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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Promises, and What of Promises: Bihar’s Dreams Burdened by Politics

वादे हैं, वादों का क्या: बिहार के सपनों पर सियासत का बोझ

Wed, 15 Oct 2025 07:32 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Wed, 15 Oct 2025 07:32 AM IST
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सार
बिहार की राजनीति ने लोगों को जातियों के विभाजनकारी गणित में फंसाकर अंधेरे में छोड़ दिया है। प्रति व्यक्ति आय, बेरोजगारी, शिक्षा इत्यादि के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि बिहार कहां खड़ा है। चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के वायदों ने राज्य को राजनीतिक विरोधाभासों की जीवंत प्रयोगशाला बना दिया है।
 
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Promises, and What of Promises: Bihar’s Dreams Burdened by Politics
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार एक ऐसा राज्य है, जो आकांक्षाओं से लबालब होने के बावजूद अभावों की तस्वीर पेश करता है। वहां की राजनीति ने लोगों को जातियों के विभाजनकारी गणित में फंसाकर अंधेरे में छोड़ दिया है। बिहार इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 25 वर्ष से कम आयु की सबसे युवा आबादी का घर है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीडीपी के पैमाने पर यह अपनी युवा जनसांख्यिकी से काफी नीचे है। बिहार में 13 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं, जो भारत की आबादी का लगभग दसवां हिस्सा है। भारत की 331 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग 3.2 प्रतिशत या मौजूदा कीमतों पर 10.97 लाख करोड़ रुपये है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में कर्नाटक शीर्ष पर है, जहां प्रति व्यक्ति आय 3.80 लाख रुपये सालाना है, राष्ट्रीय औसत 2.35 लाख रुपये है, जबकि बिहार की प्रति व्यक्ति आय सालाना 66,828 रुपये है, जो राष्ट्रीय औसत के एक-चौथाई और कर्नाटक की प्रति व्यक्ति आय के छठे हिस्से से भी कम है। बिहार में भी शिवहर, मधुबनी और अररिया जिलों की स्थिति और भी खराब है, जहां प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत का एक-तिहाई है।



प्रगति के मार्ग पर आज बिहार कहां खड़ा है? आज राज्य की प्रति व्यक्ति आय उतनी ही है, जितनी 2012–13 में भारत की थी। 13.1 करोड़ से ज्यादा की आबादी के साथ बिहार ब्रिटेन और फ्रांस की संयुक्त आबादी जितना बड़ा है। वास्तव में, बिहार मेक्सिको के साथ, जिसकी जीडीपी 18 खरब डॉलर है, 11वें सबसे बड़े देश के रूप में गिना जाएगा। लेकिन लगभग 125 अरब डॉलर के साथ, यह जीडीपी रैंकिंग में इक्वाडोर और प्यूर्टो रिको के साथ साठ के दशक में होगा।


बिहार की यह स्थिति कई जटिल कारणों से है। राज्य में कराए गए जाति सर्वेक्षण के अनुसार, मुश्किल से 15 फीसदी लोगों ने दसवीं उत्तीर्ण की है और मात्र छह फीसदी लोग ही स्नातक हैं। स्कूलों तक पहुंच पर संसदीय रिकॉर्ड में इसका एक कारण स्पष्ट है। बिहार के एक-तिहाई गांवों में प्राथमिक विद्यालय नहीं हैं, 40 फीसदी गांवों में उच्च प्राथमिक विद्यालय नहीं हैं, मात्र 8.5 फीसदी गांवों में माध्यमिक स्कूल हैं और मात्र पांच फीसदी गांवों में उच्च माध्यमिक स्कूल हैं। विकास के मामले में नीति आयोग ने बिहार को राज्यों में 28वें स्थान पर रखा है और पांच वर्षों में उसे मात्र 255 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त हुआ है।

बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, मात्र 6.7 फीसदी श्रमिक सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में कार्यरत हैं। आप सोचेंगे कि इतनी युवा आबादी वाला राज्य कौशल विकास के लिए धन का उपयोग कर सकता है। जुलाई, 2024 में केंद्र सरकार ने संसद को बताया कि उसने कौशल भारत अभियान के तहत बिहार को कौशल विकास योजना के लिए 128.66 करोड़ रुपये आवंटित किए। उसमें से मात्र 36.82 करोड़ रुपये ही जारी किए गए, जिनमें से मुश्किल से 5.96 करोड़ रुपये का ही उपयोग किया गया! वर्ष 2015 से 2022 के बीच, कौशल प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले 7.59 लाख लोगों में से केवल 1.27 लाख लोगों को ही नौकरी मिली।

