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शरीफ के कुनबे की सियासत

Fri, 08 Apr 2016 12:27 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Fri, 08 Apr 2016 12:27 PM IST
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Politics of Nawaj sharif family
मरिआमा बाबर

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सांसद एतिजाज अहसन जब जेल में थे, तब उन्होंने पाकिस्तान के इतिहास पर एक किताब लिखने का फैसला किया। पाकिस्तान की जड़ को हड़प्पा के दिनों में ढूंढने और सिंधु नदी के किनारे बसे लोगों की भूमिका को रेखांकित करने की कोशिश इंडस सागा (सिंधु कथा) नामक इस पुस्तक में की गई है। कुछ समय पहले एक रात्रिभोज के अवसर पर खुशनुमा माहौल में मैंने एतिजाज से पूछा कि कितने समय तक खासकर पंजाब के लोगों को पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज समूह) के शासन में गुजारना होगा, क्योंकि पाकिस्तान के राजनीतिक क्षितिज पर फिलहाल उसका कोई विकल्प नहीं दिख रहा।

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'हां, हमारे पोते और उनके पोते हमजा शरीफ तृतीय और शहबाज शरीफ चौथे के कारनामों के बारे में पढ़ेंगे।' एतिजाज की टिप्पणी का मतलब है कि शरीफ परिवार के बच्चों की किस्मत में पाकिस्तान पर शासन करना लिखा है। हालांकि एतिजाज मजाक कर रहे थे, लेकिन बहुत से लोगों का कहना है कि जैसे-जैसे वर्ष 2018 का संघीय चुनाव और चार प्रांतों के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, शरीफ परिवार पंजाब में सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। पंजाब ही वह प्रांत है, जो मुल्क के अगले प्रधानमंत्री का फैसला करेगा। कम से कम इस समय तो उन्हें चुनौती देने वाला कोई नजर नहीं आता।
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इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) पंजाब में मुस्लिम लीग के वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है और 2013 के चुनाव में उसने कुछ सीटें भी जीतीं, पर लोगों ने इस पर भरोसा नहीं किया, तो इसके जिम्मेदार खुद इमरान खान ही हैं।
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पीटीआई खैबर पख्तुनख्वा में सरकार बनाने में कामयाब रही, जहां लोग अस्फंदयार वली खान की अवामी नेशनल पार्टी की भ्रष्ट और निकम्मी सरकार से परेशान थे, जिसने वहां पहली बार सरकार बनाई थी। लेकिन सैन्यतंत्र की शह पर इमरान खान ने इस्लामाबाद में महीने भर तक धरना दिया, जिसने राजधानी में हर चीज को पंगु बना दिया था। चूंकि इस्लामाबाद एक छोटा-सा शहर है, इसलिए वह पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों से आए हजारों लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं करा सका। संसद भवन और पाकिस्तान टेलीविजन के मुख्यालय पर हमला आखिरी कोशिश थी। ठंड और बारिश में जुटे उनके समर्थक धीरे-धीरे अपने घरों को लौटने लगे थे। आलोचक पूछते हैं कि इमरान खान ने खैबर पख्तुनख्वा पर ही ध्यान केंद्रित क्यों नहीं किया, जो शासन के लिए सबसे मुश्किल प्रांत है, क्योंकि सुरक्षा को लेकर वहां एक मजबूत सरकार की दरकार है।

लोकतंत्र के असली मंच संसद में सरकार को घेरने के लिए इमरान खान शायद ही कभी पहुंचते हैं। इसके बजाय वह बड़ी रैलियां करने, सड़कों को रोकने और उपद्रव करने का शौक रखते हैं। धीरे-धीरे वह अपने समर्थक खोते जा रहे हैं, क्योंकि लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय उनका एक मात्र उद्देश्य किसी तरह से प्रधानमंत्री आवास पहुंचना है।

यह हकीकत है कि इमरान के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। वह यथास्थिति को खत्म कर बदलाव लाना चाहते हैं और आज की राजनीति में ताजगी भरना चाहते हैं। पर वह लगातार अपनी नीतियों में यू-टर्न लेते हैं, जो उनके समर्थकों को असंगत लगता है।

पंजाब में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का अस्तित्व खत्म होने की तमाम वजहें हैं। आसिफ अली जरदारी ने भुट्टो की पार्टी पीपीपी को बर्बाद किया और जैसे ही चुनाव नजदीक आए, उसके ज्यादातर समर्थक इमरान खान या नवाज शरीफ की पार्टी में शामिल हो गए। जब कराची में ऑपरेशन क्लीन अप शुरू हुआ, तो जरदारी के भ्रष्टाचार के खिलाफ सबूत सामने आते गए, जिसमें माफिया की तरह पीपीपी का इस्तेमाल किया गया था। बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल हालांकि राजनीति में शिरकत करते दिखते हैं, पर अब भी वह पाकिस्तान की जटिलताओं को समझने की दृष्टि से राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और सिंध के शहरी इलाकों में पीपीपी की अब भी पकड़ है, जहां आत्मनिर्वासित अल्ताफ हुसैन के मुत्तिहादा कौमी मूवमेंट की मजबूत पकड़ है। हर कोई जानता है कि राजनीतिक फैसलों पर बिलावल का कोई नियंत्रण नहीं है, अब भी सभी राजनीतिक फैसले उसके पिता और चाचियां लेती हैं। हालांकि राजनीति में नौसिखुआ और पीपीपी में लोकप्रिय बिलावल के बारे में अंदाजा लगाना अभी जल्दबाजी होगी कि वह अपने नाना और मां के मानकों पर खरे उतरते हैं या नहीं।

पाकिस्तान में कुछ लोग उसकी तुलना राहुल गांधी से करते हैं। समय के साथ राहुल परिपक्व हुए हैं और आज ज्यादा प्रभावशाली बन गए हैं, पर पीपीपी की तरह कांग्रेस भी अपना जनाधार वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है। बलूचिस्तान में मुस्लिम लीग और कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की गठबंधन सरकार है।


पाकिस्तान में कोई इस बात से इन्कार नहीं कर सकता कि सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी सैन्यतंत्र है। नवाज शरीफ ने अपने तीसरे कार्यकाल में यह साबित किया है कि सैन्य प्रतिष्ठान को चुनौती देने का कोई मतलब नहीं है। इसके बजाय बेहतर होगा कि उसे साथ लेकर पाकिस्तान जिन महत्वपूर्ण मुद्दों से जूझ रहा है, उन पर एक कामकाजी रिश्ता बनाया जाए।

लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं

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