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राफेल विवाद और वायुसेना की मुश्किलें
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भारतीय वायुसेना
इन दिनों राफेल विमान की खरीद को लेकर देश में राजनीतिक विवाद जारी है, लेकिन इस विवाद की आड़ में वास्तव में लड़ाकू विमानों की भारी कमी की अनदेखी की जा रही है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से चिंतनीय है।
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भारतीय वायुसेना की स्वीकृत क्षमता करीब 39.5 लड़ाकू स्क्वॉड्रन विमानों की थी, हालांकि दो मोर्चे पर युद्ध की आकस्मिकताएं पूरी करने के लिए इसे लगभग 42 लड़ाकू स्क्वॉड्रन क्षमता की आवश्यकता है। अभी इसके पास करीब 31 स्क्वॉड्रन हैं और मिग सीरीज लड़ाकू जेट विमान के कम से कम 14 स्क्वॉड्रन 2015 से 2024 के बीच रिटायर होने के लिए निर्धारित हैं। दूसरी ओर, तेजस के करीब 4.5 स्क्वॉड्रन आठ विमानों (आधा स्क्वाड्रन) के साथ वर्ष 2028 तक बेड़े में हर वर्ष शामिल किए जाएंगे। और एसयू -30 एमकेआई के लगभग 2.5 स्क्वॉड्रन का आदेश दिया गया है। इस तरह से लगभग 200 विमानों के विशाल अंतर को देखा जा सकता है।
भारतीय वायुसेना की युद्ध क्षमता के भविष्य के बारे में वायुसेना विशेषज्ञों में व्यापक संदेह दिखाई देता है। उनकी चिंता के केंद्र में बेड़े में लड़ाकू विमानों को शामिल किए जाने की गति और प्रक्रिया है। ये अनिश्चितताएं वास्तव में सरकार के कारण हैं, जिसने फ्रांस के साथ मात्र 36 विमानों की खरीद के लिए समझौते की प्रक्रिया प्रारंभ की, जिसकी कीमत कई गुना ज्यादा हो रही है। सरकार की ओर से मध्यम दर्जे के बहुभूमिका वाले लड़ाकू विमानों की संख्या 126 से कम करने के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। अप्रैल, 2015 में फ्रांस की आधिकारिक यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा संख्या कम करने का निर्णय लिया गया था और दोनों देश 'विमान की आपूर्ति के लिए एक अंतर सरकारी समझौते को पूरा करने के लिए सहमत हुए।'
सुरक्षा मामले पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 8.8 अरब डॉलर के इस राफेल सौदे को प्रधानमंत्री की खरीद की घोषणा के 16 महीने बाद अगस्त, 2016 में मंजूरी प्रदान की। बेशक प्रधानमंत्री के पास ऐसा निर्णय लेने का अधिकार है, मगर सरकार की अपनी प्रक्रियाओं के अनुसार, इसकी सिफारिश करने के लिए एक अधिग्रहण समिति मौजूद है। इस अधिग्रहण समिति की सिफारिश के अभाव में क्या प्रधानमंत्री के लिए मात्र 36 विमानों का ऑर्डर देना उचित है? इस प्रक्रिया में समय की जो बर्बादी हुई, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
मीडिया ने खबर दी कि शीघ्र ही विमान हासिल करने के लिए ऐसा निर्णय लिया गया, लेकिन विडंबना देखिए कि विमान की आपूर्ति सितंबर, 2019 से शुरू होने की उम्मीद है और सब ठीक रहा, तो अप्रैल, 2022 तक सभी विमान मिल जाएंगे।
इस बीच भारतीय वायुसेना की मुश्किलें जारी हैं। खरीद संबंधी घोषणा के तीन साल बाद भी राफेल विमान के बेड़े में शामिल होने संबंधी कोई सूचना न होने की स्थिति में वायुसेना ने अपने तेजी से कमजोर पड़ते बेड़े को भरने की उम्मीद और प्रयास में, लगभग 110 और लड़ाकू जेट, (एक और दो इंजनों वाले) के बारे में सूचना के लिए एक और अनुरोध पत्र जारी किया है। 72 पृष्ठ के इस दस्तावेज की बारीकी से जांच करने से पता चलता है कि यह 2007 में जारी एमएमआरसीए प्रस्ताव की ही पुनरावृत्ति है। इसके अलावा नए अनुरोध पत्र में एकमात्र महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि 'मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) को पर्याप्त स्पष्टता के साथ व्यक्त करना चाहिए, कि उनका प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रस्ताव भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ पहल की दिशा में भारत में विमान के स्वदेशी निर्माण के लिए है।' यह पूरी तरह से अपारदर्शी टाइमलाइन के दायरे में पुनः प्रवेश है।
इस बीच, अप्रैल 2018 में, सरकार ने सुखोई / एचएएल पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (एफजीएफए) के सह-विकास और निर्माण से अपने हाथ खींच लिए। लेकिन इससे पहले इस उद्यम में भारत के करीब 29.3 करोड़ डॉलर और 11 महत्वपूर्ण वर्ष बर्बाद हो गए। इस परियोजना की चुनौतियों से भारतीय इंजीनियरों को उन्नत डिजाइन अनुभवों के साथ प्रभावित करने की उम्मीद थी। सबसे बड़ी बात, इससे भारतीय वायुसेना के बेड़े में पांचवीं पीढ़ी के 127 युद्धक विमान जुड़ते।
अप्रैल 2018 में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद को बताया कि भारत उन्नत मध्यम दर्जे के लड़ाकू विमान (एएमसीए) विकसित करने के लिए 'स्टेल्थ टेक्नोलॉजी' लड़ाकू विमान विकसित करने की योजना बना रहा है और उसके लिए व्यवहार्यता अध्ययन पहले ही पूरा हो चुका है। भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) ने पूर्ण पैमाने पर उत्पादन शुरू करने से पहले एएमसीए प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन चरण शुरू कर दिया था। इसी बीच एडीए ने इस परियोजना में निजी भागीदारी का प्रस्ताव रखा। निजी प्रतिभागियों को दो विमानों का निर्माण, एसेंबलिंग और उसे सुसज्जित करना होगा।
यह एक तरह से नया उदाहरण स्थापित करना था, जिसके तहत पूरे क्षेत्र को विभिन्न चरणों में भाग लेना था, जिसमें विमान की डिजाइनिंग, निर्माण और एसेंबलिंग का काम शामिल था। एडीए का यह मंसूबा एक कल्पना ही है। यह यूटोपिया है, क्योंकि यह निजी प्रतिभागी को पहली एनजीटीडी के लिए केवल 3.5 साल और फ्लाइट परीक्षण के बाद कार्य पूरा करने के लिए कुल छह साल देता है। सबसे बड़ी बात, यह ‘मेक इन इंडिया’ का उद्यम है। अगर यह संभव भी होता है, तो पहला एएमसीए 2030 में ही उपलब्ध हो सकेगा।
इस बीच वायुसेना को 31 ग्राउंडेड जगुआर लड़ाकू विमानों का सहारा लेना पड़ा, जिन्हें 2007 में रिटायर कर दिया गया था। लेकिन यह जटिल, असुरक्षित एवं समय बर्बाद करने वाला है, क्योंकि इन विमानों को वर्तमान में फ्रेंच एयरबेस में स्मारक की तरह रखा गया है।
-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं