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क्षेत्रीय दलों के बदलते तेवर

नीरजा चौधरी Updated Fri, 09 Feb 2018 06:30 PM IST
मोदी
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भाजपा के कुछ सहयोगियों ने जब अपने तेवर दिखाए, तो भाजपा के लिए कुछ परेशानी पैदा होने लगी। राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी का तीखा भाषण इस चिंता को दर्शाता है। भाजपा के सहयोगी दलों की बेचैनी को जानते हुए नरेंद्र मोदी अपनी चिंताओं से निपटने के लिए अतीत की ओर मुड़े। उन्होंने नाराज तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) को उसके जन्म की परिस्थितियों की याद दिलाई। टीडीपी ने केंद्रीय बजट में आंध्र प्रदेश को असंतोषजनक आवंटन के कारण राजग से बाहर जाने की धमकी दे रखी है और तेलंगाना के गठन के बाद नई राजधानी अमरावती के लिए विशेष पैकेज और धन की मांग कर रही है। जब राजीव गांधी ने आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री टी अंजैया को अपमानित किया था, तो तेलुगु गौरव के मुद्दे पर एन टी रामाराव ने फिल्म छोड़कर टीडीपी का गठन किया था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू अपने राज्य को हल्के में लेने के कारण इतने दुखी थे कि उन्होंने अपने सांसदों को संसद में गुस्सा दिखाने के लिए प्रेरित किया, भले ही उन्हें सदन से निलंबित या निष्कासित ही क्यों न कर दिया जाए। उन्होंने दोनों सदनों में यही किया। टीडीपी को शांत करने के लिए वित्त मंत्री ने आंध्र प्रदेश के लिए अतिरिक्त बजटीय प्रावधान का वायदा किया है।
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उधर भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना ने, जो राज्य में जूनियर पार्टनर होने के कारण कमजोर हो रही है, पहले ही घोषणा कर दी है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले वह भाजपा से अलग होने जा रही है। अकाली दल से भी भाजपा के रिश्ते कभी नरम तो कभी गरम रहते हैं। राजग में नीतीश कुमार के आने के बाद माना जाता है कि भाजपा के छोटे सहयोगी दल-उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी ने राजद के साथ बातचीत के दरवाजे खोल लिए हैं। नीतीश ने भी स्पष्ट रूप से कह दिया है कि वह एक साथ चुनाव कराने के विचार का विरोध करते हैं, जिसके प्रति मोदी सरकार बेहद गंभीर है और जिसका जिक्र बजट सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति ने भी अपने अभिभाषण में किया था। क्षेत्रीय पार्टियां इस विचार को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि उन्हें अंदाजा नहीं कि दीर्घकाल में यह उन पर और हमारी संघीय व्यवस्था पर क्या असर डालेगा।

जब तक भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत ऊंचा था, उसके सहयोगी दल चुप थे, खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद के कुछ महीनों में। पर चीजें अब बदलने लगी हैं, क्योंकि गुजरात चुनाव में भाजपा के लिए उतने अच्छे परिणाम नहीं आए और राजस्थान उपचुनाव में कांग्रेस ने अपने पक्ष में माहौल होने का प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री ने संसद में कांग्रेस को निशाने पर लिया। यह एक बार फिर से स्थितियों पर पकड़ बनाने की कोशिश थी। देर से ही सही, कांग्रेस ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरा, जिसमें 36 जंगी जहाज राफेल के सौदे में कथित घोटाले का भी आरोप है।

गुजरात और राजस्थान के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के निराश नेताओं को बहुत मनोबल दिया है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कांग्रेस ने सभी क्षेत्रीय पार्टियों को अपना यह संदेश दिया है कि जमीनी स्तर पर बदलाव हो सकता है। यह स्वाभाविक है कि जब गठबंधन में बड़ी पार्टी कमजोर होने लगती है, चाहे थोड़ा ही क्यों न हो, तो छोटी पार्टियां दृढ़तापूर्वक अपना दावा जताना शुरू कर देती हैं। भाजपा के मौजूदा सहयोगियों-शिवसेना, अकाली दल और अब टीडीपी के साथ यही हो रहा है।

हालांकि नरेंद्र मोदी अब भी बहुत लोकप्रिय हैं, लेकिन भाजपा के भीतर भी इस तरह की धारणा बन रही है कि वर्ष 2014 की तरह बहुमत हासिल करना अगले लोकसभा चुनाव में आसान नहीं है। इसलिए 2019 में सहयोगी दल ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। भाजपा को अपने मौजूदा सहयोगियों को एकजुट करके रखना होगा और नए लोगों को अपने गठबंधन में शामिल करना होगा। यह कांग्रेस के खिलाफ प्रधानमंत्री के तीखे भाषण का एक और कारण है, ताकि संभावित सहयोगी दलों के लिए वह और ज्यादा अस्वीकार्य बन जाए। स्पष्ट है कि दूसरी तरफ कांग्रेस को किसी भी तरह के गठजोड़ का नेतृत्व करना होगा।

2019 में बड़े राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। क्या अखिलेश यादव और मायावती एकजुट होंगे? (हालांकि दोनों दलों ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है और भाजपा ऐसा न होने देने की कोशिश करेगी।) या क्या शिवसेना के साथ एक रणनीतिक समझदारी बनाकर कांग्रेस व एनसीपी महाराष्ट्र में हाथ मिलाएगी? ऐसा होने पर दोनों राज्यों में भाजपा के लिए मुश्किलें हो सकती हैं। यदि पश्चिम बंगाल के हालिया उपचुनाव से कोई संकेत लें, तो मोदी की प्रखर आलोचक ममता बनर्जी 2019 में भी अपनी पकड़ बनाए रखेंगी, हालांकि भाजपा वहां ताकतवर होती जा रही है। तमिलनाडु में एम के स्टालिन सबसे आगे दिख रहे हैं। कांग्रेस की सहयोगी मानी जाने वाली द्रमुक हो सकता है कि अपने विकल्प खुले रखे, खासकर 2 जी मामले में अपने नेताओं के बरी होने के बाद। उसके नेता हाल में शरद पवार या सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई विपक्ष की बैठक में शामिल नहीं हुए। तेलंगाना राष्ट्र समिति अपने पत्ते खोलने से पहले यह देखेगी कि हवा का रुख किधर है। बिहार में महागठबंधन तोड़कर नीतीश कुमार भले ही राजग में शामिल हो गए हों, पर इससे यादवों, मुसलमानों और कुछ अत्यंत पिछड़ी जातियों में लालू के प्रति सहानुभूति बढ़ी ही है। बेशक वह जेल में हैं, पर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।

गुजरात चुनाव के बाद यह संदेश गया है कि भाजपा उतनी अजेय नहीं है, जैसा कि उसे माना जा रहा था। चूंकि वह प्रधानमंत्री का गृह राज्य है और उन्होंने पूरी ताकत लगाकर भावनात्मक और व्यक्तिगत रूप वह चुनाव लड़ा, इसलिए भाजपा वहां जीत पाई। लेकिन राजस्थान में असंतोष पूरी तरह दिख गया, जैसा कि गुजरात में स्पष्ट था। यह कांग्रेस की तरफ बढ़ते झुकाव का संकेत करता है। कहने की जरूरत नहीं कि अभी यह शुरुआत है, लेकिन राजनीति तेजी से अपना रंग बदलेगी। इसलिए प्रधानमंत्री इतने आक्रामक हो गए हैं। 

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