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विकास की राजनीति है मुद्दा
हेमंत
Updated Sun, 04 Oct 2015 07:22 PM IST
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बीसवीं सदी में भारतीय लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सत्ता-राजनीति में परिवर्तन और विकास के मद्देनजर बिहार सबसे बड़ी ‘प्रयोगशाला’ रहा है। बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशक में देश में हुए ‘राजनीति के विकास’ का इतिहास इस बात का भी गवाह है कि बिहार में हुए चुनाव देश के राजनीतिक भविष्य और सत्ता-राजनीति की दिशा के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुए।
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बिहार विधानसभा का होने वाला चुनाव यहां इक्कीसवीं सदी का तीसरा चुनाव है। पिछले एक दशक में हुए दो चुनावों से संकेत मिल चुका है कि ‘बीमारू’, पर ‘जुझारू’ बिहार एक और मामले में देश का सबसे बड़ा ‘प्रयोगस्थल’ बन चुका है। यह ‘राजनीति का विकास’ नहीं, बल्कि ‘विकास की राजनीति’ का मामला है। और, अब आगामी चुनाव के मद्देनजर दो मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के जो रणनीतिक सूत्र प्रकट हो रहे हैं, उनसे संकेत मिल रहा है कि यह चुनाव ‘विकास की राजनीति’ के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित होगा। पिछले दो चुनावों की तरह इस चुनाव में भी ‘विकास’ मुद्दा नहीं है, यह कहना यदि गलत नहीं, तो सही भी नहीं है। इसमें ‘विकासवाद’ मुद्दा बनेगा, जिसके तहत ‘विकासवाद’ की दो धारणाएं आमने-सामने होंगी। यह टक्कर लोकसभा चुनाव में यूपीए और राजग गठबंधनों के बीच एक ही तरह के आर्थिक विकास की ‘नीति’ पर हुई टक्कर से अलग होगी।
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एनडीए गठबंधन बिहार का चुनाव नरेंद्र मोदी की ‘छवि’ के सहारे लड़ने जा रहा है। इस छवि का मुख्य नारा है-सबका साथ, सबका विकास। जबकि ‘महागठबंधन’ नीतीश कुमार की ‘छवि’ के सहारे लड़ेगा, जिसका नारा है-सामाजिक न्याय के साथ विकास। आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के आधार पर उत्तर एवं दक्षिण में बंटे बिहार के लिए पार्टी नेताओं के व्यक्तिगत प्रभामंडल, पार्टी संगठन का प्रभाव, जातिगत आधारों पर आबादी की सघनता और जोड़-तोड़ के जातिगत व सांप्रदायिक समीकरणों के योगा से संभावनाओं की कई वैकल्पिक तस्वीरें उभारने की कसरत भी शुरू हो गई है। जातिगत ध्रुवीकरण के नए फॉर्मूले बनाने और कई पुराने मिथकों को तोड़ने की कोशिश भी हो रही है। अगड़ा-अगड़ा के बीच की दूरियां पाटने की कोशिश हो रही है और पिछड़ा-पिछड़ा के बीच स्वाभाविक माने जानेवाले रिश्तों का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है। इससे यह सवाल फिर सामने है कि चुनाव में ‘अगड़ावाद बनाम पिछड़ावाद’ का फॉर्मूला चलेगा या ‘पिछड़ावाद बनाम पिछड़ावाद’ का।
