{"_id":"6a2220ed30b11cef52037e1c","slug":"politics-tmc-political-developments-in-west-bengal-are-a-product-of-discontent-an-open-form-of-rebellion-2026-06-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"सियासत: असंतोष की उपज है पश्चिम बंगाल में तृणमूल का राजनीतिक घटनाक्रम, यह खुला रूप है बगावत का","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
सियासत: असंतोष की उपज है पश्चिम बंगाल में तृणमूल का राजनीतिक घटनाक्रम, यह खुला रूप है बगावत का
Fri, 05 Jun 2026 06:35 AM IST
Pavan
अमर उजाला
अमर उजाला
Published by: Pavan
Updated Fri, 05 Jun 2026 06:35 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के इतिहास की सबसे बड़ी बगावत ने पार्टी नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जो साफ तौर पर असंतोष की उपज है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
ऋतब्रत बनर्जी
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक राजनीतिक दल की आंतरिक कलह की कहानी नहीं, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर लंबे समय से पनप रही बगावत का खुला रूप है, जो ममता बनर्जी के एकछत्र किस्म की राजनीतिक शैली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यह स्थिति इस वजह से असाधारण है, कि तृणमूल कांग्रेस को एक जनवरी, 1998 को अपनी स्थापना के बाद पहली बार इस स्तर की टूट का सामना करना पड़ रहा है।तृणमूल के 80 में से 58 विधायकों ने ममता की जगह पूर्व सीपीआई (एम) नेता और बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए व इस हफ्ते की शुरुआत में ही पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते निष्कासित हुए ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुन लिया है और विधानसभा अध्यक्ष ने इसे मंजूरी भी दे दी है। जबकि, ममता बनर्जी ने इस पद के लिए पार्टी के दिग्गज नेता शोवनदेब चट्टोपाध्याय का समर्थन किया था। इस घटनाक्रम को असाधारण मानने की दूसरी वजह यह है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है, जब चुनाव नतीजे आने के तुरंत बाद ही पार्टी का एक बड़ा हिस्सा शीर्ष नेतृत्व से विद्रोह कर बाहर चला गया हो।
इसकी तुलना महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और अजित पवार के मामले से नहीं की जा सकती, क्योंकि यह विद्रोह सत्ता की चाह में नहीं किया गया है। दरअसल, पश्चिम बंगाल का यह घटनाक्रम महज संख्याबल का मामला नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की भी परिणति है, जिसमें पार्टी का पूरा ढांचा एक व्यक्ति और उसके करीबियों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाता है। लोकतंत्र की परीक्षा राजनीतिक दलों के भीतर भी होती है। यदि पार्टी में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कमजोर हों, संवाद की गुंजाइश न हो और नेतृत्व पर सवाल उठाना असंभव हो जाए, तो देर-सवेर असंतोष विस्फोटक रूप ले ही लेता है।
तृणमूल कांग्रेस में जो हुआ, वह इसी सच्चाई की याद दिलाता है। तृणमूल कांग्रेस में हुई इस बगावत पर निस्संदेह भाजपा की पैनी नजर होगी, क्योंकि संसद में उसके महत्वाकांक्षी विधेयकों के लिए आवश्यक संख्याबल पाने में यह स्थिति राजनीतिक तौर पर फायदेमंद हो सकती है। किसी राजनीतिक दल के करीब तीन-चौथाई विधायक अलग रास्ता चुन लें, तो यह उस संगठन के लिए गंभीर झटके से कम नहीं है। ऐसे में, ममता बनर्जी के लिए यह निश्चित ही आत्ममंथन का समय है, क्योंकि फिलहाल उनकी सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की है।