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काले धन की हकीकत

Fri, 09 Oct 2015 08:16 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 09 Oct 2015 08:16 PM IST
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Reality of black money

अंतरराष्ट्रीय वित्त की गहरी समझ रखने वाले अनेक विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की थी कि भारतीयों को विदेशों में अवैध रूप से जमा काले धन को भारत में वापस लाने के लिए मजबूर करने वाला राजग सरकार का कानून कारगर नहीं होगा। आखिरकार क्यों कोई विदेशों में जमा अपने काले धन को भारत लाकर 60 फीसदी कर का भुगतान करना चाहेगा, जबकि उसी काले धन को वह मॉरीशस जैसे 'टैक्स हेवन' (कर चोरों की शरणस्थली) देशों के जरिये शेयर बाजार में निवेश कर सकता है और उससे कोई सवाल भी नहीं पूछा जाएगा! यदि आप शेयर बाजार में एक साल से ज्यादा समय के लिए निवेश करते हैं, तो आपको पूंजीगत लाभ पर कोई कर नहीं देना पड़ता। राजग द्वारा काले धन के खुलासे पर गठित उच्च स्तरीय समिति ने भी टैक्स हेवन देशों के जरिये शेयर बाजार में पैसा लगाकर काले धन को सफेद किए जाने के मसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यही वजह है कि काले धन से संबंधित बहुप्रचारित कानून मात्र 4,147 करोड़ रुपये के खुलासे में ही कामयाब हो सका। सनद रहे कि भाजपा ने अपने आंतरिक अध्ययन में मूल रूप से दावा किया था कि भारतीयों ने अवैध रूप से विदेशों में पांच सौ अरब डॉलर जमा कर रखा है!

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कानून का उल्लंघन करने वालों को दस वर्ष की सजा के अलावा 300 फीसदी जुर्माना और भारत में उनकी संपत्ति जब्त करने के प्रावधान वाले कड़े कानून के बावजूद विदेशों से काला धन वापस लाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार की लगभग पूरी तरह से विफलता के क्या मायने हैं? संभवतः काला धन कानून के तहत वित्त मंत्रालय के समक्ष जितनी अवैध आय की घोषणा की गई है, उससे कई गुना ज्यादा हवाला के जरिये सफेद किया गया काला धन बिहार के चुनाव में खर्च हो रहा है। सवाल है कि विदेशों में अवैध संपत्ति रखने वाले व्यवसायी गलत तरीके से अर्जित अपने धन का खुलासा क्यों करेंगे, जबकि वे खर्चीले होते जा रहे चुनाव में राजनीतिक दलों को भारी चंदा देते हैं। असल में कोई भी इस बुनियादी सवाल का हल नहीं चाहता है।
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भारत में काले धन पर बहस का मुख्य मुद्दा यही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली भले ही काले धन के खिलाफ अपने अभियान में तेवर दिखा रहे हों, लेकिन सच्चाई यही है कि ज्यादातर संगठित राजनीतिक दल 80 फीसदी से ज्यादा चंदा नकद प्राप्त करते हैं, और इन चंदों को बीस हजार या उससे कम हिस्सों में बांटकर दिखाया जाता है, ताकि मौजूदा निर्देश के मुताबिक चंदा देने वालों का खुलासा करने की जरूरत न पड़े। यह ढांचागत और संस्थागत खामियां हैं, जो काले धन की अर्थव्यवस्था को चुनावी चंदे से जोड़ती हैं। दिलचस्प है कि राजग सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर काले धन पर गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा वित्त मंत्रालय को सौंपी गई हजार पन्नों की रिपोर्ट में बड़े व्यवसायियों एवं राजनीतिक दलों के बीच की इस सुखद व्यवस्था पर सही ढंग से चर्चा की गई है।
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इसमें हैरानी नहीं कि विदेशों में काला धन रखने वाले भारतीय व्यवसायियों ने काले धन पर बने उस नए कानून का मजाक उड़ाया है, जिसने उनके खिलाफ छड़ी फटकारने की कोशिश की। दिलचस्प है कि 4,147 करोड़ रुपये का घोषित काला धन वर्ष 1997 में लाई गई काले धन की स्वैच्छिक घोषणा से संबंधित योजना(वीडीआईएस) के तहत एकत्र राशि का मात्र एक छोटा-सा हिस्सा है। वह योजना भारत एवं विदेशों में रखी गई अवैध संपत्ति से संबंधित थी। वीडीआईएस योजना के तहत उस समय 26 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की गई थी। यदि मुद्रास्फीति को समायोजित करें, तो आज यह रकम एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होती है। इस आंकड़े के सामने मौजूदा योजना बिल्कुल विफल लगती है।

कुछ लोग तर्क देते हैं कि मौजूदा योजना की तुलना 1997 की स्वैच्छिक घोषणा वाली योजना से नहीं की जा सकती, जिसमें 30 फीसदी कर देकर आप मुक्त हो सकते थे। मौजूदा योजना के तहत 300 फीसदी जुर्माना है और घोषणा करने पर कर की दर 60 फीसदी रखी गई है। हालांकि मात्र 60 फीसदी कर का भुगतान बड़ा प्रोत्साहन है, खासकर पकड़े जाने पर दस वर्षों की सख्त कैद और स्थानीय संपत्ति की जब्ती के मुकाबले। इसका मकसद विदेशों में अवैध धन रखने वाले व्यवसायियों को डराना था, पर लगता है कि यह सफल नहीं रहा।

एक तरह से, नए काले धन कानून को लेकर उत्साहहीन प्रतिक्रिया हमारे शासन के ढांचे का मजाक उड़ाती है, जिसमें लगता है कि अपराधी सोचते हैं कि वे व्यवस्था से खेल सकते हैं। यह आईपीएल के काले धन को सफेद करने के आरोपी ललित मोदी जैसे लोगों के मामले में बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने खुलेआम प्रवर्तन निदेशालय और उसके प्रमुख समेत वित्त मंत्री का मजाक उड़ाया है।

लगता है कि ललित मोदी की तरह कई अन्य व्यवसायियों ने भी काला धन वापस लाने के लिए राजग सरकार की पेशकश ठुकराकर भारतीय कानून को धता बताया है। उन्होंने यह साहस इसलिए दिखाया है, क्योंकि वे जानते हैं कि कैसे उसी पैसे को शेयर बाजार के जरिये वापस लाकर बिना कोई टैक्स चुकाए व्यवस्था को मात दे सकते हैं। मॉरीशस, माल्टा, बहामास, केमैन द्वीप जैसे टैक्स हेवन देशों में अब भी गैर पारदर्शी तरीके से वित्तीय कामकाज होता है। हालांकि जी-20 विभिन्न देशों एवं टैक्स हेवेन के बीच पैसों के रियल टाइम हस्तांतरण पर सूचना साझा करने के लिए कानून ला रहा है। लेकिन इस कानून में भी अभी कुछ वर्षों की देर है। तब तक अवैध धन को मुख्यधारा की बैंकिंग व्यवस्था में लाने के लिए पर्याप्त अवसर हैं।


बहरहाल, इतने कम काले धन की घोषणा से सरकार शर्मिंदा दिख रही है। वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि भविष्य में दोषी पाए जाने पर भारी कीमत चुकानी होगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि काले धन का असली स्रोत देश में ही है, विदेश में नहीं। भाजपा अब खुलकर स्वीकार कर रही है कि विदेशों में जमा काले धन को लेकर उसका प्रचार बेवजह था। अमित शाह का 'जुमला' अब भाजपा की आधिकारिक नीति है।

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