फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   please allow me to spit

प्लीज, थूकने दीजिए न

Mon, 07 Jan 2013 12:03 PM IST
संजीव ठाकुर
संजीव ठाकुर Updated Mon, 07 Jan 2013 12:03 PM IST
विज्ञापन
please allow me to spit

सर्दी-जुकाम से पीड़ित होने के कारण कई दिनों तक आराम करने के बाद पिछले दिनों मैं काम पर निकला था। मेट्रो की प्रतीक्षा करते हुए मुझे डर लग रहा था कि अगर अभी खांसी आए, तो मैं क्या करूंगा। मेट्रो स्टेशन पर थूकना तो कानूनन जुर्म है। थूकने पर जुर्माना भरना पड़ेगा। कदम-कदम पर खड़े सुरक्षाकर्मियों की नजरों से बचना भी आसान नहीं है। लेकिन तभी मुझसे थोड़ी दूर खड़े गुटखा चबाते एक सुरक्षाकर्मी को पटरी पर थूकते हुए देख मेरी सांस में सांस आई। चलो, कानून का रक्षक कानून तोड़कर दरअसल हमारे जैसे आम लोगों को थोड़ा साहस दे जाता है कि हम भी कानून तोड़ सकते हैं।

विज्ञापन


खैर, ऐसी नौबत नहीं आई और मेट्रो पर सवार होकर मैं अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। मैं सोच रहा था कि आज से कुछ साल पहले तक रेलवे स्टेशनों, अस्पतालों, सरकारी भवनों आदि में थूकने की जगह निर्धारित रहती थी। लेकिन मेट्रो कल्चर ने तो लोगों के थूकने पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। बड़े-बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों और भवनों की तर्ज पर मेट्रो स्टेशनों पर थूकने की जगह ही नहीं है। इससे हालांकि माहौल साफ-सुथरा दिखाई देता है। जुर्माने के भय की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। वर्ना पान-गुटखा-तंबाकू खाकर सर्वत्र थूकने को अपना मौलिक अधिकार समझने वाले लोग मेट्रो स्टेशनों और मेट्रो के डब्बों का भी वही हाल कर देते, जो आम स्टेशनों और गाड़ियों का कर देते हैं।
विज्ञापन


लेकिन स्वच्छता को अनिवार्य मानने वाली संस्कृति में भी बीमार और लाचार लोगों के लिए कोई जगह होनी चाहिए या नहीं! वह तो शुक्र है कि मेट्रो स्टेशन पर तैनात सुरक्षाकर्मी ही पटरी पर थूकते हुए नियम-कानून की ऐसी-तैसी कर रहा था, वर्ना मुझे क्या पता चलता कि ऐसी जगहों पर आप चाहें, तो थूक सकते हैं। सच भी है। इस तरह की जगहों में अगर कोई   बीमार आदमी थूकना चाहता है, तो वह क्या करेगा? दीवारों पर दो सौ रुपये जुर्माने की चेतावनी देखकर क्या वह अपने मुंह में रूमाल ठूंस लेगा?
विज्ञापन
विज्ञापन


न जाने सरकारों को थूकने से इतनी एलर्जी क्यों है? जब लोगों के मन में इतना मैल भरा हुआ है, तो बाहर इतनी साफ-सफाई रखने की भला क्या जरूरत है! सरकारों को हम जैसों  की मजबूरी समझनी चाहिए। स्वच्छता ठीक है, पर थूकने की  भी गुंजाइश रखिए न। आखिर हम थोड़ी-थोड़ी देर पर थूकने वाले लोग हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed