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हरि को भजे सो हरि का होई
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 02 May 2013 09:28 PM IST
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हमारे धर्मग्रंथ यह सीख देते हैं कि जात-पात जैसे बंधन हमें सांसारिकता में बांधते हैं, इसलिए अगर मोक्ष पाना है, तो जात-पात रूपी बंधन को तोड़कर सभी को प्रेम से गले लगाना चाहिए।
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इसी से जुड़ा एक प्रसंग एक अत्यंत विरक्त रैदासी भक्त का है, जो वृंदावन धाम स्थित दावानल कुंड की एक गुफा में निवास करता था। श्रीराधाकृष्ण के भजन में मस्त रहना तथा भिक्षा के रूप में मिलने वाली दो रोटियां खाकर जीवनयापन करना उसकी दिनचर्या थी। उस संत के पास भक्त रैदास जी के पदों की एक दुर्लभ पुस्तक थी। उसे वह प्राणों से भी ज्यादा प्रिय समझकर अपनी जटाओं में छिपाकर रखता था।
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भागवत के महान मर्मज्ञ स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज के प्रति रैदास भक्त की अनन्य श्रद्धा थी। वह रात के समय चुपचाप स्वामी जी के पास पहुंचता तथा उनसे रैदास जी के पदों की पुस्तक सुनाने का आग्रह करता।
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स्वामी जी उसे प्रेम से पास बैठाते। वह तन्मय होकर भक्त रैदास जी के पद सुनता तथा पद सुनते-सुनते भगवद् प्रेम में भाव-विभोर हो उठते। स्वामी जी उस हरिजन साधु की निश्छलता तथा विशुद्ध भक्ति-भावना को देखकर उसके प्रति नतमस्तक हो जाते थे। वह उस समय बुदबुदाया करते थे- हरि को भजे सो हरि को होई, जात-पात पूछे नहि कोई। यह उक्ति मेरे प्रिय इस रैदास भक्त पर खरी उतरती है।