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पब्लिक सुने, पब्लिक सर्वेंट सुनें
अशोक गौतम
Updated Mon, 14 Jan 2013 10:13 PM IST
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दो महीने से डीसी ऑफिस के चक्कर काटता विक्रम बेताल को कंधे से उतारकर अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनावाने नानसेंस बाबू की खिड़की के आगे लगी लाइन में फिर सबसे पीछे जा खड़ा हुआ! दो घंटे बाद कहीं से पब्लिक सर्वेंट गालियां देता आया और सीट पर बैठते ही बड़बड़ाया, यह लाइन देखकर लगता है कि पब्लिक को लाइसेंस लेने के सिवाय और कोई काम नहीं। लगता है, जैसे पब्लिक मरने के बाद बिना लाइसेंस के ऊपर जा ही नहीं सकती। हां बोल, क्या है तेरा?
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साहब! महीने भर से आपके द्वार हाजिरी लगा रहा हूं। मोटर साइकिल का लाइसेंस बन जाता तो...!
तो क्या ऊपर मोटर साइकिल से जाना है? शाम पांच बजे के बाद घर चले आना। और हां, एक दर्जन अंडे भी ले आना। ठीक है साहब! पर लाइसेंस मिल जाएगा न?
हां हां, मिल जाएगा। अब तू बोल, तेरा क्या है?
साहब डंडे का लाइसेंस बनवाना था। चार महीने हो गए, अब तो कृपा कर दो साहब!
क्या करेगा डंडे का लाइसेंस लेकर? पुलिस का सिर फोड़ना है क्या? उसने बिना शर्त माफी मांग ली है। अब क्या चाहते हो? साहब, कुत्तों ने बहुत तंग कर रखा है! लाइसेंसी डंडा मिल जाता तो...!
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ठीक है। शाम छह बजे घर आ जाना और दो मुर्गियां भी लेते आना।
यह सुनते ही बेताल से रहा न गया, सो सबसे पीछे खड़े विक्रम के कंधे पर से ही चीख पड़ा, हे ग्रेट पब्लिक सर्वेंट! एक ही चीज खाओ न यार! या तो अंडे खाओ या मुर्गी ही! दोनों खाओगे तो कल के लिए न अंडे बचेंगे, न मुर्गियां! फिर लोकतंत्र का क्या होगा? थकी लाइन में दबी हंसी फूट पड़ी, तो बाबू भड़का, कौन है यह बदतमीज?
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बेताल ने कहा, पब्लिक, बोले तो मालिक हैं साहब! जिसने आपको अपने काम के लिए रखा है, गालियां सुनने के लिए नहीं। मालिक लाइन में लगा रहता है और नौकर लाल बत्ती जलाए कमरे में दस से पांच सोया रहता है। हे पब्लिक, तुमसे नहीं कहा जाता, तो मुझे ही कहने दो, पर गिड़गिड़ाना छोड़ो। मालिक हो, तो मालिक की तरह जिओ। मैं तो चला, मुझे नहीं आना ऐसे दफ्तर में जहां, नौकर के आगे मालिक हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता हो...तुम सबकी तरह।