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सपनों की सजा: बेटियों को सिर्फ बड़ा न किया जाए; जब वे ऊंचे उठें, सामाजिक बेड़ियां तोड़ें तो साथ खड़ा होना अहम
Mon, 14 Jul 2025 06:59 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 14 Jul 2025 06:59 AM IST
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राधिका यादव (फाइल)
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
गुरुग्राम में पच्चीस वर्षीय टेनिस खिलाड़ी राधिका यादव की खुद उसके पिता के हाथों हत्या देश की सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली तो है ही, यह घटना हमारे समाज की उस कुरूप मानसिकता को भी उजागर करती है, जो आज भी महिलाओं की स्वतंत्रता और उनकी महत्वाकांक्षाओं को दबाने की हरसंभव कोशिश करती है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी राधिका ने बचपन से ही टेनिस कोर्ट पर अपनी प्रतिभा का परचम लहराया। उनके पिता, दीपक यादव ने न केवल उसकी प्रतिभा को पहचाना, बल्कि खबरों के मुताबिक, उसके सपनों को साकार करने के लिए टेनिस अकादमी की स्थापना के लिए भारी खर्च भी किया। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि जिस पिता को सुरक्षा का पर्याय माना जाता है, उसी ने गोलियों से उसकी जिंदगी को खत्म कर दिया।
पुलिस की जांच और राधिका की दोस्त के बयानों से पता चलता है कि राधिका का घर ऐसा था, जहां उसकी स्वतंत्रता को लगातार दबाया जाता था। कपड़ों से लेकर लड़कों से बात करने तक और अपनी मर्जी से जीवन जीने के लिए उसे ताने सुनने पड़ते थे। दरअसल, यह घटना हमें पितृसत्तात्मक समाज की उस कड़वी सच्चाई से रूबरू कराती है, जहां बेटियों को पढ़ाने, कॅरिअर बनाने और सपने देखने की इजाजत तो दी जाती है, लेकिन जैसे ही वे अपने पंख फैलाकर उड़ान भरने की कोशिश करती हैं, उन्हें सामाजिक नियमों और परिवार के सम्मान के नाम पर दबा दिया जाता है।
अक्सर लड़कियां हार भी मान लेती हैं, लेकिन वह कमजोरी की वजह से नहीं, बल्कि शांति बनाए रखने के लिए होता है। कहा जा रहा है राधिका के पिता को लोगों के ताने सुनने पड़ रहे थे कि वह बेटी की कमाई पर जी रहा है। ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या एक बेटी की सफलता पिता के लिए शर्मिंदगी का कारण बननी चाहिए? राधिका जैसी बेटियों का हश्र इस सच्चाई को उजागर करता है कि बेटियां आज भी अपने आसपास के लोगों की सोच से किस कदर बंधी हुई हैं।
राधिका की कहानी महज एक हत्या की कहानी नहीं है; यह उस सामाजिक मानसिकता की कहानी है, जो आज भी बेटियों को उनके सपनों के लिए सजा देती है। जब तक समाज बेटियों को बोझ के बजाय संभावनाओं के केंद्र के रूप में नहीं देखेगा, तब तक भारत उस अतीत की जंजीरों में जकड़ा रहेगा, जिससे वह आगे निकलने का दावा करता है। जरूरत इस बात की है कि बेटियों को सिर्फ बड़ा न किया जाए, बल्कि जब वे ऊंचे उठें, सामाजिक बेड़ियों को मात दें, तो उनके साथ खड़ा भी हुआ जाए।