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‘अगड़ावाद’ और ‘पिछड़ावाद’ का निहितार्थ समझने के लिए यहां ‘रामविलास पासवान फैक्टर’ का उल्लेख पर्याप्त होगा। लोजपा एनडीए गठबंधन में सबसे बड़ा घटक है। बिहार से जुड़ी केंद्र की राजनीति में पासवान का पदार्पण ‘अगड़ावाद’ पोषित आरक्षण नीति के तहत हुआ, पर उनका विकास हुआ ‘पिछड़ावाद’ पोषित चुनावी रणनीति से। वह दलितों के नेता नहीं, दलित नेता हैं। उनका सांसद से मंत्री बनने और एनडीए से लेकर यूपीए सरकारों तक में मंत्री पदों पर पहुंचने की यात्रा यह प्रमाणित करती है। लोजपा रामविलास जी को केंद्र की कथित राष्ट्रीय सत्ता-राजनीति में स्थायित्व देने के लिए बनी थी। पर क्षेत्रीय राजनीति के बिना राष्ट्रीय राजनीति में अब कोई किसी को नहीं पूछता। सो रामविलास ने बिहार चुनाव में भी लोजपा को उतार दिया। हालांकि पहले भी वह सत्ता की कीमत पाने-देने के लिए लालू के पिछड़ावाद से लेकर नीतीश के पिछड़ावाद तक के किसी भी पैकेजिंग में पेश होने को तत्पर थे।
बिहार की चुनावी राजनीति के संदर्भ में दो तथ्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती। एक यह कि ‘अगड़ा वर्चस्व’ की छवि लेकर कोई गठबंधन बिहार में अब सत्ता पर कब्जे की कल्पना नहीं कर सकता। दूसरा यह कि बिहार में ऐसे विधानसभा क्षेत्रों की संख्या कम है, जहां कोई प्रत्याशी सिर्फ अगड़ा या सिर्फ पिछड़ा वोट से अपनी जीत पक्की कर सके। सिर्फ भूमिहार या सिर्फ राजपूत, सिर्फ यादव या कुर्मी-कोइरी या सिर्फ अल्पसंख्यक के वोट पर निर्णायक मानी जा सकनेवाले विधानसभा क्षेत्रों की संख्या पांच से 15 होते-होते दम तोड़ती नजर आती हैं। किसी एक जाति को पार्टी का ‘वोट बैंक’ मानकर उसके सारे वोट उसी की झोली में पहुंचने की कल्पना पिछले दो विधानसभा चुनावों में बेमानी साबित हो चुकी है। यों दलितों के वोट आरक्षित क्षेत्रों में निर्णायक माने जाते रहे हैं, पर जीतनराम मांझी ने ‘हम’ की स्थापना और गठबंधन की चुनावी-राजनीति में अपनी सौदेबाजी क्षमता दिखाकर इस फर्क को दलित प्रजा-वर्ग के स्तर पर न सही, प्रभु-वर्ग के स्तर पर प्रकट कर दिया है!
अंत में, एक और बात। पिछले चुनावों के परिणामों से साफ हुआ कि सिर्फ बिहार जैसे ‘पिछड़े’ प्रदेश के सत्ता-केंद्र में नहीं, बल्कि गुजरात जैसे विकसित राज्य सहित देश के केंद्रीय सत्ता-केंद्र में कई ऐसे आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक कारक-तत्व विकसित हो चुके हैं, जो चुनाव पर गहरा असर डालने के साथ ‘लोकतंत्र’ पर सवालिया निशान लगा देते हैं। ‘आपातकाल' इस सत्य का अमिट संकेत है कि हमारे लोकतंत्र में तानाशाही के बीज पनपने के लिए ‘स्पेस’ 1975 के पूर्व मौजूद था। क्या वह स्पेस समाप्त हो गया? आजादी के बाद लोकतंत्र में वोट द्वारा बहुमत की सरकार कायम करने को जरूरी शर्त माना गया। पर सत्ता-राजनीति पर काबिज राजनेताओं में यह धारणा मजबूत होने लगी कि स्थायी सरकार संस्थागत लोकतंत्र का सबसे प्रामाणिक रूप होगा। यह अलग बात है कि लोहिया और जयप्रकाश जैसी शख्सियतें ‘लोकतंत्र’ के लिए ऐसे किसी भी ‘तंत्र’ की भूमिका को सीमित मानती थीं, जो ‘लोक’ की सुरक्षा के नाम पर खुद को स्थायी बनाने के अधिकारों से लैस करता है।
सो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बनाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धुरी पर होनेवाले इस बिहार चुनाव में यह सवाल गूंजेगा ही कि इतिहास के उक्त आईने में वर्तमान कांग्रेस के पराजित ‘इंदिरावाद’ और भाजपा के विजयी ‘मोदीवाद’ में क्या कोई फर्क नजर आता है?