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विमर्श: पितृपक्ष में तर्पण के बाद लोग पितरों को भूल जाते हैं, वैसा ही हाल हिंदी का; छोड़नी होगी प्रवृत्ति

Sat, 12 Sep 2026 10:21 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Sat, 12 Sep 2026 10:21 AM IST
सार

जैसे पितृपक्ष में तर्पण के बाद लोग पितरों को भूल जाते हैं, वैसा ही हाल हिंदी का हिंदी पखवाड़े व हिंदी माह के बाद होने लगता है। जरूरत इसे कर्मकांडी प्रवृत्ति से बाहर निकालने की है।

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People forget ancestors after Tarpan ritual during Pitru Paksha same fate of Hindi tendency must be abandoned
हिंदी दिवस 2026 - फोटो : Ai

विस्तार

एकरस कार्यशैली सरकारी दफ्तरों की पहचान मानी जाती है। लेकिन, सितंबर आते ही इस एकरसता में हिंदी दिवस की उत्सवधर्मिता का तड़का लग जाता है। यह संयोग ही है कि यह सरकारी पर्व लगभग उसी समय आता है, जब सनातन परंपरा अपने पितरों के तर्पण के कर्मकांड में जुटी होती है। सांविधानिक बाध्यता के चलते न तो हिंदी को लेकर यह कर्मकांड थमने वाला है और न ही उसकी कामयाबी की पड़ताल करने वाली चिंताएं।

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वैसे तो हिंदी उसी दिन से चुनौतियों का सामना कर रही है, जबसे उसे राजभाषा बनाने की चर्चा शुरू हुई।

गैर-हिंदी भाषी प्रदेश, विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में हिंदी को साम्राज्यवादी बताना नई बात नहीं है। केरल की छवि हिंदी विरोधी नहीं रही है, लेकिन हाल ही में फरीदाबाद में महिला आयोग की एक कार्यशाला का जिस तरह केरल की महिला विधायकों ने बहिष्कार किया, वैसा पहले नहीं दिखा। महिला विधायकों का आरोप था कि कार्यशाला के ज्यादातर सत्र हिंदी में आयोजित किए गए थे, जिसे समझना उनके लिए मुश्किल था। इन हिंदी विरोधी सुरों में लोकमानस की आवाज कम, सियासी सुर ज्यादा शामिल हैं।
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इनमें गैर-हिंदी भाषी राज्यों के बौद्धिक और पत्रकार भी शामिल नजर आते हैं। इन्हीं लोगों में शशि थरूर जैसे व्यक्ति भी शामिल हैं, जिन्हें अंग्रेजी साम्राज्यवाद का प्रतीक नहीं लगती, अलबत्ता हिंदी सहकारी संघवाद के विरोध का हथियार नजर आती है। कभी सहकारी संघवाद के उल्लंघन के बहाने, तो कभी साम्राज्यवादी नीति के बहाने अब राजनीति हिंदी का विरोध कर रही है। इस सियासी प्रवृत्ति का कम से कम राष्ट्रीय पार्टियों को तो विरोध करना चाहिए, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक हितों के चलते चुप्पी साध रखी है।
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इन संदर्भों में सबसे बड़ी भूमिका संसदीय राजभाषा समिति की नजर आती है। इस समिति में दोनों सदनों से गैर-हिंदी भाषी सांसदों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। इसमें उन सांसदों को भी शामिल किया जा सकता है, जो हिंदी विरोधी आवाज उठाते रहे हैं। इसका असर यह होगा कि देर-सवेर हिंदी विरोधी सांसदों की आवाज भी मंद पड़ने लगेगी। बहुभाषिक देश के लिए हिंदी की महत्ता क्या है, इसे वे समझने लगेंगे। फिर गैर-हिंदी भाषी सदस्य भी हिंदी पर सवाल उठाने से हिचकने लगेंगे। संसदीय राजभाषा समिति को उच्चाधिकार हासिल है, इसलिए उसे राजनीतिक नजरिये से सोचना होगा कि हिंदी की उन राज्यों में स्वीकार्यता कैसे बढ़े, जहां से विरोध की आवाजें उठ रही हैं। समिति को इन सियासी आवाजों को तार्किक जवाब भी देना होगा और उनके सवालों को ठंडे मन से सुलझाना भी होगा।


जैसे पितृपक्ष में तर्पण के बाद लोग अपने पितरों को भूल जाते हैं, कुछ ऐसा ही हाल हिंदी का हिंदी पखवाड़े और हिंदी माह के बाद सरकारी दफ्तरों में होने लगता है। हिंदी के बहाने सालाना उत्सवों से भले ही कुछ कर्मचारियों के अंदर उत्साह जगता हो, जमीनी स्तर पर हिंदी के प्रति सरकारी दफ्तरों के नजरिये में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। जरूरी है कि हिंदी को कर्मकांड से निकाला जाए और उसके विरोध को राजनीति का हथियार बनाने वाली सियासी ताकतों को तार्किक जवाब दिया जाए। हिंदी के भविष्य के लिए यह महत्वपूर्ण होगा।

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