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यह आवाज अब कहीं गुम नहीं हो सकती
पत्रलेखा चटर्जी/वरिष्ठ पत्रकार
Updated Sun, 01 Dec 2013 06:49 AM IST
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अगर गुजरा हफ्ता किसी ने बियाबान गुफा में न गुजारा, हो तो इसकी कोई संभावना नहीं हो सकती कि उसने तरुण तेजपाल की गाथा न सुनी हो। वजह यह है कि तहलका पत्रिका के संपादक और संस्थापक तेजपाल से जुड़ी कहानियां आज अखबारों, टेलीविजन चैनलों और इंटरनेट पर सुर्खियों में हैं। दरअसल एक युवा महिला सहकर्मी ने, जो कि उनकी पुत्री की दोस्त भी हैं, उन पर यौन दुराचार का संगीन आरोप लगाया है। 2013 के आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम के तहत उनका यह जुर्म बलात्कार के बराबर है।
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पिछले दिनों तेजपाल ने गोवा में एक थिंक फेस्टिवल का आयोजन किया था। उसी दौरान होटल की एक लिफ्ट में उनसे यह अपराध हुआ। अभी यह कह पाना जरा मुश्किल है कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होगी। लेकिन इसमें संदेह नहीं है कि यह तेजपाल और तहलका, दोनों के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। दोनों की विश्वसनीयता और अन्याय से लड़ने वाली छवि चूर-चूर हो गई है। घटनाक्रम अब चाहे जिधर भी करवट ले, लेकिन यह कहानी जल्दी खत्म होने वाली नहीं है।
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गोवा पुलिस ने तेजपाल पर आपराधिक मामला दर्ज कर लिया है। अब कानून अपनी राह चलेगा। आने वाले हफ्तों में पूरे देश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज होंगी। ऐसे में विचारों और शब्दों की लड़ाई के साथ एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने जैसी प्रवृत्तियां उभरेंगी।
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लेकिन तेजपाल की इस कहानी को केवल उनके व्यक्तित्व या 'उनका क्या होगा' के संदर्भों में देखना बेहद संकीर्ण होगा। इस मुद्दे पर पिछले हफ्ते से हो रही बहस हम सभी को महत्वपूर्ण सीख देती है। पहला सबक यही है कि भले ही किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में कितना ही प्रतिष्ठित मुकाम हासिल कर लिया हो, लेकिन खुद को भगवान मान लेने की उसकी प्रवृत्ति ठीक नहीं कही जा सकती। तेजपाल पहले इंसान नहीं हैं, जिनका व्यक्तिगत जीवन उनके सार्वजनिक शब्दाडंबर से मेल नहीं खाता। लेकिन आज टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया की तेज दुनिया में कुछ भी छिपा पाना असंभव है।
कुछ समय पहले तक समाज का शक्तिशाली तबका अपनी ताकत का उपयोग कर अपने लिए अहितकर मामलों को रफा-दफा कर देता था। पत्रकारिता का यह अघोषित नियम हुआ करता था कि कोई भी अपने सहकर्मियों पर कीचड़ नहीं उछालेगा। लेकिन आज दौर बदल चुका है। आज मुख्यधारा का मीडिया अगर किसी मुद्दे को दबाना भी चाहता हो, तो सोशल मीडिया के चलते यह संभव नहीं हो पाता। इसीलिए पाखंडियों का आज अपने किए अपराधों से बच पाना मुश्किल हो चला है। अगर बात तेजपाल की करें, तो उन्होंने न सिर्फ एक घृणित अपराध किया है, बल्कि अपने दोहरे मापदंडों की वजह से भी आज वह कठघरे में खड़े हैं। अपने सार्वजनिक जीवन में वह जो दिखते हैं, निजी जीवन में उनका आचरण उसके ठीक विपरीत है।
तेजपाल के सच का सामने आना कई मायनों में प्रेरणादायक भी है। पीड़िता बताती है कि तेजपाल का उनके साथ ऐसा बर्ताव करना इसलिए भी ज्यादा दुखदायी है, क्योंकि वह अपने व्यावसायिक और निजी जीवन में उन्हें अपना अभिभावक मानती थी और उन पर पिता की तरह भरोसा करती थी। पीड़िता का इस तरह खुलकर सामने आना इसका सुबूत है कि अगर आप खुद को कमजोर न मानते हों, तो दुनिया की कोई ताकत आपको कमजोर नहीं बना सकती। पीड़िता के घर में बीमार पिता हैं और उसका लालन-पालन उनकी माता ने अपनी कमाई से किया।
वह कहती हैं, 'तेजपाल जहां अपनी संपत्ति, प्रभाव और ताकत के लिए लड़ रहे हैं, वहीं मैं सच्चाई और यह साबित करने के लिए संघर्षरत हूं कि मेरा शरीर मेरे नियोक्ता की जागीर नहीं है।' वह आगे कहती हैं, 'अपनी शिकायत दर्ज कर, मैंने न सिर्फ अपने उस काम से हाथ धोया है, जो मेरे जीवन का प्यार था, बल्कि इससे मेरी आर्थिक सुरक्षा और स्वतंत्रता भी दांव पर लग चुकी है। मुझ पर मनगढ़ंत आरोप लगाए जा रहे हैं। यह लड़ाई मेरे लिए आसान नहीं होगी।'
यह सच है कि यह संघर्ष आसान नहीं है। लेकिन इस महिला के अनुकरणीय साहस और विचारों की स्पष्टता से हर कामकाजी महिला को प्रेरणा मिलेगी। साथ ही, उसकी बहादुरी से पूरे देश को यह उम्मीद मिली है कि युवा भारत को हमेशा धमकाकर नहीं रखा जा सकता। यह वर्ग बेशक अब तक समाज के तथाकथित 'सम्माननीय लोगों' की श्रेणी में नहीं पहुंच सका है, लेकिन इसके पास खोने को कुछ नहीं है। अब इसकी आवाज अंधेरों में नहीं खो सकती। पूरे देश से जिस तरह इस युवा महिला को समर्थन मिल रहा है, उससे पता चलता है कि देश बदल रहा है। पूर्व मान्यताओं को चुनौतियां मिलने लगी हैं। चाहे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हों या नामी पत्रकार या कोई स्वघोषित भगवान, इस सच को झुठला नहीं सकता।