फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Rahul in emotional grief

भावनाओं के भंवर में राहुल

Fri, 25 Oct 2013 07:17 PM IST
प्रमोद जोशी
प्रमोद जोशी Updated Fri, 25 Oct 2013 07:17 PM IST
विज्ञापन
Rahul in emotional grief

राहुल गांधी अपने राजनीतिक जीवन के बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं। निर्णायक रूप से उनके सफल या विफल होने में अभी कुछ महीने बाकी हैं, पर अंतर्विरोध उजागर होने लगे हैं। उनकी विश्व दृष्टि और राजनीतिक मिशन को लेकर सवाल उठे हैं। अपनी पार्टी का भविष्य वह किस रूप में देख रहे हैं और इसमें व्यक्तिगत रूप से वह क्या भूमिका निभाना चाहते हैं? ऐसे समय में जब उन्हें दृढ़ निश्चयी, सुविचारित और सुलझे राजनेता के रूप में सामने आना चाहिए, वह संशयी और उलझे व्यक्ति के रूप में नजर आ रहे हैं। पहले अपनी मां, फिर पिता, फिर दादी का ज़िक्र करते वक्त बेशक वह अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं और इसका उन्हें अधिकार है। पर इससे विसंगति पैदा होती है। उनके परिवार की त्रासदी पर पूरे देश को हमदर्दी है। वह कहते हैं कि उन्होंने मेरे पिता को मारा, मेरी दादी की हत्या की और शायद एक दिन मेरी भी हत्या हो सकती है। ऐसा कहते ही वह अपने पारिवारिक अंतर्विरोधों का पिटारा खोल रहे हैं। भिंडरांवाले की समस्या पंजाब में अकाली दल को किनारे लगाने की कोशिश का परिणाम थी। और लिट्टे से दुश्मनी की वजह थी 1987 का शांति समझौता। राहुल गरीबों को भरपेट भोजन देने के बाद उन्हें अधिकार संपन्न बनाते-बनाते मुजफ्फरनगर दंगों और आईएसआई तक जा रहे हैं।

विज्ञापन


दूसरी ओर वह देश को युवा सरकार देने का वायदा कर रहे हैं, यह देखे बगैर कि उनकी पार्टी की सरकार कितनी युवा है। पिछले दशक में पार्टी के अनेक युवा इसलिए आगे नहीं आ पाए कि कहीं वे काफी आगे न चले जाएं। कांग्रेस की युवा राजनीति राहुल के इंतजार में खड़ी है। जबकि नवीनतम विस्तार में कैबिनेट में शामिल होने वाले चार मंत्रियों की औसत उम्र 73 साल थी। पार्टी या तो राहुल गांधी का इंतजार कर रही थी या उसकी धारणा कुछ और थी। राहुल गांधी बेशक खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण और कैश ट्रांसफर को ‘गेम चेंजर’ मानते हों, पर असली गेम चेंजर आने वाले समय का नौजवान होगा, जिसका जिक्र एक बार करने के बाद वह भावनाओं के भंवर में गोते लगाने लगे हैं।
विज्ञापन


हाल में एक पत्रिका ने लिखा कि वर्तमान लोकसभा के 36 सदस्यों ने कोई सवाल नहीं पूछा। इनमें राहुल गांधी भी हैं। हाल के वर्षों में देश की युवा राजनीति के नाम पर मजाक होता रहा है, जबकि नरेंद्र मोदी की सभाओं में बढ़ती भीड़ और दिल्ली में ‘आप’ की दस्तक कुछ और कहानी कह रही है। शरद पवार का कहना है कि राहुल को अपनी प्रशासनिक दक्षता साबित करनी होगी। उन्हें काफी पहले सरकार में शामिल होकर अनुभव हासिल करना चाहिए था। पर राहुल प्रशासनिक-राजनीति से बचे रहे। उनका अपने कुछ मित्रों को छोड़ मीडिया, लेखकों, पत्रकारों, अर्थशास्त्रियों या कार्यकर्ताओं से संपर्क नहीं रहा। जब उन्हें घोषणाएं करनी थीं, वह पैराट्रुपर की तरह आए और चले गए। वह संसद में अपनी भूमिका दर्ज करा सकते थे। कोयले को लेकर चल रहे विवाद में भी उन्हें सामने आना चाहिए था।
विज्ञापन
विज्ञापन


वर्ष 2011 में जब सोनिया गांधी स्वास्थ्य कारणों से विदेश गई थीं, तब आधिकारिक रूप से उन्हें पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। पर अन्ना आंदोलन के दौरान वह सामने नहीं आए। यूपीए-2 की सरकार बनते वक्त मनमोहन सिंह ने उन्हें मंत्री बनने का सुझाव दिया, जिसे उन्होंने नहीं माना। पिछले साल जुलाई में दिग्विजय सिंह ने सलाह दी थी कि उन्हें अब प्रधानमंत्री पद सौंप देना चाहिए। उसके बाद सितंबर में इकोनॉमिस्ट ने 'द राहुल प्रॉब्लम' शीर्षक से लिखा कि राहुल ने 'नेता के तौर पर कोई योग्यता नहीं दिखाई है। और ऐसा नहीं लगता कि उन्हें कोई भूख है। वह शर्मीले स्वभाव के हैं, मीडिया से बात नहीं करते और संसद में भी अपनी आवाज नहीं उठाते।'

एक दशक पहले तक राहुल गांधी को लेकर एक प्रकार का रहस्य था। एनडीए की सरकार के पांच साल में उन्होंने कांग्रेस के पक्ष में कोई बड़ी मुहिम नहीं चलाई। विगत 27 सितंबर को उन्होंने दागी जन-प्रतिनिधियों को बचाने वाले अध्यादेश को फाड़कर फेंक देने की बात कहकर अचानक एक बैरियर को पार किया। राहुल ने ये तेवर पहले कभी नहीं दिखाए। क्या है राहुल की राजनीति? गरीब को भरपेट भोजन, शिक्षा का अधिकार और जानकारी पाने का अधिकार। कांग्रेस ने गरीबों को अधिकार देने की राजनीति का सहारा लिया है। इसके साथ ही हाल में उन्होंने इसमें युवा तत्व जोड़ा है। दलित जातियों का नाम लिया है और मुजफ्फरनगर दंगों के संदर्भ में दूसरे दलों को दंगे भड़काने वाला साबित कर मुसलमानों को कांग्रेस की ओर खींचने की कोशिश की है। उन्होंने आर्थिक सुधारों, आर्थिक नीतियों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। शहरीकरण की बात नहीं की। वह शहरों की रैलियों में वे सवाल उठा रहे हैं, जो सामने खड़ी जनता के नहीं हैं।


पर वह भावुक क्यों हो रहे हैं? इस साल जयपुर चिंतन शिविर में उपाध्यक्ष का औपचारिक पद हासिल करने के बाद उन्होंने भावुक हृदय से मर्मस्पर्शी भाषण दिया। उन्होंने कहा कि मेरी मां ने रोते हुए कहा है कि सत्ता जहर के समान है। इसका वरण किया है, तो उन्हें निर्वाह करना होगा। यही उनकी परीक्षा है। राहुल गांधी भावनाओं को भड़काने की राजनीति का जिक्र करते हैं। पर उन्हें तेलंगाना पर भी सफाई देनी होगी, जो आज सिर्फ राजनीतिक कारणों से झुलस रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed