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प्रतीकों पर हमले की राजनीति

Shyouraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 09 Aug 2020 09:09 AM IST
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Politics of attack on symbols
Ambedkar

पिछले महीने एक बार फिर बाबा साहब आंबेडकर के स्मारक-आवास पर तोड़ फोड़ की गई। यह दुखद था, पर प्रतीकों, स्मारकों और विचारों पर हमले की यह कोई नई घटना नहीं है। पिछले दो-तीन महीनों में अमेरिका, इंग्लैंड सहित कई देशों में ऐतिहासिक नायकों के स्मारक तोड़े गए, हालांकि उन्हें तोड़े जाने की वजहें अलग-अलग थीं। जबकि हमारे यहां मामला उलटा है। बहुत लोग यह समझ ही नहीं पाते कि आंबेडकर समता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र और भावी समाजवाद के प्रहरी हैं। वह रंग नस्ल, जाति, लिंग आदि तमाम तरह की विषमताओं के विरोधी रहे हैं।


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आंबेडकर के स्मारक दरअसल संगठित समाज और सुरक्षित व समृद्ध राष्ट्र के ख्वाब हैं। विदेशों में पिछले दिनों कुछ प्रतिमाएं इसलिए तोड़ी गईं, क्योंकि संबंधित नायक ने दास प्रथा को मान्यता दी। अब्राहम लिंकन की मूर्ति के सामने घुटने टेके दासों की मूर्तियां इसलिए हटाना तय हुआ, क्योंकि वे असमानता के क्रूर इतिहास की याद दिलाती हैं। कुछ सिरफिरों ने तो अमेरिका में भारतीय दूतावास के सामने स्थित गांधी जी की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया। उनका तर्क था कि गांधी जी ने वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया था, जो प्रकारांतर से नस्लभेद का समर्थन करना ही है। हालांकि इस अशोभनीय कृत्य के लिए अमेरिका ने भारत से क्षमा याचना की।

वैचारिक सहमति-असहमतियों की स्थिति में सभ्य नागरिकों के लिए स़जन और संवाद का मंच है, प्रतीकों पर प्रहार इसका हल नहीं है। यह सर्वविदित है कि अपने विचारों के लिए गांधी ने अपने जीवन काल में भरपूर विरोध सहा। गांधी और आंबेडकर के संवाद इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं। लेकिन गांधी ने स्वतंत्रता ओर लोकतंत्र की मांग के मुताबिक अपने आप को बदला। वर्ष 1915 में 'मुंबई क्रॉनिकल' के संपादक फिरोजशाह मेहता की मृत्यु पर उस समाचारपत्र के लोगों ने जब फिरोजशाह का स्मारक बनाए जाने की मांग पर आंबेडकर से उनकी राय मांगी थी, तो उन्होंने लिखा था, 'चौराहों पर लगी महापुरुषों की मूर्तियों में मैं एक और मूर्ति शामिल करने के पक्ष में नहीं हूं। उनका स्मारक एक बहुत समृद्ध पुस्तकालय के रूप में सामने आना चाहिए। एक बौद्धिक संपादक के विचारों का प्रसार होना चाहिए। हां, आने वाली पीढ़ी अगर देखना चाहे कि वह शक्ल-सूरत से कैसे थे, तो इसके लिए पुस्तकों व पुस्तकालयों में उनके चित्र उपलब्ध कराए जा सकते हैं।' 

बाबा साहब आंबेडकर का ‘राजगृह’ अलग तरह का स्मारक है। वहां उनकी अस्थियां रखी गई हैं, विभिन्न अवसरों पर मिले मानपत्र मौजूद हैं, और उपर के तल में उनके पुत्र प्रकाशराव आंबेडकर तथा उनका परिवार रहता है। सबसे बड़ी बात यह कि वहां उनकी चुनी हुई दुर्लभ और बेशकीमती पचास हजार किताबों का संग्रह  है। कहा जाता है कि दुनिया में वह सबसे पड़े पुस्तक प्रेमी थे। वह प्रायः कहते थे कि मूर्तियां मत लगाओ, घरों में पुस्तकों के लिए जगह जरूर बनाओ। एक बार जब वह विदेश से पढ़ाई पूरी करके स्वदेश लौट रहे थे, तब उन्होंने अपनी एक हजार से अधिक किताबों के पैकेट मालवाहक जहाज से भारत भेजे थे। दुर्भाग्य से वह जहाज समुद्र में डूब गया था और आंबेडकर का खजाना उन्हें नहीं मिल पाया था।

अब सवाल यह है कि वर्तमान भारत में यदि गांधी अथवा डॉ. आंबेडकर होते, तो हम भारतीयों का क्या मार्गदर्शन करते। जिस मानव गरिमा, जीवन सुरक्षा, विकास के अवसरों की समानता और जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और आवास के प्रश्नों पर क्या कहते? जिनकी मूर्तियों, कृतियों और स्मृतियों के लिए हम चिंतित होते हैं, उनके विचारों की धरोहर को हम कितना संभालते हैं। अगर शिक्षा की ही बात करें, तो सार्वजनिक क्षेत्र यानी राजकीय शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और अव्यवस्था ने आम-खास का भेद गहरा कर दिया है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शिक्षकों की नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव और एक एक शिक्षक के दस्तावेजों पर दस-दस फर्जी शिक्षिकाओं के पढ़ाने के समाचार आते हैं। निजी स्कूल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा करते हैं, परंतु ज्ञान देने के बजाय वे अंक ही अधिक देते हैं। इन स्कूलों से निकले हुए हजारों बेरोजगार अकुशल श्रमिक के तौर पर मजदूरी तलाश रहे हैं।

बड़ी संख्या में निजी स्कूल फीस के लिए दबाव बना रहे हैं। अस्थायी शिक्षकों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। इधर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द किए जाने के भी समाचार आ रहे हैं। डॉक्टर सरकारी नौकरी छोड़कर निजी प्रैक्टिस में मनमानी फीस ले रहे हैं। हालांकि ऐसे डाक्टरों-नर्सों पर कार्रवाई करने का एलान भी किया गया है। हमारे देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास के क्षेत्रों में जितनी अधिक व्यावसायिकता है और कालाबाजारी हो रही है, वैसा किसी भी स्वतंत्र और विकासशील देश में संभव नहीं है। जिस तरह ब्रिटिशों की ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार बन गई थी, निजी क्षेत्र ठीक उसी तरह समानांतर सरकार जैसा बन चुका है, जो अब खुद सरकार के लिए भी सिरदर्द बनता जा रहा है। गांधी और आंबेडकर के भारत के आम लोग संकट के दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन वे आशावान हैं।

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