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बारिश और सूखा: अनमोल पानी का अवमूल्यन

Tue, 30 Aug 2022 08:03 AM IST
Isha Jhaveri ईशा झावेरी
Updated Tue, 30 Aug 2022 08:03 AM IST
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सार
नए आंकड़ों से पता चलता है कि 39 करोड़ लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं, जो बाढ़ से सीधे प्रभावित हैं। अति निर्धन लोगों के जीवन, जीविका और कल्याण पर बाढ़ का सबसे बुरा असर पड़ता है।
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Rain and drought: devaluation of precious water
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social Media

विस्तार

हमारे समाज का स्वरूप शुरुआती दिनों से ही बारिश, नदियां, तटों और समुद्रों द्वारा निर्धारित किया गया है। शास्त्रीय पुरातनता से लेकर अब्राहमिक धर्मों (इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी) और फिर प्राचीन मेसोपोटामिया तक की कहानियां बताती हैं कि कैसे पानी ने इतिहास को बदला। भारत में मानसून जून से सितंबर के बीच 80 फीसदी बारिश लाता है, जो बचपन से लेकर संस्कृति और वाणिज्य तक को आकार देता है। बारिश के स्तर में विविधता कोई नई बात नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप इसकी तीव्रता नई है। जलवायु परिवर्तन को पानी के माध्यम से सबसे अधिक गहराई से महसूस किया जाता है। उच्च तापमान के कारण सूखा, बाढ़ और बढ़ती वर्षा परिवर्तनशीलता होती है। ग्लोबल वार्मिंग में जरा-सी भी वृद्धि होने से पानी संबंधी जोखिम के तेज होने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए पानी की बहुलता और संकट से जुड़ी चिंताएं नीतिगत चर्चा के केंद्र में हैं। वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि मानसून में परिवर्तनशीलता में बदलाव जारी है और आगे भी रहेगा।



भारत पहले से ही बारिश के दिनों में छोटे-छोटे अंतराल और कभी-कभी एक महीने के अंतराल पर लंबे सूखे का सामना करता रहा है। इसी वर्ष जून में असम सूखे से जूझ रहा था, लेकिन सप्ताह भर के भीतर ही वहां विनाशकारी बाढ़ आ गई। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के साथ इस तरह के भयंकर जोखिमों की आशंका और अधिक होगी। पानी की बढ़ती परिवर्तनशीलता (अतिवृष्टि या अनावृष्टि) समुदायों पर भारी पड़ सकती है। अतिवृष्टि के कारण महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों, घरों को नुकसान पहुंचता है और पानी के किनारे रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका बाधित होती है।


नए आंकड़ों से पता चलता है कि 39 करोड़ लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं, जो बाढ़ से सीधे प्रभावित हैं। अति निर्धन लोगों के जीवन, जीविका और कल्याण पर बाढ़ का सबसे बुरा असर पड़ता है। पर धीमी गति से चलने वाला सूखा धीमी गति के दुख की तरह है, जो कंपनियों और शहर की उत्पादकता को बाधित कर सकता है, वनों के विनाश को बढ़ा सकता है और लोगों के स्वास्थ्य एवं कृषि प्रणालियों को नुकसान पहुंचा सकता है। अधिकांश देशों ने अपनी जलवायु परिवर्तन योजनाओं में अनुकूलन के लिए पानी को प्राथमिकता दी है। आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि इन जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियों में से अधिकांश कृषि क्षेत्र को लक्षित करते हैं। इन सर्वव्यापी अनुकूलन रणनीतियों में से एक सिंचाई, रणनीतिक भंडार और फसलों पर पानी का अनुप्रयोग है। ये प्रयास फसलों को वर्षा की बढ़ती परिवर्तनशीलता और बढ़ी हुई गर्मी की कुछ कठिनाइयों और
अनिश्चितताओं से बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। भारत में इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण भूजल सिंचाई है, जिसमें 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बेशक इससे खेतों को भारी लाभ हुआ है।

