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दिल्ली का सियासी समीकरण

Wed, 05 Feb 2020 06:22 PM IST
Raman Singh आर राजगोपाल
आर राजगोपाल Published by: Raman Singh Updated Wed, 05 Feb 2020 06:22 PM IST
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Political equation of Delhi
भाजपा का प्रचार अभियान - फोटो : a

दिल्ली के मतदाताओं का अगर विश्लेषण किया जाए, तो बेशक कम सीटों के साथ, लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) की सत्ता में वापसी की संभावना दिखती है। हालांकि दिल्ली में किसी के भी पक्ष में लहर नहीं है। केजरीवाल का करिश्मा और मोदी का जादू आगामी आठ फरवरी को मतदान के दिन ही दिखेगा। अब चुनाव प्रचार के थमने में कुछ ही घंटे बचे हैं। जमीनी स्तर पर सही-सही अनुमान लगाना बेहद कठिन है। आप और भाजपा के बीच भीषण संग्राम छिड़ा हुआ है, लेकिन इस लड़ाई में कांग्रेस कहीं भी नहीं दिखती है।


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दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान चरम पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अरविंद केजरीवाल, योगी आदित्यनाथ, नीतीश कुमार आदि नेता अपनी-अपनी पार्टियों के प्रचार में व्यस्त हैं। चुनावी सर्वे और ओपिनियन पोल में आम आदमी पार्टी को सामान्य बहुमत दिया गया है, लेकिन प्रचार अभियान के अंतिम चरण में दो 'एन' यानी नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ने निश्चित रूप से कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित किया है और वे उत्साहित हैं।

दशकों से सभी दलों के लिए अनाधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने जैसी बुनियादी नागरिक सुविधाओं का मुद्दा चुनाव में हावी रहा है। मोदी ने बीस लाख परिवारों को पक्की रजिस्ट्री सौंपकर इस मुद्दे को खत्म कर दिया है। मेट्रो में मुफ्त यात्रा, बस में मुफ्त यात्रा, 200 यूनिट से कम पर शून्य बिजली बिल, शून्य पानी बिल-ये सब आप ने आम लोगों को उपलब्ध कराया है। लेकिन भाजपा ने इन सब मुद्दों को पीछे रखकर प्रचार को शाहीन बाग तक सीमित कर दिया है। आम आदमी पार्टी भाजपा की इस आलोचना पर प्रतिक्रिया नहीं दे पा रही है। मोदी और शाह की जोड़ी की चतुर चाल ने प्रचार अभियान को मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी के मुद्दे से भटकाकर केजरीवाल को शाहीन बाग के मुद्दे पर घेर लिया है। अमित शाह ने जिस ताकत के साथ इस चुनाव का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया है, उससे आम आदमी पार्टी के चुनावी प्रबंधक घबरा गए हैं। आप कठिन ब्यूह में फंस गई है। ऐसा लगता है कि आप को कांग्रेस का गुपचुप समर्थन मिल रहा है। अल्पसंख्यक आप को वोट देने के लिए बाध्य हैं। लेकिन इसका कुल नुकसान कांग्रेस को होगा। गांधी परिवार के तीन सदस्य जब नाश्ते की मेज पर बैठते होंगे, तो उन्हें खुशी मिलती होगी कि दिल्ली चुनाव में भाजपा दबाव में आ गई है। हर राज्य, चाहे वह महाराष्ट्र हो, झारखंड हो, कर्नाटक हो, मध्य प्रदेश और राजस्थान हो, कांग्रेस ने भाजपा और मोदी को रोकने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं।

