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पाठक के द्वार ठक-ठक
प्रकाश पुरोहित
Updated Fri, 08 Feb 2013 12:14 AM IST
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अभी-अभी पता लगा है कि साहित्य में पाठकों का रुझान घट रहा है। पहले से ही यह खबर उड़ी हुई थी और मान लिया गया था कि यह अखबार वालों की फैलाई अफवाह है, मगर जब सरकारी स्तर पर जांच की गई, तो पता चला कि खबर पक्की है। अब साहित्य के सारे ठेकेदार यह पता लगाने में भिड़े पड़े हैं कि यह रुझान आखिर कम क्यों हो रहा है।
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बिल्कुल शादी-ब्याह जैसे उत्साह से बैठकें हो रही हैं। चुके हुए साहित्यकारों को चुन-चुनकर बटोरा जा रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि जब आप इतना घटिया लिख रहे थे, तब भी पाठकों का रुझान इतना नहीं घटा था। अब ऐसा क्या हो गया कि चिकनी-चिकनी किताबें भी पाठकों के हाथ से फिसली जा रही हैं। माना कि तब भी किताबें नहीं खरीदता था आम आदमी, मगर सरकारी लाइब्रेरियों में तो जाकर बैठा ही करता था।
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जी, अब तो शहर में लाइब्रेरी कहां हैं, यही पता नहीं है आम पाठकों को। दूसरी ओर लेखक लिख-लिखकर थके जा जा रहे हैं, यह रही कविता की पंद्रहवीं किताब...यह रहा बीसवां उपन्यास... और यह रहा दसवां कहानी संकलन, मगर आम पाठक है कि फटकने को भी तैयार नहीं।
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समझा रहे थे इतने दिनों से कि रुझान कम मत करो, भारी पड़ेगा। लेखक और सरकार से यही बात बर्दाश्त नहीं होती कि आम पाठक जैसा टुच्चा जीव उसकी अनदेखी करे। संवेदनशील होते हैं लेखक-बात सीधे दिल पर लेते हैं।
शहर के महंगे होटल में लेखकों की दुंदुभि बजाती, चिंघाड़ती रेवड़ जमा हो रही है। वह जैसे ही ढाई सौ रुपये वाली प्लेट हाथ में लेगी... कि उसे पता चल जाएगा कि इन कम्बख्त आम पाठकों का मन कहां हिलगा पड़ा है। वैसे तो होटल में घुसते ही ताड़ लिया जाएगा कि यह साजिश कौन कर रहा है।
तो आज शाम तक यह पता लग जाएगा कि पाठकों में साहित्य के प्रति रुझान कम क्यों हो रहा है। कितनी बुरी बात है न कि पहले तो खूब लिखें, और फिर खुद ही यह तलाशें कि रुझान कम क्यों हो रहा है, इसीलिए अब लोग साहित्यकार बनने से भी कतराने लगे हैं। साल-दो साल में एक बार ‘ढाई सौ रुपये की प्लेट’ से होता क्या है।
चिंता करने के लिए तो यह इंतजाम ठीक है, मगर लिखने के लिए बहुत कुछ चाहिए, हर दिन चाहिए। वह कहां से आएगा, समझते ही नहीं हैं आम पाठक। अब भुगतो-निकल पड़े हैं लेखक, सरकार के कंधे पर चढ़कर।