो घड़ी रोते हैं, श्मशान में उसे अग्नि के हवाले कर वहां से मुंह फेरकर चल देते हैं। एकमात्र धर्म-सत्कर्म ही उस जीवात्मा का अनुसरण करता है। धर्म ही हमेशा सच्चा सहायक बना रहता है। अतः किसी भी कुटुंबजन के मोह में फंसकर कोई भी धर्म विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए।
धर्मनीति के तत्व रहस्य को बताते हुए आचार्य बृहस्पति ने कहा, जो बात खुद को अच्छी न लगे, वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिए। जिस प्रकार हमें कटु वचन और निंदा से दुख होता है, उसी प्रकार किसी की न तो निंदा करें, न कटु वचन बोलें और न ही किसी का अहित करें। यही धर्म तत्व है।

युधिष्ठिर की जिज्ञासाओं का समाधान हो गया।
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