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मंदिर पर ये निगाह
शंभूनाथ शुक्ल
Updated Wed, 03 Jul 2013 09:17 PM IST
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उत्तराखंड में आई आपदा में तबाह हो चुके केदारनाथ मंदिर को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। इसे बनवाने के लिए उत्तराखंड सरकार और भाजपा में तो होड़ मची ही है, तमाम उद्योगपति भी आगे आ रहे हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वाधिक प्रतिष्ठित केदारेश्वर महादेव का मंदिर यहां कब बना, इसकी कोई निश्चित तारीख तो नहीं पता, लेकिन आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। यह मंदिर तब बौद्ध वामाचारियों के पास था।
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महायान संप्रदाय के वाममार्गी तिब्बत के रास्ते आए और यहां काबिज हो गए। नाथ आदि कनफटा संप्रदाय के लोग इन महायान बौद्धों के ही वंशज हैं। आदि शंकराचार्य ने इसे पौराणिक शिव मंदिर बनाने की कल्पना की थी। कल्चुरी शैली में बने इस मंदिर को किसने यहां बनवाया, यह हालांकि रहस्य है। राहुल सांकृत्यायन ने इसे 12-13 वीं सदी का बताया है।
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यायावर राय प्रभाकर प्रसाद ने अपनी किताब बस्ती-बस्ती पर्वत-पर्वत में लिखा है कि हिमालय के पहाड़ों पर चंद्रवंशी राजाओं ने 1315 से 1823 तक राज किया। उससे पहले कटोच राजे राज करते रहे थे, लेकिन 10वीं सदी में पूरब की तरफ के अधिकांश पहाड़ी प्रदेश पर तिब्बत के बौद्ध राजे काबिज हो गए और कटोच राजाओं की सत्ता धीरे-धीरे कांगड़ा या नगर कोट तक सीमित हो गई। पर कटोच और चंद राजाओं के बीच करीब 500 वर्षों का फासला है। इस बीच यहां का इतिहास उपलब्ध नहीं है।
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यदि राहुल सांकृत्यायन की बात मानी जाए, तो भी यह चंद राजाओं के पूर्ववर्ती किसी राजा का निर्माण है। तब यहां का शासक कौन था, यह ज्ञात नहीं है। केदारनाथ मंदिर के पंडों की बहियों में भी 17वीं सदी के पहले का लेखा-जोखा नहीं मिलता। यह भी कहा जाता है कि 14वीं, 15वीं और 16वीं सदी में यह पूरा इलाका बर्फ से ढक गया था और करीब तीन सौ वर्षों तक मंदिर अंधेरे में ही रहा।
कल्चुरी शैली में बने इस मंदिर को चंद राजाओं द्वारा बनवाया गया मानना अंग्रेज इतिहासकारों को भी सही नहीं लगा था। उत्तराखंड के सारे प्राचीन मंदिर इसी शैली में बने हैं। आदि शंकराचार्य जिन दक्षिणात्य ब्राह्मणों को लाए थे, वे चूंकि गढ़वाल में ही बस गए, इसलिए हो सकता है कि उन्होंने केरल से शिल्पी बुलाकर मंदिरों का निर्माण कल्चुरी शैली में करवाया हो। वैदिक हिंदू धर्म में प्रवेश के पहले से शिव की प्रतिष्ठा रही है। इसीलिए केदारेश्वर मंदिर में पाली में लिखे ताम्रपत्र भी मिले हैं। मान्यता है कि आदि शंकर के पहले वहां शैव जाया करते थे। और ये वामाचारी बौद्ध पूरे आर्यावर्त और दक्षिणापथ से आए थे, इसलिए संभव है कि वे अपने साथ इस स्थापत्य शैली को भी लाए हों।
1974 में बद्रीनाथ मंदिर को आधुनिक शैली में बनवाने के लिए बिड़ला परिवार ने एक अभियान चलाया था, जिसे कांग्रेस और जनसंघ के अलावा स्थानीय पंडों का भी समर्थन था। लेकिन चिपको आंदोलन के नेता चंडी प्रसाद भट्ट ने उस अभियान का विरोध करते हुए कहा था कि बद्रीनाथ मंदिर को उसी उत्तराखंड शैली में रहना चाहिए, जैसे कि केदारेश्वर, जागेश्वर आदि महादेव मंदिर तथा गंगोत्री व यमुनोत्री के मंदिर बने हैं। इसलिए इन मंदिरों के पुनर्निर्माण का मतलब है इनकी विशिष्ट स्थापत्य कला से खिलवाड़।
लेकिन जिस तरह की राजनीति शुरू हो गई है, उससे लगता यही है कि देर-सबेर यह मंदिर अपनी पुरानी स्थापत्य कला को खो देगा। इस अभियान में बद्री-केदार के शंकराचार्य स्वरूपानंद तथा मंदिर के मुख्य रावल भीम शंकर लिंगा के बीच जैसी बयानबाजी हो रही है, उससे लगता यही है कि मंदिर का पुनरोद्धार होगा जरूर, भले वह मंदिर की शुद्धता-पवित्रता के नाम पर हो या यात्रा फिर से शुरू कराने के नाम पर। उत्तराखंड की आय का बड़ा स्रोत इन चार धामों की यात्रा ही है। इसी साल करीब 25 हजार करोड़ रुपये की आमदनी का लक्ष्य निर्धारित था।
केदारनाथ धाम समाप्त होने से आने वाले यात्री बद्रीनाथ का रुख भी नहीं करेंगे, क्योंकि बिना केदार गए बद्री जाने की लालसा कम तीर्थयात्रियों में होगी। तय है कि अब जो भी मंदिर केदारनाथ धाम में बनेगा, वह पुरानी शैली में तो नहीं ही बन सकता। केदारनाथ मंदिर का चढ़ावा और होने वाली आय उत्तराखंड सरकार को ललचा रही है कि पहले मंदिर बनाया जाए, भले अन्य राहत कार्य हों अथवा नहीं।