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प्रकृति: पेड़-पौधों का भी है अपना एक इंटरनेट, जमीन के नीचे से होता है उनके बीच संचार

Sun, 06 Oct 2024 04:19 AM IST
राहुल कुमार स्वेन बाटके, द कन्वर्सेशन
स्वेन बाटके, द कन्वर्सेशन Published by: राहुल कुमार Updated Sun, 06 Oct 2024 04:19 AM IST
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सार
ऐसा नहीं है कि सिर्फ मनुष्य और जानवर ही बातचीत करते हैं। शोध बताते हैं कि पेड़-पौधे न सिर्फ बातचीत करते हैं, बल्कि आसन्न खतरे की स्थिति में जड़ों, विद्युत संकेतों, भूमिगत कवक और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के नेटवर्क के माध्यम से अपने साथियों को कुशलता से संदेश भेज सकते हैं।
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Plants and trees also have own internet, communication between them happens under the earth
पेड़-पौधों का भी अपना इंटरनेट होता है - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज सुबह मेरी छह साल की बेटी हमारे शयन-कक्ष में आई और एक किताब से कहानी पढ़ने लगी। वह एक-एक शब्द पढ़ते हुए पूरा वाक्य बना रही थी। कभी-कभी वह अटक जाती थी और कुछ मजेदार शब्दों को समझने के लिए मदद मांगती थी, लेकिन किताब खत्म करने के बाद उसने हमें बर्फ में फंसे एक भालू की कहानी सुनाई। मुझे बातचीत करना अच्छा लगता है, चाहे वह किसी बच्चे के साथ हो, बुजुर्ग के साथ हो, किसी अपने के साथ हो या फिर अजनबी के साथ। मुझे लगता है कि मनुष्य एक प्रजाति के तौर पर इसलिए ही कामयाब हो सका, क्योंकि वह बातचीत कर सकता है। खतरा आने पर वह बोलकर चेतावनी दे सकता है और जटिल सूचनाओं का भी आदान-प्रदान कर सकता है। जानवर भी ये काम करते हैं। भले ही हम उनकी बोली न समझ पाएं, लेकिन उनके समूह के दूसरे जीव उस आवाज को समझ लेते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि मनुष्यों और जानवरों की तरह पेड़-पौधे भी, जो भले ही निष्क्रिय लगते हों, बातचीत करते 


यह विचार कोई नया नहीं है। कुछ वर्ष पहले आई हॉलीवुड की फिल्म अवतार के लिए भी पेड़-पौधों की यही शक्तियां प्रेरणा बनी थीं। लेकिन विज्ञान कहता है कि वनस्पतियों के बीच होने वाली यह बातचीत हमारी कल्पना से भी जटिल हो सकती है। दरअसल, ये पर्यावरणीय संवाद बेहद संवेदनशील और संतुलित होते हैं। कल्पना करें कि अगर वैश्विक नेटवर्क सिस्टम अचानक टूट जाए, तो हमारी दुनिया कितनी अस्त-व्यस्त हो जाएगी। यही बात पौधों के मामले में भी लागू होती है। यह समझने के लिए कि जो जीव बोल नहीं सकते, वे एक-दूसरे को सूचना कैसे देते हैं, यह समझना महत्वपूर्ण है कि मनुष्यों में एक मूक संचार प्रणाली भी होती है। इसमें हमारी दृष्टि, गंध, श्रवण, स्वाद और स्पर्श की भावना शामिल है। उदाहरण के लिए, प्राकृतिक गैस कंपनियां गैस में मरकैप्टन नामक रसायन मिलाती हैं, जिससे उसमें से 'सड़े अंडे' जैसी गंध आती है, जो हमें रिसाव के बारे में चेतावनी देती है।


यह भी सोचें कि हमने सांकेतिक भाषा कैसे विकसित की, जबकि कई लोग होंठों की भाषा भी समझ लेते हैं। इन इंद्रियों के अलावा, हमारे पास संतुलन और शरीर की मुद्रा बनाए रखने की क्षमता, शरीर के अंगों की सापेक्ष स्थिति और ताकत का बोध, तापमान में बदलाव का बोध और दर्द को महसूस करने की क्षमता भी है। पौधे सूचना प्रसार के लिए अपनी इंद्रियों का उपयोग अपने तरीके से करते हैं।