विडंबना यह है कि बिहार की विपत्तियां हर सरकार में कायम रही हैं। बिहार में 1989 से ‘कांग्रेस-मुक्त’ और 2005 से ‘जंगलराज-मुक्त’ शासन रहा है। लगभग दो दशकों से नीतीश कुमार बिहार की सत्ता में हैं, फिर भी बिहार की स्थिति बदहाल है। चुनाव आयोग ने चुनावों की तारीख घोषित कर दी है। यही वह मौसम है, जब धूल-गर्मी, शोर-शराबे और बयानबाजी के बीच पार्टियां अपने वायदों का पिटारा खोल देती हैं। राजग और राजद के नेतृत्व वाले विपक्षी महागठबंधन के बीच आगामी चुनावी मुकाबला, असल में योजनाओं की होड़ है। दरअसल, पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र अक्सर राजनीतिक अर्थव्यवस्था की हालत का एक जबर्दस्त सबूत होते हैं।

नीतीश कुमार ने तीन बड़े वायदे किए हैं। अगले पांच वर्षों में एक करोड़ नए रोजगार, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं को 10,000 रुपये की नकद राशि, जिसके बाद, आगे भी राशि हस्तांतरित की जाएगी, और स्वयं सहायता भत्ता योजना के तहत बेरोजगार स्नातकों को दो साल तक 1,000 रुपये दिए जाएंगे। इसके अलावा, 1.6 करोड़ परिवारों को 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वायदा भी किया गया है।

राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन भी इसमें पीछे नहीं है। तेजस्वी यादव ने महिलाओं को 2,500 रुपये, 200 यूनिट मुफ्त बिजली, रियायती दर पर गैस सिलिंडर देने का वायदा किया है। यह अब चुनावों में आम बात हो गई है। हालांकि तेजस्वी ने राज्य के हर परिवार के लिए एक सरकारी नौकरी सुनिश्चित करने वाला कानून बनाने का वायदा करके अपनी रणनीति और भी तेज कर दी है। वायदा है कि शपथ ग्रहण के 20 दिनों के भीतर ऐसा कानून पारित किया जाएगा और 20 महीनों में नौकरियां दी जाएंगी!

ये वायदे हकीकत और कल्पना का मिश्रण हैं। अपने 2025-26 के बजट में, बिहार सरकार ने कुल व्यय 2.94 लाख करोड़ रुपये रखा है। केंद्र सरकार से विभिन्न मदों में 1.5 लाख करोड़ रुपये के हस्तांतरण से केंद्रीय वित्त पोषण पर उसकी निर्भरता स्पष्ट होती है। अनुमान है कि बिहार में लगभग 2.76 करोड़ परिवार हैं। अगर यह मानें कि कम से कम 1.5 करोड़ लोगों को नौकरियां देने के बाद न्यूनतम 20,000 रुपये वेतन दिए जाएंगे, तो रोजगार सृजन बनाम वित्त पोषण का यह गणित हैरान करने वाला है! एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा के  एक शोध में बताया गया है कि बिहार चुनाव-पूर्व वायदों पर अपने जीडीपी (जीएसडीपी) का 2.9 फीसदी खर्च करेगा, जो सभी राज्यों में सबसे ज्यादा है। बेरोजगारी का उच्च स्तर उतना ही चिंताजनक है, जितना कि राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे काल्पनिक वायदे।

बिहार वाकई राजनीतिक विरोधाभासों की जीवंत प्रयोगशाला है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन दरारों का प्रतीक है, जो भारत के उत्थान में बाधक हैं। यहां राजनीतिक गुणवत्ता इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें करोड़ों लोगों का जीवन जुड़ा है। राष्ट्र को निष्क्रियता की जो कीमत चुकानी पड़ेगी, वह राजनीतिक दलों द्वारा टाली जा रही लागत से कहीं ज्यादा होगी!

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