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सियासत: दीदी सब पर भारी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल के सामने नाकाम हुई भाजपा की रणनीति

Thu, 06 Jun 2024 04:35 AM IST
Bimal Rai बिमल राय
Updated Thu, 06 Jun 2024 04:35 AM IST
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सार
सीएए के संबंध में झूठ बोलकर और मुस्लिमों को एकजुट कर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की रणनीति को नाकाम कर दिया।
 
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Politics: Didi is supreme over all, BJP's strategy failed in front of Trinamool in West Bengal
ममता बनर्जी - फोटो : एएनआई

विस्तार

बंगाल में एक बार फिर ममता बनर्जी ने राजनीतिक समझ और कुटिलता की छौंक वाली चतुराई के बूते भाजपा को पछाड़ दिया। बंगाल में चुनाव विशेषज्ञ और एग्जिट पोल कराने वाली कंपनियों के पंडितों के अनुमान धरे रह गए। इसलिए चुनावी राजनीति में हवा और हकीकत के बीच की अदृश्य रेखा को केवल वोटिंग मशीनें खुलने के बाद ही देखना चाहिए।



इस चुनाव में तृणमूल को पिछली बार से सात ज्यादा यानी 29 सीटें मिली हैं, जबकि 2019 में 18 लोकसभा सीटों पर कब्जा करने वाली भाजपा के सिर्फ 12 सांसद ही दिल्ली जाएंगे। तृणमूल को पिछली बार के 43.5 प्रतिशत के मुकाबले 45.33 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि भाजपा 2019 के 40.69 प्रतिशत की जगह 38.73 फीसदी वोट हासिल कर सकी। वामदल छह प्रतिशत वोट पाकर भी शून्य पर रहे, तो कांग्रेस की झोली में सिर्फ 4.68 फीसदी वोट और एक सीट आई। 2019 में माकपा का वोट शेयर 16.66 प्रतिशत से गिरकर 6.33 प्रतिशत पर आ गया था। सीटें न तब मिली थीं और न अब मिली हैं। ये वोट भाजपा को मिले थे, जिससे उसे 18 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार वामदल, खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अपने समर्पित वोटों के अलावा दीदी से कुछ-कुछ नाराज दिख रहे मुस्लिम समुदाय के वोटों पर भी नजर थी, पर चार चरण के चुनाव के बाद ममता की नई रणनीति से इस मंसूबे पर पानी फिर गया और मुस्लिम वोटर पूरी तरह तृणमूल के पक्ष में एकजुट हो गया। ममता ने एक अफवाह का सहारा लेते हुए भारत सेवाश्रम संघ के बंगाल प्रमुख कार्तिक महाराज के खिलाफ मोर्चा खोला कि वे अपने इलाके में तृणमूल का एजेंट नहीं बैठने देंगे। इसके साथ ही उन्होंने इस्कॉन और रामकृष्ण मिशन पर भी जुबानी हमले तेज किए, जवाब में प्रधानमंत्री मोदी व दूसरे भाजपा नेताओं ने बंगाल के सांस्कृतिक गौरव का बखान करते हुए हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की। हिंदू तो एकजुट नहीं हुए, लेकिन ममता ने इस खेल से दक्षिण बंगाल के अपने गढ़ में मुसलमानों को एकजुट कर दिया। इसका नतीजा श्रीरामपुर, हुगली, कृष्णनगर, आरामबाग जैसी सीटों पर भाजपा की हार के रूप में दिखा। पीरजादा की पार्टी आईएसएफ भी मुस्लिमों को विभाजित नहीं कर पाई।


इसके अलावा, सीएए लागू होने के बाद ममता ने प्रचारित किया कि जैसे ही मतुआ समुदाय के लोग नागरिकता के लिए आवेदन करेंगे, विदेशी हो जाएंगे और उन्हें डिटेंशन कैंप में भेज दिया जाएगा। हालांकि यह एक झूठ था, जिसे बार-बार बोला गया। राज्य सरकार की तमाम योजनाओं से वंचित होने की भी बात कही गई। इसके विपरीत राज्य में 17.4 प्रतिशत की आबादी वाले मतुआओं में नागरिकता की शतों को लेकर शंका पैदा की गई। लोकसभा की दस सीटों पर इनका प्रभाव है और इनका पूरा साथ मिला होता, तो भाजपा की सीटों की संख्या कुछ और बढ़ सकती थी।

ममता बनर्जी ने दिखाया है कि भ्रष्टाचार के घनघोर आरोपों, जिनकी वजह से एक दर्जन मंत्री व सरकारी अफसर जेल में हैं, की काट कैसे करें? चुनाव प्रचार के बीच, शिक्षा घोटाले में ममता सरकार के असहयोग से हाईकोर्ट को पूरी 26 हजार नौकरियां रद्द करनी पड़ी, पर मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाते हुए उन्होंने एलान किया कि वे किसी की नौकरी नहीं जाने देंगी। उनका शिक्षा विभाग अब घूस देकर नौकरी पाने वालों की सूची अलग से देने के लिए तैयार है। चुनावी लाभ के लिए यह अफरातफरी संभवतः जान-बूझकर पैदा की गई। केंद्र की मनरेगा और आवास योजना का पैसा रोके जाने को भी उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। महिलाओं पर अन्याय और भ्रष्टाचार के आरोपों पर ममता बनर्जी ने पार पा लिया। हालांकि संदेशखाली मामले के अन्याय का विरोध कर अपना दम दिखाने वाली और बशीरहाट में भाजपा के टिकट पर पूरे दम से लड़कर हारने वाली रेखा पात्रा आज अपने दड़बे के घर में कैद हैं कि कहीं मतगणना के बाद हिंसा की लपटें उनका घर न जला दें। चुनाव के बाद भी बंगाल में हिंसा देखी गई। यही बंगाल के लोकतंत्र का स्वरूप है, जो न जाने कब बदलेगा।

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