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कवि का हेलमेट: 'हेलमेट फासीवादी है, दिमाग को कुंद करता है, पीकर चलाना सहज मानवीय आनंद है

यशवंत व्यास Updated Sun, 15 Sep 2019 12:40 AM IST
ट्राफिक पुलिस (सांकेतिक)
ट्राफिक पुलिस (सांकेतिक) - फोटो : Social Media
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मंदी को देखकर मंद-मंद मुसकाता हुआ कवि कश्मीर से अशांति की खबर का इंतजार कर रहा था कि ट्रैफिक वाले ने चालान बना दिया। उसे लगा श्रीनगर से गाजियाबाद तक सरकार का दमन चक्र एक जैसा है। रात का वक्त था। रसरंजन से लौटता कवि रात्रि में और अधिक पवित्र हो जाता है। इस घोषित सिद्धांत के आधार पर कवि में पवित्रता का ज्वार आया हुआ था। कर्तव्यपरायण कवि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं से घिरा रहता था। उसके सड़क पर होने से, सड़क सड़क नहीं रहती, अंतिम आदमी की समस्याओं पर पसरी टिप्पणी हो जाती है। उसके विचारों के सम्मान में एक जनधर्मी रेड कार्पेट, जिस पर चिंतन-वॉक करता हुआ कवि अपने लक्ष्य को प्राप्त होता है। विचार कहता था, वह सड़क पर था ही नहीं। पर व्यवहार कहता था, वह सड़क पर था।
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ब्रीथ एनालाइजर से उसके मुंह की पवित्रता का नाप लेकर पुलिस वाले ने कहा, दुगुना चालान बनेगा। एक तो हेलमेट गायब है, दूसरा भयंकर पीकर चला रहे हो। गाड़ी साइड में लगाओ और लाइसेंस निकालो। कवि मुसकाया, 'तुम्हारी भी मजबूरी है। सरकार के आतंक में जी रहे हो। यह तुम नहीं कर रहे, तुम तो तानाशाह के महज एक टूल हो। तुम पर करुणा आती है।' पुलिस वाले ने कहा, 'करुणा का लाइसेंस बाद में देख लूंगा। पहले अपना लाइसेंस निकालो।'

'देखते नहीं मंदी आ गई है। तुम्हें तो विद्रोह करना चाहिए। विद्रोह भी बाद में देख लेंगे, पहले अपना लाइसेंस निकालो।'

कवि ने उत्तर दिया, 'लाइसेंस सरकारें बनाती हैं। सरकारें हमारे लिए हैं या हम सरकारों के लिए हैं? लाइसेंस हमसे है या हम लाइसेंस से हैं? तुम्हारी और हमारी पहचान क्या इस कागज के एक पुर्जे की रह गई है?'

पुलिस वाले ने कहा, अगली बार तू अपना वोट बदल लेना। अभी तो लाइसेंस निकाल वर्ना एक धारा और ठोंकते हैं।
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