राहुल सांकृत्यायन: सिर्फ नाम नहीं एक विचारधारा
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जन्म हुआ तो नाम केदारनाथ पांडेय, उम्र के दूसरे पड़ाव पर राहुल सांकृत्यायन बने और आखिर तक महापंडित बने रहे। महापंडित की उपाधि प्राप्त राहुल सांकृत्यायन ने कभी खुद को इससे नहीं जोड़ा। उन्हें अपना महापंडित कहलाना अच्छा नहीं लगता था। आज जब कि साहित्य के नाम पर किताबों में छिछोरापन उभर आया हो, ऐसे समय में राहुल जी की याद आती है। जब साहित्य की किताबें हिन्दी से ज्यादा हिंग्लिश की ओर जोर मारने लगे तो मानना पड़ेगा ही कि अब राहुल जी सरीखे लोगों को शायद ही कोई ज्यादा अहमियत देता हो। 14 अप्रैल 1963 को राहुल जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।
राहुल जी कहा करते थे 'कमर बांध लो भावी घुमक्कड़ो, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।' राहुल जी को आधुनिक हिन्दी साहित्य में यात्राकार, इतिहासविद्, तत्वान्वेषी और युग परिवर्तनकारी साहित्यकार के रूप में जाना जाता है। राहुल जी ने किशोरावस्था में ही अपना घर छोड़ दिया। वर्षों तक हिमालय में यायावरी जीवनयापन किया । 36 भाषाओं के ज्ञाता राहुल जी ने वाराणसी में संस्कृत का अध्ययन किया, आगरा में पढ़ाई की, लाहौर में मिशनरी काम किया और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल भी गए। बौद्ध धर्म पर उनका का शोध युगांतकारी है जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया और ढेर सारे साहित्य खच्चर पर लाद कर लाए थे। साम्यवादी विचारों के समर्थक रहे राहुल जी हिन्दी के बारे में कहते थे कि 'मैंने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खान-पान बदला, संप्रदाय बदला लेकिन हिंदी के संबंध में मैंने अपने विचारों को कभी नहीं बदला।'
हालांकि भारत में साम्यवादी विचार हिन्दी का विरोधी था और इसलिए राहुल जी ने एक समय बाद उससे भी खुद को विमुख कर लिया। राहुल सांकृत्यायन किसी व्यक्ति का नाम नहीं वरन एक विचारधारा का नाम है। उनका नाम बचपन की कोमलता से, बुढ़ापे की परिपक्वता तक बदलने वाले गढ़े जा रहे संरचना का नाम है। आप उनकी मेधा को राजनीतिक, धर्म, आर्थिक और समाजशास्त्र सरीखी रेखाओं के भीतर रख कर नहीं आंक सकते। उनकी लेखनी को समग्र रूप में देख कर ही हम उस विचारधारा का 100 वां हिस्सा समझ सकते हैं जो हम किसी साहित्यकार को पढ़कर समझना चाहते हैं। एक व्यक्ति जो उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ स्थित पंदहा में जन्मा और उसका महापंडित बन कर जगतव्यापी हो जाना अपने आप में एक अनोखी बात है। आपको बता दूं कि राहुल जी का जन्म उनके नाना राम शरण पाठक के निवास पंदहा में हुआ था लेकिन उनका पैतृक निवास आजमगढ़ स्थित कनैला में है।
राहुल जी की जीवनी और उनकी लेखनी केवल पढ़े जाने भर की मोहताज नहीं है बल्कि उसे व्यक्तित्व विकास के चरणों के रूप में समझा जा सकता है। आज अगर राहुल सांकृत्यायन हमारे बीच होते तो वो आजमगढ़ की टूटी फूटी सड़कों, लखनऊ और दिल्ली की राजनीति में होने वाली बेशर्म नौटंकी पर मीठी बोली तो नहीं ही बोलते। वो आज के साहित्यकारों के सरीखे किसी राज्यसभा या लोकसभा की सीट के लिए लालायित नहीं रहते। वो ऐसा कुछ कहते, कुछ ऐसा करते भी जो बेशर्म नौटंकी करने वालों की आंखो में चुभता और वो अगर चुभना लोगों को नजर आता तो कुछ न कुछ तो बदलता ही। आजमगढ़ में लोग राहुल सांकृत्यायन को आज भी नहीं भूले हैं।