हममें से ज्यादातर लोग ताजा कटी घास की गंध से परिचित हैं। घास के पौधों द्वारा छोड़े जाने वाले वाष्पशील या रासायनिक पदार्थ, जिन्हें हम उस गंध से जोड़ते हैं, एक तरीका है, जिससे वे आसपास के दूसरे पौधों को बताते हैं कि कोई शिकारी (लॉनमूवर) मौजूद है, जिससे पौधे अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी बदलाव करते हैं। श्रवण संकेतों का उपयोग करने के बजाय पौधे रासायन-प्रेरित संचार का उपयोग करते हैं। हालांकि, पौधों का संचार वाष्पशील पदार्थों तक ही सीमित नहीं होता है। हाल ही में, वैज्ञानिकों ने पाया कि पौधे आपस में कितने बेहतर तरीके से जुड़े हुए हैं और वे अपनी जड़ों, विद्युत संकेतों, भूमिगत कवक और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के नेटवर्क के माध्यम से अपने साथियों को बेहद कुशलता से संदेश भेज सकते हैं।

पौधों के आसपास की निगरानी करने वाली गंध की खोज की गई। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी एक अपेक्षाकृत नया वैज्ञानिक अनुशासन है, जो अध्ययन करता है कि पौधों में और उनके साथियों के बीच विद्युत संकेतों का संचार कैसे किया जाता है। प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की प्रगति के साथ हमने पिछले कुछ वर्षों में अनुसंधान के इस क्षेत्र में त्वरित विकास का अनुभव किया है। वैज्ञानिक उल्लेखनीय खोजों के कगार पर हैं, क्योंकि हाल ही में हुई प्रगति के कारण आधुनिक ग्रीनहाउसों में पौधों के भीतर और उनके बीच विद्युत संकेत संचार को एकीकृत किया जा सका है, जिससे फसलों की सिंचाई पर निगरानी और नियंत्रण किया जा सकेगा या पोषण संबंधी कमियों का पता लगाया जा सकेगा। 

वैज्ञानिक एक्यूपंक्चर सुइयों के समान छोटे विद्युतीय जांच उपकरणों को डालकर यह जांच करते हैं कि विद्युतीय संकेतों में परिवर्तन, पौधों के प्रदर्शन से किस प्रकार जुड़े हैं, जैसे कि जल, पोषक तत्वों का परिवहन और प्रकाश को महत्वपूर्ण शर्कराओं में परिवर्तित करना। शोधकर्ताओं ने मोबाइल फोन से विद्युत संकेत भेजकर पौधों के व्यवहार को भी प्रभावित किया है, जिससे वे वीनस फ्लाईट्रैप में पत्तियों को खोलने या बंद करने जैसी बुनियादी प्रतिक्रियाएं करने लगते हैं। जल्द ही हम अपनी फसलों की भाषा को पूरी तरह समझने में सक्षम हो जाएंगे।

पौधों के बीच बहुत ज्यादा संचार जमीन के नीचे होता है, जिसे 'वुड वाइड वेब' नामक बड़े कवक नेटवर्क द्वारा सुगम बनाया जाता है। कवक का यह नेटवर्क पेड़-पौधों को जमीन के नीचे जोड़ता है, जिससे वे पानी, पोषक तत्व और सूचना जैसे संसाधन साझा करते हैं। इस प्रणाली के जरिये पुराने पेड़ छोटे पेड़ों को बढ़ने में मदद कर सकते हैं, और कीटों जैसे खतरों के बारे में एक-दूसरे को चेतावनी दे सकते हैं। यह पेड़-पौधों के लिए एक भूमिगत इंटरनेट की तरह है, जो उन्हें एक दूसरे का समर्थन करने और एक-दूसरे से संवाद करने में मदद करता है। यह नेटवर्क व्यापक है, माना जाता है कि 80 फीसदी से अधिक पौधे आपस में जुड़े हुए हैं, जो इसे दुनिया की सबसे पुरानी संचार प्रणालियों में से एक बनाता है। इंटरनेट की तरह ही कवक नेटवर्क पौधों को पर्यावरणीय परिवर्तनों के लिए तैयार होने की खातिर सहजीवी कवक का उपयोग करने की अनुमति देता है।

हालांकि, मिट्टी में रसायनों की मिलावट, वनों की कटाई या जलवायु परिवर्तन के चलते इन नेटवर्कों में पानी और पोषक तत्वों के चक्र प्रभावित होने के कारण संचार बाधित हो सकते हैं, जिससे पौधे कम जानकारी प्राप्त कर पाते हैं और आपस में कम जुड़े रहते हैं। इन नेटवर्क को बाधित करने के प्रभावों पर अभी तक बहुत अधिक शोध नहीं हुआ है। लेकिन संचार में बाधा उन्हें अधिक असुरक्षित बना सकती है, जिससे दुनिया भर में पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा और उसे बहाल करना ज्यादा कठिन हो सकता है। बच्चों की मदद करना महत्वपूर्ण है, ताकि वे अपने आसपास की दुनिया को समझ सकें। यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि यह सुनिश्चित करना कि हम पौधों के बीच संचार को बाधित न करें। आखिरकार, हम अपनी भलाई और अस्तित्व के लिए पौधों पर ही निर्भर हैं।
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