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क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत
अरुण नेहरू
Updated Sat, 09 Feb 2013 12:49 AM IST
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आगामी लोकसभा चुनाव-2014 से संबंधित मेरे पहले के आकलन से मौजूदा आकलन में थोड़ा अंतर है। लेकिन मुझे लगता है कि कांग्रेस (140 सीट) एवं भाजपा (130 सीट), दोनों के लिए संभावित गठजोड़ की दिशा में थोड़ा आगे बढ़ने का वक्त आ गया है। जहां तक क्षेत्रीय दलों (260 सीट) का सवाल है, वे तीन बड़े समूहों में बंटेंगे।
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इनमें से एक समूह का नेतृत्व मुलायम सिंह करेंगे, तो दूसरे का जयललिता करेंगी, और तीसरे समूह में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, मायावती और जगन मोहन रेड्डी शामिल होंगे। इसमें कई छोटे-छोटे दल भी, जो या तो कांग्रेस या भाजपा या किसी भी क्षेत्रीय दलों के समूह में जा सकते हैं, शामिल होंगे। लेकिन यह सब कुछ 2014 के चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा।
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कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है। पार्टी की कमान जहां सोनिया गांधी के हाथों में है, वहीं चुनावी अभियान का नेतृत्व पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी करेंगे। उनकी टीम ने मोर्चा संभाल लिया है। उनका उद्देश्य राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत बनाना है। समझदारी इसी में होगी कि वे इस मसले पर फूंक-फूंककर कदम आगे बढ़ाएं। जबकि भाजपा शीर्ष नेतृत्व को लेकर लगातार जूझ रही है।
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नए पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के मसले पर पार्टी नेताओं को चुप कराने के लिए एक आदेश जारी किया है, जो टिकने वाला नहीं है। साफ है कि भाजपा थोड़े समय के लिए इस बहस को स्थगित रखने की कोशिश कर रही है। राजस्थान में वसुंधरा राजे को पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त कर बेशक पार्टी ने सही फैसला किया है, लेकिन क्या यह निर्णय चुनाव के समय पार्टी के अंदरूनी मतभेद को खत्म कर पाएगा?
ऐसी चर्चा है कि मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश में जनाधार खो रहे हैं। राज्य में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बेशक कुछ गड़बड़ियां हैं, लेकिन उससे पार्टी को बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होने वाला और वह लोकसभा चुनाव में आसानी से 25 से 30 सीटें जीत सकते हैं। मुलायम सिंह के नेतृत्व वाला क्षेत्रीय दलों का समूह छोटे-छोटे दलों के साथ 60 से 70 सीटें जीत सकता है।
नेताजी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी हैं। स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर के बाद कुछ ही लोग होंगे, जो उनकी तरह राजनीति को समझते हों। जहां तक वाम मोर्चे का सवाल है, तो वह पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में बेहतर प्रदर्शन करते हुए 30 सीटें जीत सकता है।
क्षेत्रीय दलों के दूसरे समूह का नेतृत्व करने वाली जयललिता की शीर्ष प्राथमिकता तमिलनाडु में अपनी स्थिति मजबूत करने की होगी। वह अपने दम पर 25 से 30 सीटें जीतकर एक प्रबल दावेदार के रूप में उभरेंगी। गठबंधन का पैटर्न तो पहले ही राज्य में बदल रहा है। जैसे ही द्रमुक के सामने अपने अस्तित्व की लड़ाई होगी, वह डीएमडीके के साथ गठजोड़ करेगी। इससे कांग्रेस पर दबाव पड़ सकता है, लेकिन जिस तरह से घटनाक्रम आकार ले रहा है, उसमें अन्नाद्रमुक का मजबूत स्थिति में उभरना तय है। उसे बीजद और एक अन्य पार्टी का समर्थन मिलेगा। यह समूह भी 60 से 70 सीटें जीत सकता है।
बिहार में नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी के पास भारी संख्या में अल्पसंख्यक मत हैं और ये ऐसे क्षत्रप हैं, जिनके नेतृत्व में भावी लड़ाई लड़ी जा सकती है और जो भविष्य में अपनी दावेदारी जता सकते हैं। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं और जद (यू) को इस लड़ाई में प्रासंगिक बने रहने के लिए 20 से ज्यादा सीटों की जरूरत है। वह सभी 40 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ सकती है और झारखंड में भी उपस्थिति का एहसास करा सकती है, जहां गठजोड़ के लिए मैदान खुला है।
कांग्रेस के साथ झगड़े के बाद ममता बनर्जी के पास सीमित विकल्प हैं और यदि उनका वोट बैंक वाम दलों के पक्ष में चला गया, तो वह खुलेआम भाजपा के साथ गठजोड़ कर सकती हैं। जैसे-जैसे तृणमूल भाजपा के निकट आती जाएगी, इस बात की ज्यादा संभावना है कि अल्पसंख्यक मत फिर से वाम दलों के खाते में चला जाएगा। और तब कांग्रेस को भी फायदा मिल सकता है। आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस रायलसीमा और तटीय इलाकों में अच्छा करेगी। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि उसने मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन के साथ गठजोड़ किया है।
कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश में एक कोरियाई लड़की के साथ बलात्कार की भयानक खबर आई थी और अब एक 23 वर्षीय चीनी लड़की के साथ। पूरे देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले विभिन्न तरह के अपराधों की घटनाएं मीडिया में छाई हुई हैं। हमारे पास फास्ट ट्रैक अदालतें हैं और हम सौ मीटर दौड़ की तरह चार, छह या दस दिनों में न्याय उपलब्ध कराने की बातें करते हैं। इस बुराई से निपटने के लिए हमारे पास कड़े से कड़ा कानून है।
लेकिन भावनाओं को शांत कर यह सोचने का वक्त है कि जो बीमारी सदियों से है, उसे क्या केवल दंड से खत्म किया जा सकता है। अब जबकि हमारे पास फास्ट ट्रैक कोर्ट है, तब उनके द्वारा सुनाए जाने वाले फैसलों की समीक्षा के लिए फास्ट ट्रैक व्यवस्था भी जरूरी है, क्योंकि जल्दबाजी में फैसले गलत भी हो सकते हैं। ऐसा नहीं होने पर कई निर्दोष न्याय होने तक वर्षों या दशकों उसका खामियाजा भुगतेंगे।