मुझे याद है कि 2013 में राहुल जी पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उनके गांव के ही गिरिजेश तिवारी ने कहा था कि कनैला की जमीन केवल कट्टा और कलम ही पैदा कर सकी है। दोनों दिमाग के खिलाड़ी होते हैं। किसी तीसरे की हिम्मत नहीं है कि वो रेस में आगे आ सके। ये बात आज भी मेरे जेहन में जिन्दा है। संभवतः कट्टे वाली बात पर गिरजेश से आप असहमत हों क्योंकि वो हिंसक है और आप खुले आम उसका समर्थन नहीं कर सकते लेकिन कलम वाली बात से आप मुंह नहीं मोड़ सकते। आज के समय में जरूरी नहीं है कि हर कोई राहुल सांकृत्यायन हो जाए लेकिन उनका थोड़ बहुत अनुसरण तो किया ही जा सकता है।
राहुल सांकृत्यायन की हर कहानी के पीछे एक युग के संबंध की बड़ी सामग्री है, जो दुनिया की अनेक भाषाओं, आपेक्षिक भाषाविज्ञान, पत्थर, पीतल, लोहे पर सांकेतिक वा लिखित साहित्य अथवा कहानियों, रीति-रिवाजों और टोटके-टोनों में पाई जाती है। बीती 9 अप्रैल को राहुल जी के जन्मदिन पर फेसबुक पर एक पोस्ट मेरी निगाह में आई, जिसमें लेखक ने एक सामान्य सा लेकिन बड़ा सवाल किया था कि 'राहुल सांकृत्यायन को याद करने की फुर्सत किसे है?' सही बात है आखिर किसे इतनी फुर्सत है कि अब राहुल सरीखे साहित्यकार को याद करने की जहमत उठाए। था एक समय जब 1958 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया, 1963 में पद्मभूषण से नवाजा गया लेकिन अब तो सरकार भी याद करने से कतराती है। भला हो गांव, गलियों और छोटे शहर में बसे लेखकों, कवियों और पत्रकारों का जो उन्हें जन्मदिन और पुण्यतिथि पर ही सही कम से कम याद तो कर लेते हैं।
आज आपके पास गूगल है। मेट्रो, हवाई जहाज और न जाने क्या क्या है फिर भी भारतीय साहित्य, उसमें भी खासतौर से हिन्दी साहित्य ने कोई बड़ा काम नहीं किया। चंद अंग्रेजी के लेखकों की किताबें हिन्दी में अनुवाद होकर छाप दी जाती हैं तो ऐसा लग जाता है कि हां आज भी हिन्दी नाम को कोई साहित्य हमारे आस पास जिन्दा है और दबी कुचली ही सही सांसें ले रहा है। राहुल जी जब मार्क्सवाद से जुड़े उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में घुसे सुविधापरस्तों की आलोचना की और उन्हें आन्दोलन के नष्ट होने का कारण बताया था। सन् 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छापे गए भाषण को बोलने से इंकार कर दिया और जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। जिसके बाद उन्हें पार्टी की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा, फिर भी उनके तेवर में कोई बदलाव नहीं आया।
राहुल जी ने श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत, कोरिया, जापान, मंचूरिया, सोवियत संघ (आज का रूस), ईरान, और कई यूरोपिय देशों की यात्रा की और साहित्य के दायरे में स्वयं का दायरा बढ़ाया। आज राहुल सांकृत्यायन स्कूली किताबों से गायब होने के कगार पर हैं। ऐसे समय में जबकि स्कूलों का सिलेबस सरकारों के आने जाने पर निर्भर करता हो वहां और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? एक और बात जो मैंने बीते दिनों अपने फेसबुक पर लिखी थी कि राहुल सांकृत्यायन का लोग पूरा नाम नहीं ले पाते। कई लोग मजाक भी उड़ाते हैं कि कोई आसान नाम नहीं रख सकते थे। कोई राहुल सांकृत्यान कहता है तो कोई सांस्कृत्यायन। लेकिन यह याद रखिएगा कि 'नाम में क्या रखा है' वाले इस जमाने में भी नाम जानना जरूरी है, क्योंकि जो अपना इतिहास भुला देता है उसे वर्तमान भी खुद में संजोना नहीं चाहता। खैर, आज राहुल जी की पुण्यतिथि पर इससे ज्यादा उन्हें शब्दों में बांधना मेरे लिए मुश्किल है। मेरा नाम भी उन्हीं के नाम पर परिवार के बड़े लोगों ने रखा है। मैं उनके जैसा तो नहीं बन सकता लेकिन हां कोशिश जरूर करूंगा कुछ करने की। आखिर में राहुल जी का पसंदीदा पंक्तियां लिखना नहीं भूलना चाहता---
''सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ, जंदगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ?''