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कितनी दूर जा सकते हैं अखिलेश

Tue, 08 Nov 2016 06:30 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Tue, 08 Nov 2016 06:30 PM IST
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Possiblities of Akhilesh in UP
नीरजा चौधरी

बीते तीन नवंबर को जब अखिलेश यादव की रथयात्रा शुरू हुई, तो सामने सड़क पर युवाओं की भारी भीड़ के कारण रथ मुश्किल से घिसट रहा था। दोनों तरफ लोग उत्साह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के ट्रेडमार्क लाल टोपी लहरा रहे थे। इस दृश्य ने उन दिनों की याद दिला दी, जब राजीव गांधी के शासन में भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह सड़कों पर उतरे थे। वर्ष 1987 में वीपी सिंह की वह यात्रा 415 सांसदों वाले गठबंधन सरकार के मुखिया के तौर पर राजीव गांधी को सत्ता को हटाकर ही खत्म हुई। और लगभग तीस वर्ष पहले के उसे झटके से देश की सबसे पुरानी पार्टी अब तक उबर नहीं सकी है। यह वही यात्रा थी, जिसके कारण वर्ष 1990 में मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे।

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महत्वपूर्ण बात यह है कि अखिलेश के 'विकास से विजय यात्रा' में ही भीड़ नहीं थी, बल्कि दो दिन बाद जब उनके चाचा और समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव के नेतृत्व में रजत जयंती समारोह हुआ, तो उसमें और ज्यादा भीड़ थी। यह अखिलेश के प्रति युवाओं की जीवंत प्रतिक्रिया थी। भीड़ में काफी हद तक युवा थे, जो उत्साह से अखिलेश के समर्थन में नारे लगा रहे थे, उनके साथ स्वयं को जोड़ रहे थे और इसलिए मुलायम सिंह यादव को यह नसीहत देनी पड़ी कि वे जोश के साथ होश में रहें। लखनऊ-उन्नाव सड़क पर आगे बढ़ते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश मर्सीडीज से उतर कर खुली इनोवा में यात्रा करने लगे, इस दौरान प्रचलित लोकप्रिय मूड की कई बातों का खुलासा हुआ। गांवों के आम लोगों और सड़क किनारे के ढाबों पर उपस्थित लोगों के मन में अखिलेश को लेकर कोई नकारात्मक धारणा नहीं है, चाहे वे सपा को वोट दें या न दें। सपा के समर्थक पार्टी में झगड़े के लिए शिवपाल यादव को दोषी ठहरा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि कोई भी इस संदर्भ में अमर सिंह का नाम नहीं लेता।
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यह पूछने पर कि क्या होता अगर पार्टी टूट जाती, तो लोग इस आशंका को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं, 'अगर नेताजी अपना हाथ ऊपर करने की योजना बनाते हैं, तो उन्हें ऐसा नहीं करने दिया जाएगा।' अगर फिर भी पार्टी टूट गई, तो क्या होगा, तो यादव जाति के बूढ़े लोग भी कहते हैं कि 'वे अखिलेश के साथ जाएंगे, नेताजी को उन्हें पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए।'
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दिलचस्प बात यह है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता भी कम नहीं हुई है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि वह अच्छा काम कर रहे हैं। जितने लोगों से मैंने बात की, ज्यादातर ने कहा कि प्रदेश में ज्यादातर जगहों पर मुख्य मुकाबला भाजपा और किसी दूसरी पार्टी के बीच होगा। विरोधाभासी बात यह है कि समाजवादी पार्टी के हालिया झगड़े से अखिलेश यादव की स्थिति मजबूत हुई है, लोगों में उनके प्रति सहानुभूति पैदा हुई है। इससे कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उनकी सरकार की खामियों के प्रति लोगों की नाराजगी कम करने उन्हें मदद मिली है। लोग तो ऐसी बातें भी कर रहे हैं कि 'इनको क्यों सताया जा रहा है?'

स्पष्ट है कि अखिलेश यादव खासकर उत्तर प्रदेश में युवाओं के लिए एक नए आइकन के रूप में उभरे हैं। चुनावी प्रक्रिया में युवाओं की सक्रियता तेजी से बढ़ी हैैं। अखिलेश की वजह से लोग सपा को विकासवादी पार्टी मानने लगे हैं, जबकि अतीत में पार्टी अपने असभ्य रवैये और जाति आधारित राजनीति के लिए जानी जाती थी। शहरी मध्यवर्गीय भी युवा अखिलेश को नई नजर से देखता है। स्पष्ट है कि उन्होंने मोदी की रणनीति को अपनाकर विकास पर ध्यान केंद्रित किया है, खासकर पिछले दो वर्षों में। और उनकी युवा टीम मीडिया और सोशल मीडिया का उपयोग करके मोदी की तरह 'ब्रांड अखिलेश' की उनकी छवि तैयार करने में जुटी है।

इस बात की संभावना है कि 2017 के चुनाव में अखिलेश गेमचेंजर बनकर उभर सकते हैं, पर यह इस पर निर्भर करेगा कि आगे वह पार्टी का भविष्य बनते हैं या नहीं और पिता और चाचा के अंकुश के बिना अपनी इच्छा के मुताबिक पार्टी का स्वरूप तय करने का अधिकार उन्हें मिलता है या नहीं। आने वाले दिनों में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने भाई शिवपाल की तरफदारी जारी रखते हैं, सार्वजनिक रूप से अखिलेश को डांटते हैं, उन्हें टिकट बंटवारे का अधिकार नहीं देते हैं और पार्टी में झगड़ा चलता रहता है, तो निश्चित रूप से सपा अपना जनाधार खो देगी।

अगर अखिलेश यादव को चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाकर उन्हें सार्वजनिक तौर पर मजबूत किया जाता है तो सपा के मुख्य वोट बैंक मुस्लिम-यादव के अलावा 'अन्य' जातियों के युवा और महिलाएं भी पार्टी की ओर आकर्षित हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश में ज्यादातर मुस्लिम पहले से ही बसपा के बजाय सपा को पसंद करते हैं, बशर्ते कि वह दौड़ में रहे और खासकर भाजपा को चुनौती दे सके। उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रतिबद्ध वोट बैंक से बाहर 'अन्य' श्रेणी के मतदाता महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने 2007 में मायावाती को 2012 में अखिलेश यादव में सत्ता दिलाई।


अखिलेश के ज्यादातर युवा सहयोगी चाहते हैं कि अगर उन्हें खुली छूट नहीं दी जाती है, तो वह पार्टी तोड़ दें और जनता के पास जाएं। उनका मानना है कि इससे राज्य में उनको लेकर एक हवा बनेगी और प्रदेश की राजनीति को बदल देगी। बेशक यह एक विकल्प है, जिसे अखिलेश अभी खारिज करते हैं, पर नई पार्टी बनाना, फंड जुटाना, बूथ स्तर पर ढांचा तैयार करना और कुछ ही महीनों के भीतर एक नए चुनाव चिह्न को लोकप्रिय बनाना आसान नहीं है। हालांकि दिवंगत नेता देवी लाल कहते थे कि 'माहौल' ही अंततः चुनाव के नतीजे तय करता है। कहने की जरूरत नहीं है कि पार्टी में हाल के झगड़े और मतभेद के कारण मौजूदा स्थिति में समाजवादी पार्टी ने अपनी जमीन खो दी है। अब सब कुछ इस पर निर्भर है कि अखिलेश को कितनी छूट मिलती है या वह नई शुरुआत करने का साहस दिखाते हैं, वरना उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच ही दिख रहा है।

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