फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   rameshchandra shah.

आज रंगो जन-जन का मन

Thu, 05 Mar 2015 08:53 PM IST
रमेशचंद्र शाह
रमेशचंद्र शाह Updated Thu, 05 Mar 2015 08:53 PM IST
विज्ञापन
rameshchandra shah.

हम हिंदुस्तानी लोग क्या स्वभाव और क्या संस्कृति, दोनों मामलों में दुनिया के सबसे ज्यादा उत्सवधर्मी हैं। हमारे ऋतुचक्र में कोई भी ऐसी ऋतु नहीं है, जिसके अपने पर्व-त्योहार नहीं हों। होली और दीवाली हमारे समूचे ऋतुचक्र के दो छोर हैं। दो छोर पर होने के कारण इन पर्वों का विशेष महात्म्य है। होली तो मनुष्य स्वभाव के और जीवन के भी समूचे वर्णपट को अपने में समेटती है। जीवन के हर भाव को-शृंगार से लेकर शांति तक, हर भाव को अपने में समाहित किए हुए है। हमारा जो जीवन दर्शन है, वह होली में सबसे ज्यादा निखरता है। होली में हमारा भरा-पूरा जीवन दर्शन सबसे ज्यादा सूक्ष्म, सबसे ज्यादा स्थूल स्तरों पर प्रकट होता है।

विज्ञापन


मैंने ब्रज, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और अपने अल्मोड़े की भी होली देखी है। सभी जगहों में होली मनाने की मूल भावना एक ही है, लेकिन उनमें स्थानीय रंग, स्थानीय संस्कृति और स्थानीय संस्कार अलग-अलग होते हैं। सभी जगहों का अपना-अपना मजा और अपना-अपना रंग है। इनमें जीवन का वैविध्य झलकता है। मैं अल्मोड़ा का रहने वाला हूं। मुझे अच्छी तरह से याद है कि बचपन में जब हम होली मनाते थे, तो रंग भरी एकादशी से लेकर छलेरी तक कपड़े ही नहीं बदलते थे। रंग भरी एकादशी को जो होली खेलते थे, उन्हीं कपड़ों में छलेरी को अबीर-गुलाल की होली खेलते थे। पूरे पांच दिन तक हम लड़के पूरे नगर में ढोलक-हारमोनियम लेकर गाते-बजाते चंदा इकट्ठा करते थे और उन पैसों से वहां का विशिष्ट मिष्ठान, जिसे गोजा (गुझिया) कहते हैं, लाते थे और सभी मिल-बांटकर खाते थे।
विज्ञापन


वहां के जनजीवन में संगीत का बड़ा जबर्दस्त जोर था। एक तरफ लोक संगीत, दूसरी तरफ शास्त्रीय संगीत। किसका पलड़ा भारी है, कहना मुश्किल। मैंने संगीत की शिक्षा नहीं पाई, लेकिन केवल होली की बदौलत मैं सारे रागों को पहचान सकता हूं। वहां दो तरह से होली गायन होता था। एक तो बैठकी होली, जिसमें शास्त्रीय गीत गाए जाते थे और दूसरी खड़ी होली, जिसमें ब्रजभाषा एवं कुमाउंनी के लोकगीत गाए जाते थे। होलिका दहन के आसपास हम लोग पेड़ की एक शाखा लाकर गाड़ते थे और उसमें तरह-तरह के रंगीन चिथड़े लपेटते थे, उसे चीर मइया कहते थे। इस तरह मनुष्य के उत्सव में वनस्पति जगत भी शामिल हो जाता था। वहां पर रात भर जागकर हमलोग होली के गीत गाते थे। वहां लोग आते थे अपनी-अपनी टोलियां लेकर, और गाने गाते थे। अद्भुत दृश्य होता था। अब भी थोड़ा बहुत बचा हुआ है।
विज्ञापन
विज्ञापन


संयुक्त परिवारों के विघटन के चलते आज पहले जैसी आत्मीयता नहीं रह गई है। नई पीढ़ी को सामाजिकता का संस्कार भला कहां से मिलेगा! लोग अपनी जड़ों से, लोकसंस्कृति से कट रहे हैं। ऐसे में बच्चे होली के उस सांस्कृतिक स्वरूप को कैसे समझेंगे। घर-घर में बाजार के जरिये अपसंस्कृति के प्रवेश के चलते होली में भी अश्लीलता आई है। नई पीढ़ी के बहुत से लोगों को तो होली के अवसर पर बनने वाले पकवानों का नाम भी याद नहीं होगा।

