{"_id":"5a6f1eb64f1c1b91268b7108","slug":"people-straying-from-gandhi-s-path","type":"story","status":"publish","title_hn":"गांधी के रास्ते से भटके हुए लोग","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
गांधी के रास्ते से भटके हुए लोग
अनिल प्रकाश जोशी
Updated Mon, 29 Jan 2018 06:46 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अनिल प्रकाश जोशी
गांधी ने देश की स्वतंत्रता के लिए जो लड़ाइयां लड़ीं, उनमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई तरह के आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही है, चाहे वह असहयोग आंदोलन हो या स्वराज और नमक सत्याग्रह हो या अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन। गांधीजी की इस लड़ाई के पीछे सबसे बड़ा तर्क व तंज था कि बिना हिंसा के भी अपनी बात मजबूती से रखी जा सकती है। गांधी की इस शैली को लेकर आंदोलन के कई साथी असहमत भी रहते थे, पर गांधी की इस विनम्र हठ के पीछे लड़ाइयों को जीतने के तरीके ने अपने तरह का इतिहास भी रचा है।
दुनियाभर में गांधीजी अपने अहिंसात्मक आंदोलनों के लिए जाने जाते रहे हैं और इन मौकों में जब कभी किन्हीं कारणों से हिंसा जगह बना लेती थी, तो गांधी अनशन पर बैठकर अपने साथियों को समझने के लिए मजबूर कर देते थे। यह सच भी है कि हिंसा के रास्ते इतिहास का रंग बदल देते हैं। और ऐसे हिंसात्मक आंदोलन समाज को भटका भी सकते हैं और तितर-बितर भी कर देते हैं, जबकि अहिंसा जोड़ने की ढृढ़ प्रवृत्ति पैदा करने का रास्ता है। गांधी की इस विराट सोच ने दुनिया में एक नई जगह बनाई और आज भी विरोध व असहमति की इस शैली ने दुनियाभर में कई तरह की सामाजिक पहलों को जन्म दिया है। ये चाहे ग्रीस हो फ्रांस हो वेनेजुएला हो इन तमाम देशों में और दुनिया में गांधी की यही अहिंसा वाली शैली थी, जिसने कई सामाजिक आंदोलनों को दिशा दी है।
अपने ही देश में देखें, तो आज भी कई आंदोलनों ने जो बड़ी जगह बनाई है, वह कहीं गांधी से ही प्रेरित हैं। अब चाहे हाल ही का अन्ना हजारे व अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो या मेधा पाटेकर का नर्मदा बचाओ या इरोम शर्मिला का आंदोलन, ये सब गांधी की सोच से जुड़े हुए आंदोलन रहे हैं। यह ही नहीं स्वतंत्रता के बाद अपने देश में कई राज्यों के गठन के पीछे अहिंसात्मक आंदोलनों की ही भूमिका रही है।
लेकिन हमने गांधी के विरोध की शैली को बदलने की कोशिश की है और हर दूसरे दिन विरोध का एक ऐसा रास्ता ईजाद कर लिया है, जो जनहित से ज्यादा स्वयं में निहित होता है। हम भूल गए गांधी के सारे आंदोलन राष्ट्र और जनहित के थे, उनमें स्वार्थ की कोई जगह नहीं थी। गांधी के वंशज आज उस दिशा को तोड़-मरोड़कर अपने हित में साधने में जुटे हैं। उदाहरण के लिए अपना देश हो या राज्य, हड़ताल एक ऐसा हथियार बन चुका है, जो सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार बैठा है। आज हालात ऐसे हैं कि तनख्वाह तो छोड़ो एरियर के लिए भी हड़ताल की जा सकती है।
नवोदित राज्य उत्तराखंड को ही देखिए पिछले सालों में 22 हजार के करीब हड़तालें हो चुकी हैं और ये सब हड़तालें उनके द्वारा की गईं हैं, जो किसी न किसी रूप में सरकारी सेवा से जुड़े हैं। यह प्रवृत्तियां निश्चित रूप से राज्य व देशव्यापी हैं। विरोध की राजनीतिक वजहें भी तलाश ली जाती हैं, जैसा कि फिल्म पद्मावत के विरोध में देखा जा सकता है, जिसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही धता बता दिया।
लोकतंत्र मात्र लोगों द्वारा सरकार चलाने का एक मंत्र ही नहीं होता, बल्कि सबकी भागीदारी समझदारी व दायित्वों का भी तंत्र होता है। इसे मात्र वोट देकर दायित्व और अपेक्षा दूसरों के कंधों में डालना नहीं समझना चाहिए, बल्कि अपने ही नफा नुकसान से जोड़कर भी देखना चाहिए।
