लोकप्रिय और ट्रेंडिंग टॉपिक्स

Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Racism will end with inter-caste marriages

अंतर-जातीय विवाह से मिटेगा जातिवाद : इंसान शूद्र पैदा होता है, संस्कारों से उसका दूसरा जन्म होता है

स्वामी अग्निवेश Published by: Avdhesh Kumar Updated Sun, 21 Jul 2019 02:00 AM IST
Swami agnivesh
Swami agnivesh
विज्ञापन
ख़बर सुनें
इस समय बरेली के एक युवा जोड़े के अंतरजातीय प्रेम विवाह की चर्चा जोरों पर है। मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों में इस प्रेम विवाह की धमक सुनी जा रही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रेमी युगल को सुरक्षा देने का आदेश देते हुए दोनों की शादी में किसी भी प्रकार की आपत्ति को खारिज कर दिया है। लेकिन लड़की के परिजनों के पक्ष में सोशल मीडिया पर एक तरह से अभियान चलाया जा रहा है। 


लड़के-लड़की पर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। लड़का-लड़की दोनों बालिग हैं, और दोनों पढ़े-लिखे हैं। कानूनी रूप से दोनों शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन अपनी जान बचाने के लिए हाई कोर्ट और पुलिस प्रशासन से सुरक्षा करने की गुहार लगानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दोनों की शादी के विरोध के पीछे का कारण क्या है?


उक्त मामले में प्रेमी युगल कानूनी रूप से तो शादी करने के योग्य हैं, लेकिन हमारा समाज आज भी अंतरजातीय प्रेम विवाहों को मान्यता नहीं देता है। यहां तो और ही मामला जटिल है। लड़की उच्च जाति और लड़का अनुसूचित जाति का है। लड़की का पिता राजनीतिक-आर्थिक रसूख वाला है। दूसरी तरफ समाज के ठेकेदारों को भी यह मान्य नहीं है कि उच्च जाति की लड़की किसी अनुसूचित जाति के लड़के से शादी करके आराम से अपना जीवन -यापन करे।  

भेद-भाव का यह तो एक पहलू है। अत्याचार के मूल में ही जन्मना जातिवाद है। सामाजिक रूप से भले ही जन्मना जातिवाद को महत्व मिलता हो, लेकिन धार्मिक और कानूनी रूप से जन्मना जातीय श्रेष्ठता का कोई औचित्य नहीं है। जन्म के आधार पर जातीय श्रेष्ठता सृष्टि के नियमों के खिलाफ है। यह मानवतावादी मान्यताओं का भी विरोध करता है। हिंदू धर्म के मूल ग्रंथ वेद और उपनिषद हैं। वेद और उपनिषद में जन्म के आधार पर जाति श्रेष्ठता का कहीं जिक्र नहीं है। 

यहां तक कि स्कंद पुराण में तो स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि- जन्मना जायते शूद्र संस्कारात द्विज उच्यते। अर्थात हर इंसान शूद्र पैदा होता है और संस्कारों से ही उसका दूसरा जन्म होता है। तो जन्म के आधार पर किसी को ऊंच-नीच अपराध है।

जन्म से ही नीच व अछूत घोषित करने का पूरा का पूरा खेल उन चालाक धूर्त जातिवादी तत्वों का है, जो ईश्वर के नाम पर लाभ उठा रहे हैं। जातिवादी-कट्टरपंथी तत्वों ने नियमों के विरुद्ध जाकर जातिवादी व्यवस्था को बनाया-बचाया है। दरअसल, जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का कोई तार्किक-वैज्ञानिक कारण नहीं है। 

कोई धर्म ऐसा कैसे हो सकता है कि जिसमें इंसान को इंसान नहीं माना जाता, बल्कि जन्म से ही उसे नीच और अछूत बता दिया जाता है। ऐसे धर्म की रूढ़ियों को हमें पूरी तरह से इनकार करना चाहिए और ऐसे धर्माचार्यों और जातिवादी ताकतों का विरोध करना चाहिए।

जन्मना जातिवाद का हमारे समाज में समय-समय पर विरोध होता रहा है। इतिहास में कई अवसरों पर इसके खिलाफ तीखा संघर्ष चला है। स्वतंत्रता संग्राम के समय बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने जातिवाद के संपूर्ण उन्मूलन की आवाज उठाई थी। उसके पहले ज्योतिबा फुले जैसे मनीषियों ने जातिवाद के खिलाफ बिगुल बजाया था। 

महर्षि दयानंद ने जन्म के आधार पर श्रेष्ठता को गलत बताते हुए युवा-युवतियों के गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर स्वयंवर प्रथा को पुनर्जीवित करने के लिए प्रबल आग्रह किया है। महात्मा गांधी ने तो संकल्प लिया था कि वह किसी ऐसी शादी में नहीं जाएंगे, जो अंतरजातीय विवाह न हो और नारायण भाई देसाई जो उनकी गोद में खेले थे, उनकी शादी में इसीलिए नहीं गए, क्योंकि वह अंतरजातीय नहीं थी।

हमें अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों के पक्ष में अभियान चलाना होगा, क्योंकि प्रेमी जोड़े किसी दबाव में आकर शादी नहीं करते हैं बल्कि अपने मन के मुताबिक फैसला करते हैं। ऐसे में तार्किक और प्रगतिशील समाज बनाने का सपना देखने वालों को भी आगे आना होगा। सरकारों को ऐसी शादी करने वाले नौजवानों की पूर्ण सुरक्षा करनी चाहिए। 

सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही उनको सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाए और ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों को अच्छे स्कूलों में एडमिशन मिले। अभी तक जहां-जहां मान अभिमान का प्रश्न बना कर 'ऑनर किलिंग' के नाम पर ऐसी हत्याएं हुई हैं, उनकी सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में जल्द से जल्द करके कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान निश्चित किया जाए।

आर्य जगत की बहुत बड़ी विभूति श्री संतराम बीए ने इस काम में अपना जीवन समर्पित किया था और लाहौर में जात-पात तोड़क मंडल का गठन किया था। उसके एक बड़े अधिवेशन में जब बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को अध्यक्षता के लिए बुलाया गया, तो कतिपय कठमुल्ला के विरोध की वजह से वह अधिवेशन रद्द करना पड़ा था।

आज की आर्य समाज को इसका प्रायश्चित करते हिंदू मैरिज एक्ट के तहत विशेष सुविधा 1937 के कानून में मिली है, उसका भरपूर उपयोग करते हुए अंतरजातीय, अंतर धार्मिक शादियों को अंजाम देना चाहिए। अंतरजातीय और दहेजरहित शादियों से एक विशाल बिरादरी बनेगी और वसुधैव कुटुंबकम का सपना साकार होगा। और मनुष्य मनुष्य के बीच में जन्मना जातिवाद का जहरीला कीड़ा पूरी तरीके से समाप्त किया जाएगा।
 
विज्ञापन

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
एप में पढ़ें

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00