होली में ऐसी आत्मीयता उमड़ती है कि एक दूसरे के प्रति बैर-भाव रखने वाले लोग भी आपस में गले मिलते हैं, एक दूसरे को रंग-अबीर लगाते हैं, मिठाई बांटते हैं। सभी त्योहारों का अपना-अपना आकर्षण है, लेकिन होली की विशेषता है कि यह छोटी-छोटी सीमाओं को तोड़कर एक बहुत बड़ी आत्मीयता के घेरे में एक-दूसरे से जुड़ने का संदेश देती है। यह सामाजिक संकीर्णताओं की व्यर्थता का बोध कराती है। नैतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से होली बताती है कि किसी को छोटा मत समझो और अपने आचार-व्यवहार में बड़प्पन का भाव रखो। आज के समय में होली का यह संदेश और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। जाति, धर्म के भेदभाव को भुलाकर होली मनाने की जरूरत है। एक दिन होली मनाकर फिर अपने घेरे में कैद नहीं होना चाहिए, बल्कि सामाजिक संबंधों के पुनर्निर्माण का संकल्प हमारे अंदर जागृत होना चाहिए।

होली का रंग जीवन का प्रतीक है, उल्लास का प्रतीक है। जीवन में ही सनातनता छिपी हुई है। दैनिक जीवन में ही सनातन की खोज, उसकी प्राप्ति और उसका उत्सव मनाना-यही हमारी संस्कृति है, जो हमें दूसरे से अलग पहचान भी देती है और दूसरों से जोड़ती भी है। यह त्योहार हमें विश्व बंधुत्व के भाव से भरता है, जिसमें कला है, संगीत, नृत्य है और चित्र है और खेल-कूद के लिए स्थान है। खेल-कूद यानी लीला भाव-यह हमारी संस्कृति का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है, जो होली में सबसे ज्यादा खिलता है। हमारे दो नायक हैं-श्रीराम और श्रीकृष्ण। हालांकि राम से संबंधित होली गीत भी सुनने को मिलते हैं, लेकिन ज्यादातर गीत लीला पुरुष श्रीकृष्ण से संबंधित हैं। होली की सबसे ज्यादा मस्ती मैंने राधा-श्रीकृष्ण की लीलाभूमि ब्रज में देखी।


हिंदी साहित्य में तो होली की समृद्ध परंपरा रही है। भारतेंदु ने होली पर बहुत जोरदार कविताएं लिखी हैं। भारतेंदु की पंक्तियां हैं-फागुन के दिन चार रे गोरी खेल लो होरी, फिर कित तू, कहां यह अवसर, क्यों ठानती है रार, जीवन रूप नदी बहती सम, यह जीय माझ विचार, हरिचंद गर लगो पीतम के करो होरी त्योहार।  इसी तरह हरिऔध की पंक्तियां देखिए-डारि दिन्हों रंग तो उमंग कत उनो भयो, बिगड़ियो कहा जो मुख मालि रोरी मल दी है, कुंकुम चलाए कौन हानि भई अंगन की, मारि पिचकारी कौन करी बलजोरी है। हमारे अल्मोड़ा के कवि सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियां हैं-आज रंगो फिर जन-जन का मन, रंगो पुनः भारत का यौवन। नरेंद्र शर्मा ने मजदूरों की होली का बहुत बढ़िया चित्रण किया है। लेकिन अब नई पीढ़ी में ऐसी रचनाएं देखने को नहीं मिलतीं। साहित्य भी एकरंगी हो गया। समाज की तरह साहित्य में भी संकीर्णता प्रवेश कर गई है, जबकि विविधता ही उसकी विशिष्टता है।राजनीति ने ग्रामीण जीवन की विविधता को खतरे में डाल दिया है। जबकि विविधता में एकता ही भारत की पहचान है, जिसे खत्म करने की साजिशें हो रही हैं। विविधता और सहिष्णुता की हमारी संस्कृति के कारण ही हम अब तक टिके हुए हैं।

(लेखक को इस वर्ष का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला है)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed