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पारस्परिक टैरिफ : रणनीति और नारे के रूप में अच्छा हो सकता है संरक्षणवाद, पर इसकी कोई सीमा तो हो

Pinaki Chakraborty पिनाकी चक्रवर्ती
Updated Fri, 04 Apr 2025 08:19 AM IST
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सार
पारस्परिक टैरिफ लागू किए जाने के दिन (दो अप्रैल को) भारतीय इक्विटी बेंचमार्क में 1.5 फीसदी से अधिक की गिरावट आई। हालांकि, अगले दिन बाजार में 0.78 फीसदी की रिकवरी भी हुई। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से पारस्परिक टैरिफ एक बुरा विचार है, लेकिन भारत पर इसका उतना व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।
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Reciprocal tariffs: Protectionism may be good as a strategy and slogan, but there must be limits
डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI

विस्तार

ट्रंप का टैरिफ वार दुनिया भर में उथल-पुथल मचा रहा है। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में अनिश्चितता पैदा हो गई है और इससे व्यापार युद्ध का खतरा भी पैदा हो गया है। कनाडा और मेक्सिको जैसे चुनिंदा देशों तथा प्रमुख धातु जैसे विशिष्ट क्षेत्रों पर अतिरिक्त टैरिफ थोपे जाने से वैश्विक व्यापार की बदलती प्रकृति के बारे में दुनिया में पहले से ही अभूतपूर्व अनिश्चितताएं पैदा हो गई हैं। इससे वैश्विक आर्थिक भावनाओं पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है। दुनिया भर के शेयर बाजारों में शेयर कीमतों में उतार-चढ़ाव इसी अनिश्चितता का संकेत है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह अभी कुछ समय तक जारी रहने वाला है। अल्पावधि में यह और भी बढ़ सकता है।



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ‘सौदेबाजी’ में विश्वास करते हैं। जैसा कि सर्वविदित है, राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पारित किए गए कई कार्यकारी आदेश परस्पर लेन-देन के दृष्टिकोण और लाभ बनाम हानि के सिद्धांत पर आधारित हैं। कई मौकों पर राष्ट्रपति ट्रंप का यह कदम उचित लग सकता है, लेकिन इसमें कई मौकों पर अनुचित होने का भी जोखिम है। और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका द्वारा किया जा रहा है। हालांकि, फिलहाल यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि आगे क्या होने वाला है, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि संरक्षणवाद की भी एक सीमा होती है।


अमेरिका को फिर से महान बनाने की रणनीति के रूप में ट्रंप का संरक्षणवाद एक नारे के रूप में अच्छा हो सकता है, लेकिन अमेरिकी बाजार में चीन के प्रभुत्व को कम करने के लिए अमेरिका में विनिर्माण को वापस पटरी पर लाना राष्ट्रपति ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा। विनिर्माण की बढ़ती भूमिका के साथ अमेरिकी आर्थिक संरचना को पुनर्गठित करने का काम भी संरक्षणवादी टैरिफ उपायों के जरिये रातोंरात नहीं किया जा सकता है। यह महंगा सौदा है और इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी। उदाहरण के लिए, आयातित कार की उच्च कीमत अमेरिकी उपभोक्ता को अमेरिकी कार निर्माताओं द्वारा निर्मित कारों को खरीदने के लिए मजबूर कर सकती है। हालांकि, इसी तरह का तर्क विशेष रूप से चीन से सस्ते विनिर्माण वस्तुओं के आयात पर लागू नहीं किया जा सकता है। यह मुद्रास्फीति को काफी बढ़ा सकता है और इससे वितरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस तरह के उपाय से आय वितरण के अंतिम छोर पर स्थित अमेरिकियों के घरेलू बजट पर भी बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

जहां तक अपने देश की बात है, तो हाल के महीनों में भारतीय शेयर बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है और अमेरिका के नए प्रशासन द्वारा पैदा की गई अनिश्चितताओं के कारण शेयर बाजार में यह उतार-चढ़ाव जारी है। पारस्परिक टैरिफ लागू किए जाने के दिन (दो अप्रैल को) भारतीय इक्विटी बेंचमार्क में 1.5 फीसदी से अधिक की गिरावट आई। हालांकि, अगले दिन बाजार में 0.78 फीसदी की रिकवरी हुई, लेकिन कुछ खास शेयरों में अस्थिरताएं महत्वपूर्ण हैं।

यद्यपि पारस्परिक टैरिफ एक बुरा विचार है और इससे उन अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिनकी टैरिफ दरें अमेरिकी टैरिफ की तुलना में अधिक हैं, लेकिन भारत पर इसका उतना व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि, अमेरिका को निर्यात जैसे कुछ खास क्षेत्र, जिनका वैश्विक जुड़ाव ज्यादा है, इससे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन देश के आर्थिक विकास पर इसके प्रभाव का अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी। भारत ऐसा देश नहीं है, जिसकी आर्थिक वृद्धि केवल निर्यात पर निर्भर है, इसलिए भारत पर इसका प्रभाव कम होगा। भारत की अर्थव्यवस्था में घरेलू उपभोग भी एक बेहद सशक्त पहलू है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी उल्लेख किया है कि सभी देशों पर पारस्परिक टैरिफ लगाए जाएंगे। इससे टैरिफ दरों के आधार पर वैश्विक व्यापार व्यवस्था बनाने की संभावना है। हालांकि, इससे व्यापार के लाभों के असममित होने और ट्रंप प्रशासन द्वारा निर्धारित किए जाने का सवाल उठता है। यह कुछ नया है, जो विकसित हो रहा है। इन घटनाक्रमों का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भारत के नीतिगत हलकों में चर्चा का एक प्रमुख विषय है। इस पर अलग-अलग विचार हैं। इस स्तर पर कोई निर्णय लेना फिलहाल टाला जा सकता है। हालांकि, भारत को अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए संतुलनकारी भूमिका निभाना जारी रखना होगा। ट्रंप प्रशासन ने भारत द्वारा ऑटोमोबाइल, कृषि क्षेत्र, फार्मा और शराब पर लगाए जाने वाले उच्च टैरिफ के बारे में ‘चिंता’ व्यक्त की है।

यहां विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में कृषि पर भारत की दीर्घकालिक स्थिति का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। भारत ने डब्ल्यूटीओ वार्ता में भारतीय कृषि की रक्षा के लिए विभिन्न दबावों पर दृढ़ता से अपना पक्ष रखा है। यह देखते हुए कि सकल घरेलू उत्पाद का 15 फीसदी कृषि से आता है और 46 फीसदी लोग कृषि पर निर्भर हैं, भारत को अपनी कृषि की रक्षा करने की आवश्यकता है, चाहे अमेरिका पर कोई भी शासन करे।

इसी तरह, भारत में उच्च टैरिफ के कारण फार्मा क्षेत्र ट्रंप प्रशासन के निशाने पर है। यह देखते हुए कि फार्मास्यूटिकल भी एक मुख्य क्षेत्र है, यह संभावना नहीं है कि भारत फार्मास्यूटिकल क्षेत्र के टैरिफ के संबंध में इस तरह के दबाव के आगे झुक जाएगा। ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र में शायद कम सुरक्षा से अधिक दक्षता मिलेगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इसलिए ट्रंप प्रशासन चाहे जो भी कहे, भारत को अपने टैरिफ सुधारों को आगे बढ़ाना चाहिए और इस उद्देश्य के लिए अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों और भारत के आर्थिक हितों के संरक्षण के सिद्धांत से किसी भी तरह का समझौता किए बिना टैरिफ सुधार के लिए एक क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाना अधिक उपयोगी होगा।

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