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महामारी में झुग्गी बस्तियों का संघर्ष

Mon, 25 May 2020 12:22 AM IST
एडम औरबैक Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 25 May 2020 12:22 AM IST
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people of slum struggle in corona pandemic
झुग्गी -बस्ती - फोटो : पीटीआई

भारत की शहरी मलिन बस्तियों ने कोविड-19 के दौरान अपनी भंगुरता के कारण मीडिया का व्यापक ध्यान आकर्षित किया है। ये भीड़-भाड़ वाली, निम्न आय वाले लोगों की बस्तियां होती हैं, जिन्हें अक्सर अनियोजित तरीके से बसाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप संकीर्ण गली-मोहल्लों में झुग्गियों का फैलाव होता है। यहां के लोगों को अक्सर पानी और स्वच्छता की कमी से जूझना पड़ता है, और असुरक्षित आवासीय स्थिति का सामना करना पड़ता है। भारत के सख्त लॉकडाउन ने झुग्गी बस्तियों में आर्थिक संकट बढ़ा दिया है, क्योंकि यहां के अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जैसे दिहाड़ी मजदूर, फेरी वाले, घरेलू कामगार, ऑटोरिक्शा चालक आदि।


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परिवार चलाने के लिए ये रोजमर्रा की कमाई पर निर्भर हैं। सुस्त आर्थिक गतिविधि ने इनमें से अनेक परिवारों को अनिश्चितता की स्थिति में धकेल दिया है। यूएन हैबिटेट (संयुक्त राष्ट्र का एक कार्यक्रम) इन्हें स्वास्थ्य और आजीविका के लिए खतरा मानता है, 'कोविड-19 का असर गरीब और घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक विनाशकारी होगा, खासकर दुनिया भर की असंगठित और मलिन बस्तियों में रहनेवाले एक अरब लोगों के लिए।' शोधकर्ता और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में 'समुदाय संचालित समाधान' की जरूरत बता रही हैं।

मसलन, सोशल साइंस इन ह्यूमैनिटेरियन ऐक्शन रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड-19 से असंगठित शहरी बस्तियों में समूहों और उन नेताओं के जरिये निपटा जाए, जो अपनी बस्तियों को अच्छी तरह से जानते हैं और जिनके स्थानीय लोगों से अच्छे संपर्क हैं। इस तरह का बारीक जमीनी दृष्टिकोण मलिन बस्तियों में अनौपचारिक सामुदायिक प्रशासन के संदर्भ में एक समझ की मांग करते हैं। सवाल यह है कि भारत की झुग्गी बस्तियों के लोगों को उनकी सुरक्षा और भलाई की खातिर खतरों से निपटने के लिए कैसे संगठित किया जाता है।

इन बस्तियों के नेता कौन हैं और वायरस के प्रसार को धीमा करने और रोकथाम के उपायों से जुड़ी आर्थिक कठिनाइयां कम करने के लिए सरकारी एजेंसियां और नागरिक समाज संगठन उनके साथ किस हद तक भागीदारी कर सकते हैं? मेरी पुस्तक डिमांडिंग डेवलपमेंट : द पॉलिटिक्स ऑफ पब्लिक सर्विस प्रॉविजन इन इंडियाज अर्बन स्लम्स इस बात की पड़ताल करती है कि स्थानीय परिस्थितियों को सुधारने के लिए झुग्गीवासी कैसे संगठित होते हैं। भोपाल और जयपुर में दो वर्ष से ज्यादा समय तक फील्ड वर्क और सर्वे के बाद तैयार इस पुस्तक में झुग्गी बस्तियों के स्थानीय नेतृत्व के मजबूत स्वरूप और लोगों के सामूहिक कामकाज के तरीकों को दर्ज किया गया है।

