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प्रेम का निगोड़ा प्रदर्शन

Tue, 12 Feb 2013 12:08 AM IST
अशोक संड
अशोक संड Updated Tue, 12 Feb 2013 12:08 AM IST
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performance of love

आदतन उसने मिस्ड कॉल मारी थी। मेरे फोन मिलाने पर पारंपरिक हेलो उवाचे बिना चहका-वसंत आय गवा अशोक भइया। शिशिर महाराज अभी तक पांव जमाए बैठे हैं। बर्फीली हवाओं से त्वचा फट रही है। यकीन नहीं होता कि वसंत आ गया। जिस वसंत के आगमन की सूचना किसी समय सखियां सर्कुलेट करती थीं, उस दायित्व का निर्वहन सखा भाव में ही किया है कवि मित्र ने। शहर में सरसों के खेत के अभाव में आसमान में उड़ती पीली पतंगों, धरती पर पीले कपड़ों में लिपटे नर-नारियों और पाठशालाओं में वीणावादिनी वर दे के कोरस-गान से भी जानकारी हो जाती है कि वसंत आ गया।

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कवि उत्सवधर्मी होते हैं। मदनोत्सव का बोध कराने के लिए मिस्ड कॉल मारी थी कवि-सखा ने। वसंत इंसान को ही नहीं, प्रकृति को भी आंदोलित करता है। आम तक ‘बौरा’ जाता है। प्यार से वसंत का सनातनी सरोकार है, यह बोध इस पेंशनयाफ्ता को भी है। बंदे ने भी सदी के महानायक से पांचेक कम वसंत देखे हैं। कवि वरिष्ठ है, उसने भी लगभग इतने ही वसंत देखे होंगे। उसे दीक्षा देने की हिमाकत नहीं कर सका कि प्यार की कोई खास ऋतु नहीं होती है, न ही डेट ऑफ एक्सपायरी।
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वसंत ने फिर दस्तक दी है।

वसंत पूर्व ‘ऐनुअल क्लीअरेंस सेल’ की सूचना मात्र से तरुण-तरुणियों के मन के कैनवास पर तथाकथित कल्पित बचत की सरसों लहलहा उठी है। ‘बौराया’ हुआ है बाजार और ग्राहक। उधर कवि-सखा की वेदना है कि वसंत अब नेपथ्य में है। उसकी आभा किसी विलायती संत की प्रणय गाथा के चलते धूमिल हो चुकी है।
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‘वैलेंटाइन डे’ की संज्ञा प्राप्त इस पर्व पर भावनाएं गौण, उपहार मुखर। अधखिली गुलाब की कलियां तक ’भाव’ दिखाती हैं बाजार में। अजब संयोग है यह ग्लोबल ‘प्रणय चतुर्दशी’(चौदह फरवरी) वसंत के आस-पास ही मंडराती है। वसंत से कहीं ज्यादा अब वैलेंटाइन डे से परिचित हैं युवा वर्ग।

 
झल्लाए अतीतजीवी कवि-सखा का निष्कर्ष है कि ओ बसंती पवन पागल गुनगुनाने का मजा बंद कमरों, मॉल में विचरने और उपहारों के अंबार में नहीं, प्रकृति के साथ है। पर इस अस्त-व्यस्त जिंदगी में न रोज मस्त रहने की फुर्सत और न गुंजाइश। कवि-मित्र को कालिदास के पीरियड वाला ऋतु संहार सूझ रहा है। सच्चाई यह है कि रंग दे वसंती चोला भी मिस्ड कॉल की गति प्राप्त है। हे प्रभु! प्रेम के इस निगोड़े प्रदर्शन का अंत करो।

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