आप का नुकसान केवल अरविंद केजरीवाल पर निर्भर है। सोशल मीडिया इन कयासों से सहमत है कि आप दिल्ली में भारी बहुमत से जीत रही है। आप ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पांडेय को काम पर लगा दिया है। खबरें बताती हैं कि आप सड़कों पर चुनाव प्रचार पर बहुत कम खर्च कर रही है, जबकि सोशल मीडिया पर उसने करोड़ों रुपये निवेश किया है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी से लेकर हर राज्य के आखिरी कार्यकर्ता तक विभिन्न तरह के नेताओं को प्रचार अभियान में उतार दिया है। भाजपा ने दक्षिण के सभी छह राज्यों से भी कार्यकर्ताओं को बुलाया है। कारण, अमित शाह के एक मित्र के मुताबिक, यह माना जाता है कि दिल्ली पूर्वांचलियों और दक्षिणी राज्यों के परिवारों का शहर है। इस समय भाजपा के तीन विधायक हैं। अगर भाजपा 20 से 25 सीटों का आंकड़ा भी छू लेती है, तो यह उसकी शानदार जीत होगी। वह अरविंद केजरीवाल की लोकप्रिय योजनाओं को रोक देगी। अगर भाजपा मजबूत विपक्ष के रूप में उभरती है, तो दिल्ली विधानसभा चलाने में आप को मुश्किल होगी। ऐसे में केजरीवाल उप-राज्यपाल के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने, केंद्रीय योजनाओं की आलोचना करने, पुलिस आयुक्त और मुख्य सचिव की वापसी के लिए अक्सर विधानसभा का सत्र नहीं बुला सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि केजरीवाल, जो 2014 में मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाराणसी गए थे, जिन्होंने मोदी को 'मनोरोगी' बताया था, 2019 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के पूरी तरह से पतन के बाद अचानक पिछले छह महीनों से नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं। उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोण की कला सीख ली है। वह पेंडुलम की तरह कभी चरम वाम तो कभी चरम दक्षिणपंथ की तरफ डोलते हैं। वह इन्कलाब जिंदाबाद से लेकर वंदे मातरम और अब सार्वजनिक सभाओं में हिंदू मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे हैं। पिछले महीने जब निर्वाचन आयोग ने दिल्ली चुनाव की तिथि घोषित की थी, तो आप की जीत का रुझान दिख रहा था, लेकिन जैसे-जैसे प्रचार अभियान चरम पर पहुंचा, शाहीन बाग की नाकाबंदी आप के लिए अवरोध बन गई। दोपहर के बाद 200 महिलाएं वहां एकत्र होती हैं और प्रदर्शन करती हैं। लेकिन इस सड़क से गुजरने वाले दो लाख राहगीर आप के खिलाफ हो गए। लोगों का मानना है कि शाहीन बाग आंदोलन आप ने शुरू करवाया है। भाजपा भी यही आरोप दोहराती है।

एक चतुर राजनेता की तरह अमित शाह ने यात्रियों (जिन्हें शाहीन बाग का रास्ता बंद होने के कारण अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता है) की असुविधाओं का फायदा उठाते हुए शाहीन बाग को हिंदू-मुसलमानों के बीच एक सांप्रदायिक मुद्दा बना दिया। अमित शाह ने तो यहां तक घोषणा कर दी कि भाजपा को पड़ने वाले हर वोट का मतलब शाहीन बाग में बैठी हुई दादी मां को वहां से हटाने के लिए वोट करना है। भाजपा ने देखा कि सड़क बंद होने के प्रति जनभावना के जरिये अरविंद केजरीवाल की मुफ्त योजनाओं और उसके प्रचार अभियान को बेअसर किया जा सकता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे व्यक्तिगत लड़ाई बना दिया, क्योंकि वह आप के अधूरे आश्वासनों पर तीखे हमले करते हुए घर-घर पहुंच रहे हैं और नुक्कड़ सभा कर रहे हैं। भाजपा की प्रचार शैली हमेशा अलग होती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि पहले की अपेक्षा कम सीटों के साथ दिल्ली चुनाव में आप के जीतने की संभावना है। लेकिन भाजपा कड़ी टक्कर दे रही है। इन दोनों के बीच फंसी कांग्रेस मृत राजनीतिक संगठन की तरह लगती है। कांग्रेस दिल्ली का चुनाव लड़ती नहीं दिखती है, ऐसा लगता है कि वह हारने के लिए सामंजस्य स्थापित कर रही है।

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