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पारदर्शिता का दबाव बढ़ा है

Tue, 19 Nov 2013 05:43 PM IST
jagdeep s chokru जगदीप एस छोकरृ
Updated Tue, 19 Nov 2013 05:43 PM IST
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Pressure for transparancy

आम आदमी पार्टी (आप) को विदेश से मिलने वाले चंदे की जांच के मामले से राजनीतिक दलों की कमाई के स्रोतों के खुलासे से जुड़ी बहस और तेज हो गई है। वैसे देश में पहले से काबिज दल पारदर्शिता बढ़ाने वाले हर कदम का विरोध करते आए हैं। इसलिए आप पर शिकंजा कसने की पहल फिलहाल एक राजनीतिक कार्रवाई ही लग रही है। वित्तीय पारदर्शिता के मामले में तकरीबन हर पार्टी संदेह के घेरे में हैं। इस दिशा में लंबी लड़ाई के बाद कुछ नतीजे हासिल हुए हैं, लेकिन बड़े बदलाव में अभी वक्त लगेगा।


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हमने वर्ष 2006 में राजनीतिक दलों के आयकर संबंधी दस्तावेज हासिल करने की कोशिश की थी, जो हमें 2008 में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) द्वारा हस्तक्षेप करने के बाद हासिल हुआ। उन दस्तावेजों से पता चला कि इन पार्टियों की आय हजारों करोड़ रुपये में है, लेकिन वे आयकर नहीं देतीं। आयकर कानून की धारा 13 (ए) के तहत इन्हें इससे कानूनी छूट हासिल है। लेकिन कानून यह भी है कि 20 हजार रुपये से अधिक के चंदे की सभी जानकारियां चुनाव आयोग को सौंपना जरूरी है। इसी के आधार पर पार्टियां कर में छूट के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। यह तभी संभव है, जब पार्टियां अपने खर्च और कमाई का पूरा लेखा-जोखा उपलब्ध कराएं। लेकिन ऐसा होता नहीं है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिये हमें पता चला कि राजनीतिक पार्टियां अपनी कमाई के 80 फीसदी स्रोतों का खुलासा नहीं करतीं। किसी लोकतंत्र में इससे शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है?

पर इस साल के कुछ अदालती फैसलों के बाद राजनीतिक व्यवस्था में सुधार से जुड़ी उम्मीदों को बल मिला है। मसलन, विगत जून में राजनीतिक दलों को पब्लिक अथॉरिटी (लोक प्राधिकार) मानते हुए केंद्रीय सूचना आयोग ने देश के छह राष्ट्रीय दलों को आरटीआई के दायरे में आने की बात कही। इसके लिए भी काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। हमने आरटीआई के जरिये कई सूचनाएं जुटाईं। जैसे कि पार्टियों के दफ्तरों के लिए कितने सरकारी भवन और कहां-कहां सरकारी जमीनें मिली हुई हैं, दूरदर्शन और आकाशवाणी में चुनाव के दौरान उन्हें कितना समय दिया जाता है। इससे यह साबित हुआ कि राजनीतिक दलों को सरकारी मदद मिलती है। इन्हीं सूचनाओं को आधार बनाकर सीआईसी ने इन्हें पब्लिक अथॉरिटी घोषित किया। लेकिन ये पार्टियां खुद को पब्लिक अथॉरिटी मानने और आरटीआई के दायरे में आने के सीआईसी के फैसले का विरोध कर रही हैं। कायदे से उन्हें इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाना चाहिए था। पर शायद उन्हें आशंका थी कि शीर्ष अदालत सीआईसी के फैसले को जायज करार दे देगी। इसलिए आरटीआई कानून में एक संशोधन करने के लिए राज्यसभा में एक प्रस्ताव पेश किया गया। अब यह प्रस्ताव संसद की एक स्थायी समिति के पास है।

इसी तरह एक अन्य फैसले में जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी लाभ के लिए दिए जाने वाले तोहफे की घोषणा पर रोक लगे। इसी क्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा जाति विशेष को लुभाने के लिए की जानेवाली रैलियों पर रोक लगाने की बात कही थी। चुनाव सुधार की दिशा में सबसे अहम फैसला विगत जुलाई में आया। उसमें शीर्ष अदालत ने ऐसे नेताओं की संसद या विधानसभा सदस्यता रद्द करने का आदेश दिया, जिन्हें किसी मामले में कम से कम दो साल की सजा सुनाई गई हो। अदालत ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति जेल में है, उसे चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं है। इस फैसले के खिलाफ सरकार एक अध्यादेश तक ले आई थी, लेकिन बाद में उसे वापस लेना पड़ा। कॉरपोरेट जगत की तरफ से राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे पर भी संदेह उठते रहे हैं। इस बात की आशंका लगातार बनी रहती है कि राजनीतिक पार्टियां कॉरपोरेट जगत के फायदे के लिहाज से नीतियां बनाती हैं। ऐसे में, खुद उनकी छवि के लिए भी जरूरी है कि वे अपने चंदे के स्रोतों का खुलासा करें। राजनीति को इन बुराइयों से मुक्त करने के लिए कुछ लोग सरकारी फंडिंग की वकालत करते हैं। यह सुझाव अच्छा है, लेकिन इसकी कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं। दरअसल, पार्टियां चंदे का इस्तेमाल चुनाव और अपने बाकी कामकाज के लिए करती हैं। ऐसे में चुनाव के साथ-साथ उनके कामकाज के लिए भी फंडिंग करनी होगी। लेकिन पार्टियां खर्च से संबंधित सही ब्योरे नहीं देतीं। ऐसे में, कैसे पता चलेगा कि उन्हें कितनी फंडिंग की जाए? इस मसले के लिए गठित इंद्रजीत गुप्त समिति ने कहा था कि जब तक राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों में पूरी पारदर्शिता नहीं आती, तब तक इस पर विचार करना उचित नहीं होगा।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों की कोशिशों और मीडिया व अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन की वजह से लोगों में जागरूकता आई है, नतीजतन राजनेताओं पर पारदर्शिता का दबाव भी बढ़ा है। दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को वापस लेना इसका उदाहरण है। पर राजनेता यह मानकर चलने लगे हैं कि जनता के लिए वे जो कानून बनाते हैं, वे उन पर लागू नहीं होते। इसीलिए जनहित में दिए गए अदालती फैसले उन्हें नागवार गुजरते हैं। इन पर टीका-टिप्पणी शुरू हो जाती है और इनसे बचने का रास्ता खोजने के लिए पूरी ताकत झोंक दी जाती है। यह स्थिति बदलनी होगी।

(लेखक एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के संस्थापकों में से हैं)

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