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शिखर की ढलान
हेमेन्द्र मिश्र
Updated Fri, 16 Aug 2013 08:40 PM IST
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विश्व की सातवें नंबर की खिलाड़ी मारियन बार्तोली संन्यास की घोषणा करते समय चाहकर भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थीं, तो इसकी एक बड़ी वजह वह वायदा पूरा नहीं करने का गम भी था, जो उन्होंने विंबलडन जीतने के दौरान जुलाई में किया था।
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तब जर्मनी की सबाइन लिसिकी को लंदन के ग्रास कोर्ट में हराने वाली फ्रांस की इस शीर्ष खिलाड़ी ने कहा था कि वह 'अगले साल फिर यहां अच्छा करने की कोशिश' करेंगी और अपना दूसरा विंबलडन जीतेंगी। लेकिन सिनसिनाटी मास्टर्स में मिली हार और चोट ने उन्हें इतना 'कमजोर' कर दिया कि रैकेट को खूंटी पर टांगना ही पड़ा। लेकिन खुशी यही है कि उन्होंने विंबलडन जीतकर अपना वह सपना जरूर पूरा कर लिया, जिसकी तरफ बचपन में ही उन्होंने पांव बढ़ाने शुरू कर दिए थे।
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यह 1990 का दौर था, जब छह बरस की मारियन ने पहली बार रैकेट पकड़ा। पिता वाल्टर बार्तोली डॉक्टर जरूर थे, लेकिन वह एक अच्छे कोच साबित हुए। वह उसे रोजाना सुबह स्कूल ले जाते और फिर देर रात तक टेनिस की बारीकियां सिखाते। मारियन अपना अधिकतर होमवर्क गाड़ी की पिछली सीट पर ही करती।
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पिता भले ही इतने संपन्न नहीं थे कि वह अच्छे कोर्ट में अभ्यास करा पाते, पर छोटे और फिसलनदार उबड़-खाबड़ कोर्ट में खेलने का ही नतीजा रहा कि मारियन के लिए कोर्ट में इधर-उधर भागना और खुद पर नियंत्रण रखना आसान हो गया। सर्विस आते ही जाल की तरफ दो मीटर तक आगे बढ़कर उसका जवाब देने की शैली मारियन ने यहीं से सीखी।
हालांकि महज इसीलिए उनकी खेल शैली विश्लेषकों की नजर में नहीं रहीं। उनकी खासियत यह भी है कि वह सीधे और उल्टे, दोनों हाथों का इस्तेमाल करती हैं। असल में मारियन खब्बू हैं, पर जब पिता ने 1992 के फ्रेंच ओपन के फाइनल में मोनिका सेलेस द्वारा दोनों हाथों का इस्तेमाल कर स्टेफी ग्राफ को हराते देखा, तो उन्होंने यही तकनीक अपनी बिटिया को सिखाने का फैसला लिया।
मारियन खुद को 'रॉक बॉटम' मानती हैं। इसकी वजह भी है। उन्होंने 47वें प्रयास में अपना एकमात्र ग्रैंड स्लेम जीता और इतना लंबा प्रयास कर खिताब जीतने वाली वह पहली महिला खिलाड़ी बनीं। लेकिन उनके खाते में सात डब्ल्यूटीए सिंगल्स और तीन डबल्स टाइटल भी हैं। मारियन का जीवन उस कहावत सरीखा है, जिसे उन्होंने विंबलडन जीतने के बाद भी कहा था- स्लो ऐंड स्टेडी विंस द रेस।
- हेमेन्द्र मिश्र