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अंतर के उजास सरीखा गायन, शुद्धता और सहजता की पक्षधर थीं प्रभा अत्रे

Rajesh Kumar Vyas राजेश कुमार व्यास
Updated Mon, 15 Jan 2024 07:40 AM IST
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सार
प्रभा अत्रे अमीर खां साहब की गायकी से आरंभ से ही प्रभावित रहीं। उन्होंने आकाशवाणी में काम करते हुए अमीर खां साहब और बड़े गुलाम अली खां साहब के रिकॉर्ड ढूंढ-ढूंढकर सुने। मुझे लगता है कि किराना घराना में अब्दुल करीम खां साहब के बाद 'सरगम' को गान में जीवंत करने का किसी ने प्रयास किया है, और उसे अपने तईं निखारते हुए अपना नया गान-मुहावरा किसी ने बनाया है, तो वह प्रभा अत्रे ही रही हैं।
 
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Prabha Atre was an advocate of purity and simplicity, know about her
प्रभा अत्रे - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

प्रभा अत्रे का निधन भारतीय संगीत में उस युग का अवसान है, जिसमें गायन के साथ उससे जुड़ी संवेदना, अध्ययन और चिंतन-मनन समाया था। वह गायन में शुद्धता की पक्षधर थीं, परंतु लोक की उस सहजता के प्रति भी उनका आग्रह था, जिसमें गान प्रकृति में घुलकर श्रोताओं को सहज माधुर्य प्रदान करता है। उन्हें सुनते हुए यह अनुभूति होती है कि संगीत ध्यान का गान है। उम्र के आखिरी दिनों तक उनके गान में अनूठा ओज समाया था। भैरवी में उनके गाए बोल जगत जननी, भव तारिणी, तू नव दुर्गा, तू भवानी, महाकाली, तू शिवानी, मंगला... में शब्द-शब्द उजास है।



एक दफा राग मांज खमाज में जमुना किनारे मोरा गांव, सांवरे... में उनके स्वरों पर औचक ध्यान गया था। जिस सहजता से बोल निभाव करते उन्होंने भावों की व्यंजना यहां की है, वह लोक के माधुर्य में समाया उनका अनूठा शास्त्रीय ज्ञान है। सुनेंगे तो पाएंगे कि यहां सांवरे आ जइयो में उनकी शब्द-पुकार विरल है। लगता है, जैसे राग को बहुत जतन से उन्होंने अपने स्वरों का अनमोल गहना पहनाया है। यह सच में, आत्म की पुकार है। स्वरों में शब्द-शब्द यहां जैसे माधुर्य छलक पड़ रहा है। ऐसे ही उनकी एक ठुमरी है, कौन गली गयो श्याम...। इसमें श्याम को ढूंढने की जो स्वर-लगन है, वह चमत्कृत करती है। प्रभा अत्रे के गायन की यही विशेषता है कि वह भावों को सदा जीवंत करती रही हैं। वह सुनने वालों को सदा अपने स्वरों संग बहा ले जाती हैं। उनका समग्र गायन अंतर का उजास सरीखा है।


प्रभा अत्रे अमीर खां साहब की गायकी से आरंभ से ही प्रभावित रहीं। उन्होंने आकाशवाणी में काम करते हुए अमीर खां साहब और बड़े गुलाम अली खां साहब के रिकॉर्ड ढूंढ-ढूंढकर सुने। मुझे लगता है कि किराना घराना में अब्दुल करीम खां साहब के बाद 'सरगम' को गान में जीवंत करने का किसी ने प्रयास किया है, और उसे अपने तईं निखारते हुए अपना नया गान-मुहावरा किसी ने बनाया है, तो वह प्रभा अत्रे ही रही हैं।

प्रभा अत्रे इस मायने में भी अद्वितीय थीं कि शास्त्रीय में लोक और लोक में शास्त्रीय सुगंध घोलते हुए उन्होंने संगीत की अपने स्तर पर नई भाषा रची। उनके शास्त्रीय गायन में लोक का सहज कंठ माधुर्य घुला हुआ है, तो ठुमरी, खयाल, दादरा, गजल, गीत, नाट्यसंगीत और भजनों में शास्त्रीय संगीत के शुद्ध सौंदर्य से भी सहज साक्षात होता है। हर राग में आलाप की उनकी बारीकियां और स्वर-खनक भिन्नता लिए हुए है। किराना घराने की शास्त्रीय संगीत परंपरा में उन्होंने गान में स्वर-संधान से अपनी अलग पहचान बनाई।

वह जब आठ वर्ष की थीं, तभी संयोगवश संगीत की शिक्षा से जुड़ गईं। दरअसल चिकित्सक की सलाह पर उनकी बीमार मां का ध्यान बीमारी से हटाने के लिए घर में एक संगीत शिक्षक रखा गया। लेकिन उनकी मां ने तीन दिन में ही संगीत सीखने से मना कर दिया। तब उसी शिक्षक से प्रभा अत्रे को संगीत सीखने की सलाह दी गई और इस तरह से बचपन में ही संगीत से उनका नाता जुड़ गया।

बाद में उन्होंने सुरेश बाबू मानेकर और हीराबाई बड़ोदकर से बाकायदा संगीत की बारीकियां सीखीं। वह बताती रही हैं, 'संगीत जब सीखना प्रारंभ किया, तो एक साल तक केवल राग यमन ही मुझे सिखाया गया। पर यह जो सीखने की नींव पड़ी, उससे यह बात भी समझ में आई कि कैसे सुर लगाया जाता है। कैसे राग में बढ़त की जाती है और कैसे गायन में भाव लाया जाता है।'

गायन के साथ-साथ वह नृत्य में भी पारंगत थी। 'स्वरमयी', 'स्वरली', 'स्वरांगिनी' और 'स्वरांजलि' जैसे संगीत-शोध में उन्होंने भारतीय संगीत से जुड़ी परंपरा को भी अपने तईं संजोया है। उनके आलाप, तान और शब्दों की जोड़बंदी में परंपरागत सौंदर्य की मिठास है, तो परंपरा की वह बढ़त भी है, जिसमें कोई कलाकार अपनी निजी शैली विकसित करते हुए राग को अलंकृत करता है।

पुणे में 13 सितंबर, 1932 को जन्मी प्रभा अत्रे को 'संगीत नाटक अकादमी', 'गानप्रभा' आदि कई पुरस्कारों के साथ पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सम्मान भी प्रदान किया गया। आज वह नहीं हैं, पर उनकी आवाज की खनक, उनमें समाई स्वर-शुद्धता और चमत्कृत करती 'सरगम' हमें उनकी याद दिलाती रहेगी।

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