गांधी के स्वराज का मतलब ही यही था। गांधी के अहिंसा के रास्ते में भी कई रोड़े थे, जिसे कई नेता नहीं स्वीकार कर पाते थे। पर गांधी की गहरी सोच व निष्ठा ही थी, जिसने अहिंसा के रास्ते देश को स्वतंत्रता दी। आज एक बार फिर गांधी को नए सिरे से समझने की कोशिश होनी चाहिए, खासतौर से तब जब हम राज्य राष्ट्र और जनहितों को धकेलकर अपने हितों को साध रहे हों।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
दुनियाभर में गांधीजी अपने अहिंसात्मक आंदोलनों के लिए जाने जाते रहे हैं और इन मौकों में जब कभी किन्हीं कारणों से हिंसा जगह बना लेती थी, तो गांधी अनशन पर बैठकर अपने साथियों को समझने के लिए मजबूर कर देते थे। यह सच भी है कि हिंसा के रास्ते इतिहास का रंग बदल देते हैं। और ऐसे हिंसात्मक आंदोलन समाज को भटका भी सकते हैं और तितर-बितर भी कर देते हैं, जबकि अहिंसा जोड़ने की ढृढ़ प्रवृत्ति पैदा करने का रास्ता है। गांधी की इस विराट सोच ने दुनिया में एक नई जगह बनाई और आज भी विरोध व असहमति की इस शैली ने दुनियाभर में कई तरह की सामाजिक पहलों को जन्म दिया है। ये चाहे ग्रीस हो फ्रांस हो वेनेजुएला हो इन तमाम देशों में और दुनिया में गांधी की यही अहिंसा वाली शैली थी, जिसने कई सामाजिक आंदोलनों को दिशा दी है।
अपने ही देश में देखें, तो आज भी कई आंदोलनों ने जो बड़ी जगह बनाई है, वह कहीं गांधी से ही प्रेरित हैं। अब चाहे हाल ही का अन्ना हजारे व अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो या मेधा पाटेकर का नर्मदा बचाओ या इरोम शर्मिला का आंदोलन, ये सब गांधी की सोच से जुड़े हुए आंदोलन रहे हैं। यह ही नहीं स्वतंत्रता के बाद अपने देश में कई राज्यों के गठन के पीछे अहिंसात्मक आंदोलनों की ही भूमिका रही है।
लेकिन हमने गांधी के विरोध की शैली को बदलने की कोशिश की है और हर दूसरे दिन विरोध का एक ऐसा रास्ता ईजाद कर लिया है, जो जनहित से ज्यादा स्वयं में निहित होता है। हम भूल गए गांधी के सारे आंदोलन राष्ट्र और जनहित के थे, उनमें स्वार्थ की कोई जगह नहीं थी। गांधी के वंशज आज उस दिशा को तोड़-मरोड़कर अपने हित में साधने में जुटे हैं। उदाहरण के लिए अपना देश हो या राज्य, हड़ताल एक ऐसा हथियार बन चुका है, जो सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार बैठा है। आज हालात ऐसे हैं कि तनख्वाह तो छोड़ो एरियर के लिए भी हड़ताल की जा सकती है।
नवोदित राज्य उत्तराखंड को ही देखिए पिछले सालों में 22 हजार के करीब हड़तालें हो चुकी हैं और ये सब हड़तालें उनके द्वारा की गईं हैं, जो किसी न किसी रूप में सरकारी सेवा से जुड़े हैं। यह प्रवृत्तियां निश्चित रूप से राज्य व देशव्यापी हैं। विरोध की राजनीतिक वजहें भी तलाश ली जाती हैं, जैसा कि फिल्म पद्मावत के विरोध में देखा जा सकता है, जिसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही धता बता दिया।
लोकतंत्र मात्र लोगों द्वारा सरकार चलाने का एक मंत्र ही नहीं होता, बल्कि सबकी भागीदारी समझदारी व दायित्वों का भी तंत्र होता है। इसे मात्र वोट देकर दायित्व और अपेक्षा दूसरों के कंधों में डालना नहीं समझना चाहिए, बल्कि अपने ही नफा नुकसान से जोड़कर भी देखना चाहिए।
गांधी के स्वराज का मतलब ही यही था। गांधी के अहिंसा के रास्ते में भी कई रोड़े थे, जिसे कई नेता नहीं स्वीकार कर पाते थे। पर गांधी की गहरी सोच व निष्ठा ही थी, जिसने अहिंसा के रास्ते देश को स्वतंत्रता दी। आज एक बार फिर गांधी को नए सिरे से समझने की कोशिश होनी चाहिए, खासतौर से तब जब हम राज्य राष्ट्र और जनहितों को धकेलकर अपने हितों को साध रहे हों।