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जनता से दूर होती राजनीति

Sat, 03 Nov 2012 11:46 PM IST
गिरिराज किशोर
गिरिराज किशोर Updated Sat, 03 Nov 2012 11:46 PM IST
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politics away from public

जाकिर हुसैन साहब गांधी जी के पक्के अनुयायी थे। बादशाह खान और मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद उन्होंने अहिंसा को अपना विश्वास माना था। राजनीति में शुचिता और सचाई उनका वादा था। सलमान खुर्शीद साहब उनके नाती हैं। जब उन पर विकलांगों की सहायतार्थ दिए गए धन के दुरुपयोग का आरोप अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण द्वारा लगाया गया, तो मुझे आश्चर्य हुआ।

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लेकिन जब उनकी पत्रकार वार्ता हुई और उन्होंने एक पत्रकार के सवाल पूछने पर उसे बाहर चले जाने के लिए कहा, तो वह कांग्रेस कार्यकर्ता की तरह व्यवहार न करके एक मंत्री और तानाशाह की तरह व्यवहार करते महसूस हुए। शायद अब हर पार्टी के नेता असंयत व्यवहार करने और असंतुलित भाषा बोलने के आदी हो गए हैं। नेहरू और पटेल तक से पत्रकार उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं के बारे में प्रश्न पूछते थे। वे संतुलित रहकर जवाब देते थे। कई बार मजाक मजाक में उल्टी चोट भी कर देते थे।
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केजरीवाल गलत या सही एक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन कर रहे हैं। शायद ब्रिटिश सरकार ने भी कभी इस अंदाज में, इस भाषा में,नेताओं से मुहंजोरी न की हो। हालत दिनोंदिन बद से बदतर होती जा रही है। यही बात भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के संदर्भ में हुई। केजरीवाल ने उन पर विदर्भ में जमीन के घपले और किसानों की जरूरत नजरंदाज करके बांध के पानी से अपने खेतों की आबपाशी की। पता नहीं इसे पानी चुराना कहा जा सकता है या नहीं। जब प्रधानमंत्री या अन्य किसी सरकारी आदमी पर आरोप लगता है, तो बड़े से बड़ा  और छोटे से छोटा हिंदूवादी नेता चिल्ला कर कहता है कि संसद समिति से या न्यायिक जांच होनी चाहिए।
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लेकिन अब पार्टी के बड़े बड़े नेता आरोप झुठलाने पर आमादा हैं। स्वयं अध्यक्ष महोदय भी कहते हैं कि आरोप चिल्लर हैं। मराठी में चिल्लर का क्या अर्थ है, मैं नहीं जानता। हम लोग तो चिल्लर रेजगारी को कहते हैं। रेजगारी का रुपया भी बन सकता है। रेजगारी रुमाल में बांधकर मारी जाए, तो उस खेल को बनैटी कहते हैं। घाव गहरा करता है। दोनों सदनों में विपक्ष के नेता तो उनके समर्थन में उतरे ही, यूपीए सरकार के मंत्री शरद पवार साहब भी समर्थन में उतर आए। उनका समर्थन भले ही उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों की खिलाफत पर रोक लगा दे, पर क्या वास्तविकता बदल सकती है।

ऐसा लगता है कि मंत्री लोगों ने और संसद सदस्यों ने अपनी गरिमा के अनुरूप बातें करनी छोड़ दी हैं। उत्तर प्रदेश में पूर्व आरोपित सात मंत्रियों को जांच और पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है। पर सब किसी न किसी बहाने कन्नी काट रहे हैं। वे नहीं जानते कि कोर्ट की हुक्म उदूली कितनी भारी पड़ सकती है। यह अनुशासन है या अराजकता? कानून और प्रशासन का डंडा जनतंत्र को भटकने नहीं देता। यह तभी संभव है, जब जिम्मेदार लोग उसका सम्मान करें।

लेकिन जब वे ही लोग उसके प्रति उपेक्षा भाव रखना शुरू कर दें, तो रूल ऑफ लॉ सामान्य आदमी की नजर में भी कागजी वस्तु रह जाती है। जन संवेदना भी अपना अस्तित्व खोने लगती है। कानून का शासन और जन संवेदना का खत्म होते चला जाना अराजकता और सामाजिक अविश्वास को जन्म देता है। इसको कौन रोक सकता है क्या जनता? जनता के ऊपर छोड़ने का मतलब होगा क्रांति को निमंत्रण देना। अब जनता हिंसक क्रांति नहीं करेगी, अहिंसक क्रांति करेगी।


माओवादियों की खूंरेजी के बावजूद ग्वालियर से दिल्ली तक हजारों आदिवासियों की पद यात्रा इस बात की द्योतक है कि हिंसा का विकल्प सामने होने के बावजूद आदिवासियों ने पदयात्रा को चुना। मैं इसे सामाजिक अहिंसक आंदोलन मानता हूं। अब देश में राजनीतिक आंदोलन होते हैं। सामाजिक आंदोलन बंद हो गए। अन्ना का भ्रष्टाचार के विरुद्ध अंतिम सामाजिक आंदोलन था। सामाजिक आंदोलन वही होता है, जो किसी राष्ट्रीय समस्या को लेकर हो। स्वयं मरें पर दूसरों को जिंदा रखें। घूस और गबन एक सामाजिक रोग है, इसके विरोध में कोई भी अहिंसक आंदोलन सामाजिक आंदोलन का ही रूप है।

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