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लफ्फाजी का पुआ
मूलचंद गौतम
Updated Sun, 05 Oct 2014 05:18 PM IST
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जब से रामलाल ने सुना कि कलिकाल में केवल गाल बजाने वाले ही पंडित कहलाएंगे, तभी से उनके पौ बारह थे। हर जगह मौका देखते ही वह यह काम शुरू कर देते थे। पिताजी उन्हें कथा वाचन के धंधे में डालना चाहते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके बाद कहीं जजमानी के बारह गांव उनके चंगुल से निकल न जाएं। इसीलिए वह चाहते थे कि रामलाल इस कला में पारंगत हों।
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रामलाल गपोड़ी नंबर वन थे। चलते-चलते किस्से गढ़ने में उन्हें महारत हासिल थी। कोई चतुर सुजान उनकी तथ्यात्मक गलती पकड़ भी लेता था, तो वह अपनी हाजिर जवाबी से उन्हें लाजवाब कर देते थे। अगर वह फिर भी न माना, तो खीसें निपोर कर ऐसी हंसी हंसते थे कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाती थी।
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पिताजी ने उन्हें समझा दिया था कि केवल रामायण और गीता, दो ही किताबें उन्हें जिंदगी में सब कुछ उपलब्ध करवा देंगी। इसी तरह कोई यजमान कायदे का मिल गया, तो पौ बारह। तब से रामलाल इसी के पीछे पगलाए घूमते रहे। उनका एक पैर लखनऊ, तो दूसरा दिल्ली। उनका तीसरा पैर होता, तो उन्हें वह मुंबई में रोपते अंगद की तरह।
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यही थी रामलाल की लीला। उनकी पत्नी का नाम लीला था, जिसे वह प्यार से सत्यनारायण कथा की लीलावती कहते थे। अनुप्रास उनका प्रिय अलंकार था। थ्री डी, फोर पी, कभी थ्री आर, कभी थ्री एस...थ्री उनका प्रिय नंबर। सट्टेबाजी के शौकीनों के लिए फिक्स। कहीं अच्छा मौका लग गया, तो वह हनुमान जी के रोट के नाम पर सवा मनी, ढाई मनी और पांच मनी तक करा देते थे।
रामलाल को खाने में पुए पसंद थे। खीर के साथ मिल जाएं, तो मानो उन्हें अमरपद मिल गया। इसलिए वह सपनों में भी पुए ही देखते थे। मालपुए जैसे उनके गालों में भरे रहते थे, इसलिए उनकी आवाज भी खास तरह की हो गई थी।
रामलाल परसों दिवंगत हो गए। उनकी आखिरी अधूरी इच्छा विदेश जाने की थी। उनके पुत्र-पौत्रों ने कसम खाई है कि वे विदेश तक जजमानी फैलाकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देंगे।