लेकिन किस हद तक और कब तक? हमने गेहूं के मामले में इसकी जांच की, जो कि अनुमानतः देश में सिंचाई की बढ़ती मांग का मुख्य कारण है। परिणाम बताते हैं कि भारत में गेहूं के पैदावार में वृद्धि के लिए सिंचाई में वृद्धि महत्वपूर्ण रही है। सिंचाई ने सूखे के प्रभाव को कम कर दिया है। हालांकि इसको लेकर संदेह है कि यह लाभ भविष्य में भी जारी रहेगा। हाल के वर्षों में सिंचाई के विस्तार से उपज लाभ धीमा हो गया है, जबकि बढ़ते तापमान और सूखे के नकारात्मक परिणाम बढ़ते जा रहे हैं। यह बताता है कि अतीत में काम करने वाली रणनीतियां भविष्य में काम नहीं कर सकतीं। इसका एक कारण यह है कि अतीत के लाभ भूजल स्रोतों पर बढ़ते दबाव की कीमत पर आए हैं। नतीजतन भूजल का व्यापक दोहन हुआ है और भूजल स्तर में गिरावट आई है। 

भूजल की कमी से देश में फसलों का उत्पादन काफी घट सकता है, जिससे लोगों की खाद्य सुरक्षा, आजीविका और कल्याण प्रभावित हो सकते हैं। भूजल स्तर के घटने का एक अर्थ सूखे के मौसम में नदियों का सूखना भी है, जब पानी की सर्वाधिक जरूरत होती है। विडंबना देखिए कि जिस संसाधन ने अतीत में जलवायु परिवर्तनशीलता को कम किया है, वह ऐसी स्थितियां भी पैदा कर सकता है, जो भविष्य में प्रतिकुलताओं को और बढ़ाए। कुछ शुष्क क्षेत्रों में मुफ्त या कम लागत में पानी की आपूर्ति पानी की बहुतायत का भ्रम पैदा करती है, जिसके चलते ज्यादा पानी की खपत वाली फसलों की खेती बढ़ती है। जल निवेश भी अनजाने में असमानताओं को बढ़ा सकता है। महाराष्ट्र में सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्ष 2015 से बड़े पैमाने पर कृत्रिम तालाब बनाए गए, जिसका उद्देश्य वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देकर छोटे खेतों में कृषि को प्रोत्साहित करना था, लेकिन प्राथमिक शोध बताते हैं कि किसानों को भूजल दोहन कर तालाबों को भरने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे किसानों के बीच भूजल दोहन की प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

स्थानीय कृषि पारिस्थितिकी से निकटता से जुड़ी फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करना ही विवेकपूर्ण रणनीति है, न कि उन फसलों को सब्सिडी देना, जो जलवायु संकट के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती है। इसके अलावा, प्रतिरोधी समुदायों के लिए पूरक समाधानों में निवेश करना-जैसे, वाटरशेड और जंगलों की रक्षा करना और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भूमि प्रबंधन प्रथाओं का उपयोग करना-जल प्रवाह को बढ़ा सकता है और फसल उत्पादकता व आय में वृद्धि कर सकता है। हालांकि बदलाव अक्सर मुश्किल होता है। पानी के सफलता प्रबंधन के लिए नीति और अभ्यास में तालमेल की जरूरत होती है, जो तीन प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं-दक्षता, समानता और स्थिरता-को संतुलित करते हुए उपयोग की इस पूरी शृंखला में पानी के मूल्य को पहचानती है।

यही वह चुनौती है, जो वर्तमान जल प्रबंधन प्रथाओं को प्रभावित करती है। जलशक्ति मंत्रालय द्वारा स्थापित स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा तैयार नई राष्ट्रीय जल नीति इन कमियों को पहचानती है और जल संसाधनों के प्रबंधन और संचालन के लिए एक आदर्श बदलाव पेश करती है। यह जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए समाधान विकसित करने का एक रोडमैप प्रदान करती है। हमें सतत जल भविष्य के लिए अपने प्रयासों को दोगुना करने की आवश्यकता है। प्रयास की एक-एक बूंद मायने रखती है। -लेखिका स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में खाद्य सुरक्षा व पर्यावरण केंद्र से जुड़ी हैं।

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