भारत की मलिन बस्तियों में राजनीति के केंद्र में बस्ती या झुग्गियों के नेता होते हैं। ये अनौपचारिक नेता होते हैं, जो झुग्गियों में रहते हैं और अपने पड़ोसियों की तरह ही निष्कासन और पिछड़ेपन के जोखिमों का सामना करते हैं। ये नेता सामान्य निवासियों के बीच से ही उभरते हैं, क्योंकि उनके पास वे विशेषताएं होती हैं, जो उन्हें शहर में काम करने की अनुमति देती हैं। साक्षरता और कुछ औपचारिक शिक्षा दो ऐसी विशेषताएं हैं, जो झुग्गी बस्ती के नेताओं को याचिकाएं लिखने और सरकारी संस्थानों तक पहुंच बनाने में सक्षम बनाती हैं।

मैंने अपने अध्ययन में पाया कि अधिकांश झुग्गी बस्तियों में कई-कई नेता होते हैं, जो झुग्गी वासियों को अपने खेमे में लाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। ये झुग्गीवासियों के लिए कई तरह के काम करते हैं। इनमें सबसे आम है, लोगों के लिए राशन कार्ड बनवाना और पक्की सड़कों, पानी के नलों, नालियों और स्ट्रीट लाइट्स जैसी सार्वजनिक सेवाओं के लिए अधिकारियों को आवेदन पत्र लिखना।

वे झगड़े निपटाने और बेदखली के खिलाफ स्थानीय लोगों को संगठित करने के अलावा गरीबों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी भी देते हैं। भारत की मलिन बस्तियों में अनौपचारिक नेतृत्व टिकाऊ और सक्रिय हैं। झुग्गी बस्तियों के नेता लोगों की समस्याओं का समाधान करने में नियमित रूप से संलग्न रहते हैं और पार्टी संगठनों और संघों के भीतर काम करते हैं।

महामारी के खिलाफ सामुदायिक प्रतिक्रिया में उनकी हिस्सेदारी उनके जमीनी नेतृत्व पर टिकी है। सामान्य दिनों में झुग्गी बस्ती के लोग अक्सर राज्य सत्ता को खुद से जोड़ते हैं, क्योंकि उनके पीछे लोकशक्ति होती है। स्थानीय लोगों का यह समूह अपनी मांगों की अनदेखी होने पर मतदाता के रूप में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करता है या सड़कों पर प्रदर्शन करता है। बेशक लॉकडाउन में सामूहिक कार्रवाई के ये रूप हतोत्साहित हुए हैं।

विगत पांच अप्रैल को जयपुर के एक झुग्गी बस्ती के नेता ने फोन पर मुझे बताया कि महामारी के दौरान वह और अन्य स्थानीय नेताओं का समूह झुग्गी वासियों को भोजन मुहैया करा रहे हैं। वे लगातार अपने पार्षद से राशन उपलब्ध कराने के लिए फोन पर संपर्क में रहते हैं। इसके अलावा वे सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व के बारे में भी लोगों को बताते हैं। उन्होंने कहा कि हम सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की कोशिश करते हैं। हम यह भी देखते हैं कि पैसे के अभाव में कौन लोग भोजन के लिए जूझ रहे हैं।

हालांकि झुग्गी के सभी नेताओं की छवि इतनी अच्छी नहीं होती। लोगों के प्रति उनकी जवाबदेही जाति, लिंग और धर्म से प्रेरित भी हो सकती है। पार्टी कार्यकर्ता के रूप में वे चुनावी राजनीति से भी प्रभावित हो सकते हैं। सार्वजनिक संसाधनों के वितरण में वे अक्सर झुग्गी नेता होने के चलते फायदा उठाते हैं।

फिर भी झुग्गी बस्ती के नेता स्थानीय स्तर पर हस्तक्षेप करते समय सरकारी एजेंसियों और नागरिक संगठनों के लिए प्रभावशाली, और महत्वपूर्ण साबित होंगे। उनकी भूमिका और गतिविधियों को समझना वायरस के प्रसार को धीमा करने और आने वाले हफ्तों में आर्थिक संकट को कम करने के लिए समुदाय संचालित दृष्टिकोणों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

-लेखक अमेरिकी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल सर्विस में सहायक प्रोफेसर हैं।

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