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घटती विकास दर चिंता का कारण

Fri, 02 Sep 2016 07:27 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 02 Sep 2016 07:27 PM IST
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Reducing growth rate is matter of concern
एम के वेणु

केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार से उम्मीद लगाए बैठे लोग, जो अर्थव्यवस्‍था की मजबूती को लेकर आश्वस्त थे, उन्हें अप्रैल-जून की तिमाही के दौरान 7.1 प्रतिशत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों से जरूर निराशा हुई होगी। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाह का प्रदर्शन ही हताश करने वाला रहा है। जबकि कुछ दिन पहले ही नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया ने कहा था कि इस वित्त वर्ष में भारत आठ फीसदी की दर से आर्थिक विकास करेगा। पनगढ़िया को अपने इस सार्वजनिक दावे पर अब जरूर मलाल हो रहा होगा। अप्रैल-जून के ये आंकड़े सिर्फ भारत की जीडीपी की गिरावट को ही नहीं दर्शाते, बल्कि इससे पता चलता है कि अर्थव्यवस्‍था में निवेश का उपाय माना जाने वाला सकल स्थिर पूंजी निर्माण भी नकारात्मक दिशा में बढ़ रहा है। इससे स्पष्ट रूप से यह भी जाहिर होता है कि निजी निवेश में फिलहाल किसी तरह का सुधार नहीं हो रहा।

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केंद्र सरकार लगातार यह दोहराती रही है कि नए नीतिगत उपायों की वजह से भारत अभूतपूर्व तरीके से सीधे विदेश निवेश आकर्षित कर रहा है। लेकिन मौजूदा हालत सरकार के इन दावों की कलई खोल देती है। अगर एफडीआई प्रवाह वास्तव में बढ़ रहा है, तो निजी निवेश में बढ़ोतरी क्या प्रतिबिंबित नहीं होनी चाहिए?
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यह तो कोई भी कारोबारी बता सकता है कि विदेशी निवेश हमेशा घरेलू निवेश पर ही टिका होता है। पिछले तीस वर्षों में मैंने ऐसा कोई उदाहरण नहीं देखा, जब घरेलू निजी निवेश में बढ़ोतरी न के बराबर होने के बावजूद बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आधारित परियोजनाएं आ रही हों। दरअसल, ये दोनों प्रवृत्तियां सिर्फ एक-दूसरे की पूरक ही नहीं हैं, बल्कि एक साथ चलती हैं।
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ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा आर्थिक गतिविधियों की सबसे बड़ी पहेली तो यही है कि निजी निवेश में बढ़ोतरी लचर है, लेकिन नीति निर्माताओं का दावा है कि प्रत्यक्ष विदेश निवेश में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है? भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में एफडीआई में 2014-15 के मुकाबले 2015-16 में बढ़ोतरी कम रही है। मसलन, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में 2014-15 के दौरान 9.6 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ था, जो 2015-16 में गिरकर 8.44 अरब डॉलर रह गया।

यह सही है कि पिछले दो साल के दौरान सेवा क्षेत्र में एफडीआई का प्रवाह आकर्षक रहा है। एफडीआई का यह प्रवाह मौजूदा ई-कॉमर्स और असूचीबद्ध यूनीकॉर्न उपक्रमों जैसे-ऊबर, ओला, फ्लिपकार्ट इत्यादि में ही था। नई परियोजनाओं में ताजा निवेश के बजाय निवेश की यह प्रवृत्ति वास्तव में पहले से मौजूद उपक्रमों में शेयरों का अधिग्रहण ही है। बाजार के सर्वेक्षकों का कहना है कि मौजूदा वित्त वर्ष में ये निवेश भी वस्तुतः सिकुड़ ही रहे हैं।

मशहूर निवेश सलाहकार कंपनी एम्बिट कैपिटल की एक शोध रिपोर्ट में कहा गया है, 'निजी पूंजीगत व्यय में सुस्त बढ़ोतरी, निजी इक्विटी/उद्यम पूंजी अंतःप्रवाह में गिरावट और बैंक क्रेडिट के अवरोध भरे प्रावधानों के तिहरे झटके की मार से बचाने में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के कारण बना सकारात्मक माहौल और सामान्य मानसून भी पर्याप्त नहीं है।'

शिथिल निजी निवेश और वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान निजी इक्विटी/उद्यम पूंजी अंतःप्रवाह जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों का असर अर्थव्यवस्‍था के सकारात्मक पहलुओं को भी कमजोर कर सकता है। यही कारण है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिश और बेहतर मानसून के बाद ग्रामीण उपभोग में बढ़ोतरी जैसे कुछ सकारात्मक पहलुओं की भूमिका भी कमजोर साबित हो सकती है।

अर्थव्यवस्‍था को सबसे बड़ा झटका निश्चित तौर पर बैंकिंग सेक्टर से लगा है, जहां कॉरपोरेट्स को दिए गए कर्ज के करीब 15 प्रतिशत हिस्से का भुगतान समय पर नहीं हो पा रहा है। इन कॉरपोरेट्स पर बैंकों का करीब 10 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। सरकारी बैंकों की ये गैरनिष्पादित परिसंपत्तियां दरअसल अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़े बोझ की तरह हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के अब तक के लगभग दो साल के कार्यकाल में करीब एक लाख करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिए गए। ऐसी परिस्थितियों में बैंक नई परियोजनाओं के लिए कर्ज देने की स्थिति में नहीं हैं। सही अर्थों में अर्थव्यवस्‍था में सुधार के लिए सरकार को करीब तीन लाख करोड़ रुपये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में प्रवाहित करने होंगे।


फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्‍था कई कारणों से स्थिर बनी हुई है। इसमें भी शक नहीं कि उसकी मौजूदा स्थिति में वैश्विक आर्थिक मंदी का भी कमोबेश असर पड़ा है। ऐसे में 2016-17 की पहली तिमाही में अगर सुस्ती देखने को मिल रही है, तो इस पर इतना हैरान भी नहीं होना चाहिए। वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बारे में पहले ही चेतावनी जारी कर देने के कारण दुनिया भर में सराहे जाने वाले रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ने इस लेखक को बताया, 'मुझे हैरत नहीं है कि जीडीपी के अब तक के आंकड़े इस साल काफी निचले स्तर पर हैं। पिछले वित्त वर्ष में आर्थिक विकास दर में सुधार की एक बड़ी वजह कच्चे तेल और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी गिरावट रही है। अब फायदे का वह दौर खत्म हो चुका है और परिस्थितियां फिर से सामान्य होने जा रही हैं।'

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