संसद में दिखी सियासी दरारें
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यह विरल उदाहरण ही है कि देश की संसद ने दो मार्च को शुरू हुए सत्र में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगे पर चर्चा को अपने एजेंडे में शीर्ष पर नहीं रखा। इससे इसी धारणा को बल मिला कि देश का राजनीतिक वर्ग इससे परेशान नहीं है। दंगाग्रस्त क्षेत्रों में राजनेताओं के दौरे कम होते जा रहे हैं। लेकिन जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च संस्था यानी संसद के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। दंगों पर तत्काल चर्चा के जरिये वह उन लोगों तक पहुंच सकती थी, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया, जिनके घर, स्कूल और पूजा स्थलों को जला दिया गया और जिनके व्यवसाय और संपत्ति बर्बाद हो गई। फिर यह हिंसा देश के सुदूर इलाके में नहीं, बल्कि सरकार की नाक के नीचे और राजधानी में हुई। वर्ष 1950 से 1995 के बीच दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष में मारे गए कुल 50 लोगों की तुलना में पिछले महीने मात्र तीन दिन के दंगे में हुई 49 लोगों की मौत उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सड़कों पर हुई हिंसा की व्यापकता को ही रेखांकित करती है।
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इस हिंसा ने देश के लोकतांत्रिक एवं राजनीतिक ढांचे की दरार को ही दर्शाया है। खुफिया एजेंसियां इस बारे में अनुमान लगाने में विफल रहीं। पुलिस तीन दिन तक हिंसा रोकने में विफल रही। और हिंदू व मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोगों के मुताबिक, पुलिस ने कहा कि उसे इसमें हस्तक्षेप करने का 'आदेश नहीं' है। इसलिए जब एक हाई प्रोफाइल मेहमान शहर में था, तब वे कानून-व्यवस्था बहाल करने से दूर थे। जबकि दिल्ली पुलिस भीड़ की हिंसा से निपटने में देश में सबसे बेहतर ढंग से प्रशिक्षित है।
न्यायपालिका ने भी मिला-जुला संदेश दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मुरलीधरन ने आधी रात के अपने आदेश में पुलिस को उसके काम के बारे में बताया, पर उसके तुरंत बाद उनका तबादला कर दिया गया। उनका तबादला संभावित था, पर जिस समय यह हुआ, उसका अपना संदेश है। फिर प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि पीड़ितों द्वारा दायर की गई याचिकाएं न्यायालय पर दबाव डालती हैं! विपक्ष ने संसद में दिल्ली दंगे पर चर्चा की मांग की, पर उसका हस्तक्षेप भी, जैसा कि हर सत्र में होता है, दोनों सदनों में व्यवधान पैदा करने से अधिक नहीं था। कांग्रेस के 54 में से 16 सांसद संसद के बाहर गांधी प्रतिमा के सामने खड़े होकर नारे लगा रहे थे और बाकी सांसदों को विरोध करने के बारे में पता भी नहीं था! देश को हिला देने वाली ऐसी स्थितियों का मुकाबला करने के लिए नई सोच या कल्पनाशील तरीके का संकेत नहीं दिखा, जबकि यह 1984 के सिख विरोधी दंगे के बाद की भीषण हिंसा में से था। विपक्ष नहीं जानता कि विवाद को कैसे कम किया जाए, जो हमारे राजनीतिक व सामाजिक जीवन में तेजी से बढ़ा है।
एक समय ऐसा था, जब सर्वदलीय शिष्टमंडल प्रभावित क्षेत्रों में जाता था और दोनों समुदायों के घावों पर मरहम लगाता था। 1990 के शुरू में जब कश्मीर समस्या चरम पर थी, तब एक सर्वदलीय शिष्टमंडल ने घाटी का दौरा किया था। उसमें राजीव गांधी भी थे, और उनके विरोधी देवीलाल भी। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने से बहुत पहले एक बहुदलीय समूह ने घाटी और जम्मू का दौरा किया था, जिसे वहां के कई सामान्य लोगों से अनुकूल प्रतिक्रिया मिली थी। आज ऐसा कोई कदम अकल्पनीय है।
हाल में हमने जो देखा, उसमें सबसे चिंताजनक 'गोली मारो...' जैसी घटना है। दिल्ली चुनाव के दौरान यह नारा दिया गया था, जो पिछले हफ्ते एक भीषण वास्तविकता बन गया। इसका अंतर्निहित संदेश हमारे गणतंत्र के भविष्य को बताता है। क्या लोकतांत्रिक तरीके के मतभेद, जिन्हें बातचीत और चर्चा के माध्यम से सुलझाया जाना है, अब गोलियों के माध्यम से सुलझाए जाएंगे? और क्या पुलिस बल, जो कानून- व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों की शांति और भलाई सुनिश्चित करने के लिए होते हैं, ऐसी घटना पर अपना मुंह फेर लेंगे?
चूंकि राम मंदिर निर्माण का मुद्दा अब खत्म हो गया है, ऐसे में, क्या भाजपा 'गोली मारो...' को ही आने वाले दिनों में चुनावी राज्यों में ध्रुवीकरण के लिए अपनी रणनीति बनाने की योजना बना रही है? बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश (जहां क्रमशः 2020, 2021 और 2022 में चुनाव होने वाले हैं) ऐसे राज्य हैं, जहां मुस्लिमों की बड़ी आबादी है और ध्रुवीकरण करना आसान है। यह नारा हाल ही में कोलकाता में अमित शाह की रैली में भी सुनाई दिया।
इस बार देश को जानकारी देने में युवा पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दंगा प्रभावित लोगों की मदद के लिए सिविल सोसाइटी समूह के लोग पहुंच रहे हैं। लेकिन असली नायकत्व तो उत्तर-पूर्वी दिल्ली के लोगों ने दिखाया है, हिंदू पड़ोसियों ने मुसलमान परिवारों को शरण दी, मुसलमानों ने हिंदुओं को बचाया, सिख प्रभावित लोगों को सहायता पहुंचा रहे हैं। जैसे ही स्थिति सामान्य होती है, एक-दूसरे को सहायता प्रदान करने और 'अमन' के लिए जमीनी स्तर पर मोहल्ला समितियों को स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन अब भी कई सवाल विश्वसनीय जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हिंसा कैसे शुरू हुई? (ऐसा लगता है कि पहले दिन दो पक्षों के बीच पथराव हुआ, दूसरे दिन दोनों पक्षों द्वारा भयानक सांप्रदायिक झड़प और आगजनी हुई, और तीसरे दिन नकाबपोश बाहरी लोगों का प्रवेश हुआ, जिन्होंने विशेष रूप से मुस्लिमों को निशाना बनाया)।
जब अमेरिकी राष्ट्रपति जैसा कोई मेहमान भारत में था, तब स्थिति नियंत्रण से बाहर कैसे हो गई? ट्रंप के दौरे के समय हुई हिंसा ने नरेंद्र मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। इसने मोदी को शर्मिंदा किया, क्योंकि पश्चिमी दुनिया के अनेक लोगों ने भारत को पाकिस्तान के बराबर बताना शुरू कर दिया है, और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग भी इसमें कूद पड़ा है। बेशक हिंदू और मुस्लिम, दोनों मारे गए हैं, पर मुसलमान अधिक हताहत हुए हैं। और अंत में, क्या दिल्ली भी उस व्यापक हकीकत से जुड़ गई है, जो इस क्षेत्र के विशाल भू-राजनीतिक पटल की कटु सच्चाई है?