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'आप' के चंदे पर प्रलाप
देवप्रिय अवस्थी
Updated Fri, 15 Nov 2013 08:50 PM IST
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कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को यदि अपनी साख की थोड़ी भी चिंता है, तो उन्हें आम आदमी पार्टी यानी आप को मिलने वाले चंदे पर प्रलाप करने के बजाय चंदा उगाही के अपने तरीकों में फौरन बदलाव लाना चाहिए। दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ‘आप’ के एक बड़ी ताकत के रूप में उभरने की संभावना से घबराई कांग्रेस और भाजपा ने उसके गैर-परंपरागत तरीकों से मिलने वाले चंदे को लेकर नाहक प्रलाप शुरू किया है।
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दोनों स्वयंभू राष्ट्रीय पार्टियों को अपने लिए चंदा उगाहने के तौर-तरीकों में कहीं कोई खोट नजर नहीं आता। उन्होंने कभी इस बात की जरूरत भी नहीं समझी कि वे खुद को मिलने वाले अनाप-शनाप चंदे के स्रोतों का सार्वजनिक तौर पर खुलासा करें और बताएं कि इसमें काले धन की कितनी हिस्सेदारी है। ये पार्टियां खुद को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाए जाने के विरोध में भी बेशर्म एकजुटता का प्रदर्शन करती हैं। लेकिन ‘आप’ को देश-विदेश से लगभग 19 करोड़ रुपये चंदा क्या मिल गया, इनकी नींद हराम हो गई। तभी तो केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को इस चंदे की जांच कराने का ऐलान भी करना पड़ा।
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‘आप’ को चंदा मिलने में देश के किसी कानून का उल्लंघन हुआ है, तो सक्षम एजेंसियों से उसकी जांच कराए जाने में कुछ गलत भी नहीं है, मगर जांच का यह फंदा केवल ‘आप’ के गले में ही क्यों डाला जाना चाहिए? कांग्रेस-भाजपा और दूसरी पार्टियों को भी इसके दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए?
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‘आप’ ने पार्टी को मिलने वाले चंदे का ब्योरा अपनी वेबसाइट पर डालकर पारदर्शिता की मिसाल पेश की है। उसकी वेबसाइट पर चंदे की रकम और उसके स्रोत का विवरण कोई भी देख सकता है। बेहतर होता कि कांग्रेस और भाजपा भी ऐसा करतीं, पर वे ऐसा नहीं कर रही है और न ही करना चाहती हैं।
कारण साफ है। उनकी झोली में आने वाले चंदे का एक बड़ा हिस्सा गलत रास्तों और तरीकों से आता है। उनके स्रोतों का खुलासा कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने की गलती भला वे क्यों करना चाहेंगी? कांग्रेस का दामन भ्रष्टाचार के काले दागों से रंगा हुआ है। ज्यादा समय तक सत्ता में रहने के कारण उसे भ्रष्टाचार के दलदल में डूबने-उतराने का मौका भी ज्यादा मिला है, पर भाजपा ने भी काजल की इस कोठरी में घुसने और दाग लगने से बचने में कोई परहेज नहीं किया है। ऐसे में इन दोनों बड़ी पार्टियों को ‘आप’ को मिलने वाले चंदे पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने 2004-05 से 2011-12 की अवधि में छह राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों (कांग्रेस, भाजपा, बसपा, राकांपा, भाकपा और माकपा) को मिले चंदे का विश्लेषण करके कुछ चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। उसके विश्लेषण के मुताबिक, इन सात वर्षों के दौरान इन राष्ट्रीय पार्टियों को मिले कुल 4,895 करोड़ 96 लाख रुपये के चंदे में से 75 फीसदी से ज्यादा की रकम अनाम और अज्ञात स्रोतों से आई है।
सीधे-सीधे कहें, तो यह राशि बेनामी और बेईमानी की कमाई से आई है। कांग्रेस को मिले कुल 2,365 करोड़ 30 लाख रुपये के चंदे में से 1,951 करोड़ 70 लाख रुपये यानी 82.5 फीसदी रकम अज्ञात स्रोतों से आए थे, तो भाजपा को मिले 1,304 करोड़ 22 लाख रुपये में 952 करोड़ 58 लाख रुपये यानी 73 फीसदी के स्रोत का कोई अता-पता नहीं है।
एडीआर की ही एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, ये पार्टियां चेक या डिमांड ड्राफ्ट की जगह नकद चंदा लेने को तरजीह देती आई हैं। वर्ष 2008 से 2012 के दौरान कांग्रेस ने 90.38 फीसदी चंदा नकदी में लिया था और सिर्फ 9.62 फीसदी चेक से। इसी अवधि में भाजपा को मिलने वाले चंदे में नकदी और चेक का अनुपात 63 और 37 का था। दोनों बड़ी पार्टियों को मिलने वाले चंदे में अज्ञात स्रोतों और नकदी का यह अनुपात कहीं किसी बड़ी गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।
एडीआर के इस विश्लेषण को कांग्रेस और भाजपा ने किसी स्तर पर चुनौती नहीं दी है। एडीआर का विश्लेषण तो इन पार्टियों द्वारा चुनाव आयोग के दिए गए विवरण पर आधारित है। इसके अलावा हजारों-हजार करोड़ रुपये के चंदे का तो पार्टियां हिसाब ही नहीं रखतीं। उनके नेता निजी तौर पर जो चंदा उगाहते हैं, उसका भी सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है।
हमारे चुनाव दिन-ब-दिन जितने महंगे होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए बड़ी मात्रा में चंदा उगाहना राजनीतिक दलों के लिए मजबूरी-सा बन गया है। यह चंदा ज्ञात और सही स्रोतों से आएगा, तो सियासी दलों में जवाबदेही का भाव अपेक्षाकृत ज्यादा रहेगा, पर यह अज्ञात स्रोतों से आएगा, तो सियासी दल जवाबदेह भी कम होंगे या उन्हीं लोगों-स्रोतों के प्रति जवाबदेह होंगे, जिन्होंने उनके लिए चंदा जुटाने में भागीदारी की है। इसलिए राजनीतिक चंदे के मामले में पारदर्शिता बरतना बेहद जरूरी है।
कांग्रेस और भाजपा को यदि अपनी साख की थोड़ी भी चिंता है, तो उन्हें चंदा उगाही के अपने तरीकों में फौरन बदलाव लाकर उन्हें ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी बनाना चाहिए। उन्हें इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए कि येन-केन प्रकारेण सत्ता पाना अलग बात है और साख कायम करना अलग बात। केंद्र की मौजूदा यूपीए सरकार सत्ता और साख के इस संबंध का सटीक उदाहरण है, जो सत्ता पर तो काबिज है, पर जिसकी साख रसातल में जा चुकी है।