कचरे के जहर से कौन लड़ेगा?

पत्रलेखा चटर्जी/वरिष्ठ पत्रकार Updated Mon, 25 Nov 2013 07:44 PM IST
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नैपल्स दक्षिणी इटली का सबसे बड़ा शहर है। इस बेहद खूबसूरत शहर का पुराना इतिहास है। इसके पीछे मशहूर ज्वालामुखी अवशेष माउंट वेसुवियस है। तकरीबन 2000 साल पहले जब वेसुवियस ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था, तो इससे दो रोमन कस्बे पोंपेई और हरकुलेनियम नष्ट हो गए थे। यूरोप में यह एकमात्र ज्वालामुखी अवशेष है।
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लेकिन नैपल्स के लोग वेसुवियस विस्फोट के बजाय जहरीले कचरे को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इससे वहां की जमीन में जहर फैल रहा है। प्रोटेक्शन ऑफ नेचर पर 10वीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया फोरम में शामिल होने के लिए नवंबर के शुरू में मैं नैपल्स में थी। इसे रोम के एक एनजीओ ग्रीनएकॉर्ड ने आयोजित किया था। कार्यक्रम का विषय था- 'अपशिष्ट के बगैर भविष्य।'
बढ़ते कचरे की समस्या वैश्विक है। हर कोई अपशिष्ट पदार्थों को कम करने, पुनर्चक्रित करने और दोबारा प्रयोग करने के बारे में बात कर रहा है। लेकिन अगर अपशिष्ट जहरीला हो जाए तो क्या होगा? या फिर कूड़े के ढेर को जलाने से जहर का उत्सर्जन हो तो क्या किया जा सकता है?
सम्मेलन के दौरान 'इकोमाफिया' की गतिविधियां एक गंभीर प्रश्न के रूप में सामने आईं। अपशिष्ट के कारोबार के अपराधीकरण का वर्णन करने के िलए इटली के एक पर्यावरणीय संगठन लेगामबीनटे ने 1994 में इस शब्द को गढ़ा था। इकोमाफिया उस समय खबरों में आए जब इटली की सीनेट ने नैपल्स के नजदीक कैंसर के कई मामलों की जांच की। दरअसल, कैंसर के ये मामले एक स्थानीय माफिया द्वारा अपशिष्ट पदार्थों के जमावड़े के कारण उत्पन्न हुए।

दो दशक पहले चिकित्सकों ने ध्यान दिया था कि नैपल्स के आसपास कैंसर के मामलों में इजाफा हुआ है।  तब से लेकर अब तक महिलाओं और पुरुषों दोनों में ट्यूमर के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। सवाल यह है कि ये चीजें शासन के सामने कैसे आईं? इटली के एक प्रमुख पर्यावरणविद और संसद में पर्यावरण आयोग के अध्यक्ष एरमेटे रीलाक्की कहते हैं, '1990 के मध्य में जब हमने कचरे के अवैध ढेर की वजह से जमीन के जहरीले होने के बारे में चर्चा करने पर जोर दिया, तो लोग और पत्रकार हमें कुछ इस तरह देखते थे जैसे हम लोग किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हों। केवल दो टेलीविजन चैनल वाले नैपल्स के पास नाटो सैनिक अड्डे के नजदीक जमीन की हालत देखने के लिए हमारे साथ चलने के लिए तैयार हुए।

इसमें कोई शक नहीं कि 2006 से 2010 के बीच बनाए गए कानूनों के चलते हालात में तब्दीली हो रही है। इटली में इकोमाफिया के खिलाफ सरकारी वकील फ्रांको रॉबर्टी कहते हैं, 'पिछले साल माफिया-विरोधी आयोग और राज्य वानिकी समूह के बीच सहयोग की सहमति बनने के बाद हमें संदिग्ध ठिकानों की जांच और हस्तक्षेप की अनुमति हासिल हो गई है। लेकिन यह समस्या काफी बड़ी है। संगठित अपराध बढ़े हैं और विदेश में अपशिष्ट को भेजने के लिए वैश्विक नेटवर्क बन चुका है।
 चीन, पूर्वी यूरोप और अफ्रीका के कई हिस्से सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। सम्मेलन के दौरान तो यह भी सुनाई दिया कि विंड फार्म्स, बायोमास और सौर ऊर्जा में निवेश करके ये आपराधिक नेटवर्क नई हरित अर्थव्यवस्था बाजार में भी घुसपैठ कर रहे हैं।

लेकिन अच्छी बात यह है कि लोग जागरूक हुए हैं। पिछले सप्ताह नैपल्स की गलियों में हजारों लोग उतरे जो जहरीली अपशिष्ट आपदा से निपटने के लिए अधिक सार्वजनिक कार्रवाई की मांग कर रहे थे।  यह संकट केवल इटली के लिए ही नहीं है। भारत भी विभिन्न तरह से जहरीले अपशिष्टों की भयानक समस्या से जूझ रहा है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, लखनऊ में 2012 में दीवाली पर पटाखों की वजह से 1,600 मीट्रिक टन अपशिष्ट उत्पन्न हुआ जिसमें नुकसानदेय पदार्थ और रसायन थे। दीवाली के बाद इन्हें या तो नदी में या फिर अपशिष्ट भराव क्षेत्र में फेंक दिया जाता है जो कि हमारे पारितंत्र को बुरी तरह प्रभावित करता है।

अपशिष्ट की जहरीली धातु मिट्टी और जल के जरिये खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाती है। लेकिन इसको लेकर कौन आवाज उठा रहा है? गुड़गांव का उदाहरण ले लीजिए। हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक शहर के अस्पतालों और नर्सिंग होम्स से निकलने वाले जहरीले अपशिष्टों को ठिकाने लगाने संबंधी वहां कोई दिशानिर्देश और नीति नहीं है। यह जानकारी सूचना के अधिकार के तहत सामने आई है। भारत में रेडियोधर्मी अपशिष्ट, चिकित्सा अपशिष्ट, जहरीले अपशिष्ट, औद्योगिक अपशिष्ट और परिवार संबंधी अपशिष्ट को ठिकाने लगाने के अलग-अलग कानून हैं। लेकिन वे पूरे देश में एक तरह से लागू नहीं होते।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोगों में इस खतरे को लेकर जागरूकता भी नहीं है। अगर एक ही अपशिष्ट भराव क्षेत्र में घर के कचरे और अन्य जहरीले अपशिष्ट दोनों को डाल दिया जाएगा, तो इससे पर्यावरण और सेहत संबंधी गंभीर खतरे उत्पन्न हो जाते हैं।  लेकिन अपशिष्टों को ठीक तरह से अलग-अलग न कर पाने के कारण पहले भी भारत के कई शहरों में अपशिष्ट भराव क्षेत्र में कैडमियम, क्रोमियम या मर्करी जैसे खतरनाक रसायन डाले जाते रहे हैं। कई बार तो घरों में इस्तेमाल होने वाले पानी में भी इन्हें पाया जा सकता है।

यहां तक कि घरों की नींव और दीवारों के ऊपर भी नजर आ सकते हैं। यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर हमारे राजनेताओं का ध्यान जाए, क्योंकि मतदाता इसको लेकर शोर नहीं मचा रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर शोर मचाना मददगार साबित हो सकता है, खासकर तब जबकि लोकसभा के चुनाव अब नजदीक हैं।
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