जीत के फार्मूले की तलाश में राहुल
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वर्ष 2019 से पहले कांग्रेस के लिए खुद को साबित करने का यह आखिरी मौका है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विश्सनीय विपक्ष के रूप में अपना अस्तित्व बचाने का यह आखिरी अवसर है। लेकिन 1980 के दशक के फिल्म निर्माता मनमोहन देसाई के विपरीत राहुल गांधी के पास जीत का कोई फार्मूला नहीं है। उन्होंने मंदिर, मस्जिद, कैलास मानसरोवर की यात्रा करते हुए हजारों किलोमीटर की दूरी तय की, रोड शो और जनसभाएं कीं, लेकिन इससे कोई ऐसी स्पष्ट तस्वीर नहीं मिली कि उनकी पार्टी मध्य प्रदेश, राजस्थान या छत्तीसगढ़ में चुनाव जीत ही रही है। हालांकि पार्टी के भीतर के चुनावी विश्लेषकों ने उन्हें उम्मीद की किरण दिखाई है। पेशेवर लोगों द्वारा तीन चुनावी सर्वे हो चुके हैं और पार्टी प्रबंधकों ने कांग्रेस पार्टी को मध्य और पश्चिमी भारतीय राज्यों में स्पष्ट बहुमत दिया है।
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साहस का प्रदर्शन करते हुए राहुल ने महागठबंधन का विचार त्याग दिया और मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में यह दिखाने की कोशिश की है कि जोखिम लेने से ही सफलता मिल सकती है। कांग्रेस अध्यक्ष का यह मानना है कि जब तक कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ अपने दम पर नहीं जीतती है, 2019 के लोकसभा चुनाव का संघर्ष एक घोड़े की दौड़ के रूप में खत्म हो जाएगा। कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजे न केवल जीत के संदर्भ में, बल्कि उसके अस्तित्व के लिए भी महत्वपूर्ण है। देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक गंभीर नजर डालें, तो सबसे पुरानी पार्टी की चिंता समझ में आएगी। उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस की ताकत नगण्य है। इसे कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे अन्य महत्वपूर्ण राज्यों में गठबंधन राजनीति में धकेल दिया गया है, जबकि आंध्र प्रदेश, दिल्ली, ओडिशा और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में यह अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। इसलिए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत न केवल राहुल का मनोबल बढ़ाएगी, बल्कि कांग्रेस को नरेंद्र मोदी से टकराने में सक्षम और भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करेगी।
कांग्रेस को फिलहाल ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की जरूरत है, जो चुनाव जीतने में सक्षम हों। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पार्टी में आत्मविश्वास और चुस्त-दुरुस्त तकनीक की कमी है। केंद्र और इन चुनावी राज्यों (मिजोरम को छोड़कर) में न केवल वह सत्ता से बाहर है, बल्कि खुफिया एजेंसियों, पुलिस या नौकरशाही से भी उसे कोई संकेत नहीं मिल रहा है। यह अलग बात है कि खुफिया एजेंसियों से प्राप्त जानकारी ज्यादातर अविश्वसनीय और गलत होती है।
राहुल इस असमंजस में हैं कि जोड़-तोड़ के पुराने तरीके को आजमाया जाए या मौजूदा विधानसभा के निर्वाचित विधायकों को मैदान में उतारा जाए। मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय लोगों में विरोधी रुझान दिख रहा है। स्पष्ट और अनुभवजन्य अभ्यास के बगैर मौजूदा विधायकों को मैदान में उतारना खतरों से भरा हुआ है। दूसरी तरफ अलोकप्रिय दिख रहे मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं देने के अपने खतरे हैं, क्योंकि जाति-समीकरण और विधायक के खिलाफ लोगों की नाराजगी का सटीक अंदाज नहीं होने पर ऐसा करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। संसदीय लोकतंत्र के ये अपने खतरे हैं, जहां नेता को अपने फैसले पर पछतावा करने का असली खतरा रहता है। कांग्रेस का यह भी एक इतिहास है कि वह अपने क्षेत्रीय नेताओं को महत्व देती है और टिकट वितरण एवं पार्टी उम्मीदवारों के चयन में उनकी निर्णायक भूमिका होती है। ऐसे में राहुल को उपलब्ध विकल्प में से ही चयन करना होगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, कमल नाथ, अशोक गहलौत, सचिन पायलट या मोतीलाल वोरा की सलाह को ठुकराना राहुल के लिए आसान है, लेकिन यदि नतीजे पक्ष में नहीं आए, तो क्या वह जिम्मेदारी लेने को तैयार होंगे और खुद को इसके लिए जवाबदेह ठहराएंगे?
फिर बाहरी लोगों के मुद्दे, अन्य राजनीतिक दलों के बागियों, एनजीओ के सदस्यों, पूर्व नौकरशाह, कृषि क्षेत्र के नेता आदि पार्टी नामांकन के लिए कांग्रेस का दरवाजा खटखटाते हैं। एक बार फिर पार्टी के दावेदारों को छोड़कर बाहरी व्यक्ति को टिकट देने के लिए राहुल ही अंतिम फैसला लेंगे। जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश ठाकोर और हार्दिक पटेल ने गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी को एक विश्वसनीय लड़ाई में बने रहने में भारी मदद की। यदि कांग्रेस बाहरी लोगों को टिकट देती है, तो यह उस विशेष निर्वाचन क्षेत्र में पार्टी के स्थानीय और स्थापित नेतृत्व की कीमत पर होगा।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की योजना बिल्कुल साफ समझ आ रही है। यह शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के 15 साल के शासन के खिलाफ मतदाताओं की नाराजगी पर टिकी है और कांग्रेस को एकमात्र विकल्प के रूप में पेश कर रही है। एससी-एसटी ऐक्ट के खिलाफ सवर्णों में कांग्रेस के पक्ष में भारी झुकाव है। कांग्रेस के प्रबंधकों ने स्पष्ट रूप से माना कि बसपा के साथ गठबंधन नाराज राजपूतों और ब्राह्मणों को फिर से सोचने के लिए मजबूर कर सकता था, जो जनमत बनाने में भी प्रभावशाली हैं। चौहान सरकार के खिलाफ किसानों की बेचैनी पिछले दो वर्षों से दिख रही है। इसके अलावा व्यापमं घोटाला अब भी युवा मतदाताओं एवं पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के जेहन में ताजा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, अजय सिंह एवं अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ एक जीवंत संगठन है, जिनका अपने-अपने इलाकों में प्रभाव है। अगर पार्टी सत्ता विरोधी रुझान और घरेलू प्रतिभा के बल पर चुनाव जीतने में विफल रहती है, तो कोई वजह नहीं कि बसपा-सपा-गोंडवाना के रथ पर सवार होकर उसे जीत मिलती। यही वजह है कि राहुल एवं कमलनाथ ने गठबंधन न करने का जोखिम उठाया।