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एक साइकिल जो बता रही है रास्ता

Sat, 19 Oct 2013 08:30 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी/वरिष्ठ पत्रकार
पत्रलेखा चटर्जी/वरिष्ठ पत्रकार Updated Sat, 19 Oct 2013 08:30 PM IST
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मशहूर अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने एक बार कहा था, ‘आज से बीस वर्ष बाद आपको निराशा उन कामों पर नहीं होगी, जो आपने किए, बल्कि उन चीजों पर होगी, जो आप नहीं कर पाए। इसलिए उदासीनता और सुरक्षा की चाह का दामन छोड़कर, अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़िए।’ हम में से ज्यादातर लोग बेशक इस कथन से सहमत होंगे, लेकिन कुछ ही होंगे, जो इसे अपने जीवन में उतारने की हिम्मत दिखा पाएंगे।

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आज जबकि अपने देश में किसी न किसी स्तर पर चारों ओर निराशा पसरी हुई है, छोटी-छोटी प्रेरणाएं जरूरी बन जाती हैं। यह प्रेरणा ऐसे साधारण पुरुषों और महिलाओं की कहानियों के रूप में भी हो सकती है, जिन्होंने अपने सपनों की दिशा में आगे बढ़ने की हिम्मत दिखाई और उन्हें पूरा भी किया। पिछले हफ्ते इंटरनेट पर मैंने ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी पढ़ी।
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यह कहानी एक ऐसे भारतीय डॉक्टर की है, जो देश में लौटकर एक विशेष वजह से पूरे देश में साइकिल से भ्रमण कर रहा है। यह हैं डॉ. उन्नी करुणाकर, जो गैर-लाभकारी संगठन मेडिसिन सेंस फ्रंटियर्स (एमएसएफ) या डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। एमएसएफ एक मानवतावादी संगठन है, जो 70 से ज्यादा देशों के संकटग्रस्त लोगों को स्वास्थ्य और मेडिकल प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध कराता है। करुणाकर मूलतः केरल के एक छोटे से शहर अंबालापुझा से ताल्लुक रखते हैं। कर्नाटक के कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज से उन्होंने मेडिकल की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।
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1993 में उच्च अध्ययन के लिए उन्होंने विदेश का रुख किया। 1995 से करुणाकर एमएसएफ से जुड़े हुए हैं। उन्होंने इथियोपिया में एक तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने अजरबैजान, ब्राजील और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में एमएसएफ कार्यक्रमों के लिए चिकित्सा समन्वयक की भूमिका निभाई। बाद में वह दुनिया के सर्वाधिक वंचित लोगों को जीवन रक्षक दवाएं उपलब्ध कराने के एमएसएफ के अभियान के चिकित्सा निदेशक भी बने। 2010 में वह एमएसएफ के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। पिछले महीने ही उनका तीन वर्षीय कार्यकाल खत्म हुआ है।

49 वर्ष के हो चुके करुणाकर ने अपनी साइकिल से कश्मीर के श्रीनगर से केरल के तिरुवनंतपुरम तक की 5,000 किलोमीटर से ज्यादा दूरी की यात्रा शुरू की है। इस दौरान वह 10 राज्यों के तकरीबन 64 शहरों, कस्बों और गांवों से गुजरेंगे और रास्ते में रुक-रुककर मेडिकल विद्यार्थियों से स्वास्थ्य और मानवता पर बातचीत करने के अलावा अपने दो दशकों के मेडिकल अनुभव को भी साझा करेंगे। इस दौरान वह एमएसएफ के लिए फंड भी इकट्ठा करेंगे। करुणाकर बताते हैं कि उन्हें साइकिल चलाना बहुत अच्छा लगता है। इससे पहले 1988 में जब वह भारत में चिकित्सा प्रशिक्षु थे, उन्होंने साइकिल से दिल्ली से लेह और श्रीनगर तक और फिर दिल्ली लौटने की यात्रा की थी। दरअसल, मेडिकल और मानवतावादी उद्देश्यों से पूरी दुनिया में घूमने के दौरान ही उन्होंने भारत में एक सिरे से दूसरे सिरे तक साइकिल से यात्रा करने का सपना देखा था।

तब से 25 वर्ष बाद उनका यह सपना पूरा हो रहा है। भारत की पुनः खोज करने वाली करुणाकर की इस यात्रा में उनका साथ देने और भारत जैसे तमाम देशों में एमएसएफ के मिशनों के लिए फंड इकट्ठा करने के लिए दूसरे साइकिलिस्ट भी उनका साथ देंगे। ये पंक्तियां लिखे जाने के वक्त तक  कुल 5000 किलोमीटर की अपनी यात्रा में से वह 294  किलोमीटर की यात्रा कर चुके थे। उनकी इस प्रेरणादायक कहानी के पीछे एक सामान्य, लेकिन अद्भुत सच छिपा हुआ है। आखिर कितने लोग होंगे, जो एक महान उद्देश्य के लिए अपनी नौकरी को दांव पर लगाकर पूरे देश की साइकिल यात्रा करने का फैसला करेंगे। डॉ. करुणाकर की कहानी तो सिर्फ एक उदाहरण है।


सच तो यह है कि हम में से हर एक व्यक्ति थोड़ा समय अपने सपने की खोज में लगा सकता है, जहां एक नई दुनिया उसका इंतजार कर रही है। ऐसे क्षणों से ही प्रेरणा का उदय होता है। यह प्रेरणा ही हमारे भीतर नई संभावनाएं पैदा करती है और ये संभावनाएं ही हमें जीवन के सामान्य अनुभवों और सीमाओं से आगे बढ़ने के लिए जरूरी उत्साह देती हैं। इसी उत्साह से लबरेज डॉ. करुणाकर चिकित्सा के विद्यार्थियों को यह सीख देते हैं कि स्वयं को मानवतावादी साबित करने के लिए विमान से अफ्रीका जाने की जरूरत नहीं है। जरूरत सिर्फ इसकी है कि अपने चारों ओर समाज में जो कुछ भी हो रहा है, उसके प्रति सचेत रहते हुए अपना योगदान देने के लिए हरदम तैयार रहा जाए।

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