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बलात्कार, मीडिया ट्रायल और अदालत

Tue, 30 May 2017 06:28 PM IST
Sudhanshu ranjan
Sudhanshu ranjan Updated Tue, 30 May 2017 06:28 PM IST
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Rape, media trials and court
सुधांशु रंजन
निर्भया मामले में उच्चतम न्यायालय ने चार अभियुक्तों की फांसी की सजा को बरकरार रखा है। किंतु इस घटना के तुरंत बाद रोहतक से एक बलात्कार एवं हत्या की खबर आई, जो निर्भया की तरह ही बर्बर एवं वीभत्स है। इसके बाद ग्रेटर नोएडा में जेवर-बुलंदशहर हाईवे पर एक परिवार की चार महिलाओं के साथ कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया और परिवार के एक पुरूष की हत्या कर दी गई। प्रशासन ने बलात्कार के आरोप का खंडन किया है, लेकिन महिलाएं अपने बयान पर कायम हैं। लगभग इसी जगह 31 जुलाई 2016 को एक मां एवं बेटी के साथ परिवार की मौजूदगी में सामूहिक बलात्कार किया गया।
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क्या अपराधी इतने निडर हो गए हैं कि उन्हें प्रशासन एवं अदालत की कोई परवाह ही नहीं है? नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि प्रशासन एवं पुलिस का ही अपराधीकरण हो गया है। पुलिस तब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं करती, जब तक कि बड़ी संख्या में भीड़ थाने न पहुंच जाए। कई बार न्यायालय के निर्देश पर प्राथमिकी दर्ज होती है। परंतु इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि अदालतों में भी उन्हीं मामलों को प्राथमिकता तथा गति मिलती है, जो मीडिया में सुर्खियां बनते हैं। 
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सैद्धांतिक रूप से अदालत एक स्वायत्त संस्था है, जिसे कानूनों, तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करना है। इसमें जनमत की गुंजाइश नहीं है। आज दुनिया के अधिकतर विकसित एवं कॉमन लॉ देशों में जूरी की व्यवस्था है, किंतु भारत में यह व्यवस्था करीब पचास वर्ष पूर्व नानावती मामले में सुनवाई के बाद खत्म कर दी गई। इस व्यवस्था में जूरी के सदस्यों को टी वी रियल्टी शो ‘बिग बॉस’ की तरह एक घर में बंद कर समाज से पूरी तरह काट देते हैं, ताकि विचारण के वक्त उन पर किसी तरह का प्रभाव न पड़े। नानावती मामले में यही आरोप लगा कि जूरी के सदस्य प्रभावित हो गए और 8ः1 के बहुमत से उसने नानावती को हत्या के आरोप से बरी कर दिया। के एम नानावती एक नौसैनिक अधिकारी था, जिसने अपने दोस्त प्रेम आहूजा की हत्या कर दी थी, क्योंकि आहूजा के संबंध उसकी अंग्रेज पत्नी सिल्विया से हो गए थे। उस समय की मशहूर पत्रिका ‘ब्लिट्ज’ ने नानावती के पक्ष में जोरदार अभियान चलाया। संयोगवश ब्लिट्ज के प्रकाशक-संपादक आर के करंजिया तथा नानावती दोनों पारसी थे। जिला अदालत ने जूरी के फैसले को अटपटा बताया और उसे उच्च न्यायालय भेज दिया, जिसने निर्णय को निरस्त करते हुए लिखा कि जूरी मीडिया एवं जनमत के प्रभाव में आ गया था।
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कुछ मामले में न्याय केवल मीडिया ट्रायल के कारण हुआ- जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी भट्टू, रूचिका गिरहोत्रा, आदि। जेसिका के हत्यारे मनु शर्मा को जिला अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया। मीडिया में हंगामे के बाद उच्च न्यायालय ने निर्णय पलट दिया। प्रियदर्शिनी में बलात्कार और हत्या करने वाला संतोष सिंह एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का बेटा था, जिसके विरूद्ध पुलिस को जांच में कुछ नहीं मिला और जिला अदालत ने उसे बरी कर दिया। परंतु जैसे ही प्रियदर्शिनी के पिता ने सिविल सोसायटी को साथ लेकर आंदोलन शुरू किया और मीडिया ने उसे मुद्दा बनाया, तो रेकॉर्ड 41 दिनों में उच्च न्यायालय ने निर्णय दे दिया। विडंबना यह है कि सभी मामलों में जनांदोलन खड़ा नहीं हो सकता, न मीडिया में हंगामा। शायद अपराधी भी यह समझते हैं। इसलिए उन्हें खौफ नहीं है। यही कारण है कि बुलंदशहर उच्च मार्ग पर बार-बार बलात्कार होते हैं और बार-बार एक न एक निर्भया बलात्कार एवं बर्बर हत्या का शिकार होती है।
    
 
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