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दया का रास्ता या हिंसा का
शिवकुमार गोयल
Updated Sat, 09 Feb 2013 01:01 AM IST
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हमारे नीतिशास्त्रों में कई ऐसी कहानियां हैं, जो बताती है कि लोगों को दया धर्म का निर्वहन हर वक्त करना चाहिए। जो व्यक्ति दयावान नहीं होता और हमेशा क्रूर व्यवहार करता रहता है, उसे इहलोक के साथ-साथ परलोक में भी घोर कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसी से जुड़ा एक प्रसंग राजा राखेगार का है। वह शिकार के शौकीन थे। एक दिन वह अपने राज्य जूनागढ़ के जंगलों में शिकार खेलने निकले। एक झाड़ी में उन्होंने दो खरगोशों को बैठे देखा।
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एक ही गोली से उन्होंने दोनों को मार गिराया और उन्हें लेकर राजमहल की ओर लौटने लगे। अचानक वह रास्ता भूल गए। चलते-चलते उन्हें एक कुटिया दिखाई दी। वह वहां पहुंचे। उन्होंने एक हाथ में मरे हुए खरगोशों को उठा रखा था। कुटिया में साधु को देखकर उन्होंने प्रणाम किया। बोले, महाराज, मैं रास्ता भटक गया हूं। कृपया मुझे जूनागढ़ का रास्ता बताइए।
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साधु ने कहा, बेटा, मैं दो ही रास्ते जानता हूं। एक है दया का, जो स्वर्ग की ओर जाता है और दूसरा हिंसा का, जो नरक की ओर जाता है। दोनों में से जो अच्छा लगे, पकड़ लो। राजा समझ गए कि उन्होंने निर्दोष खरगोशों की हत्या करके घोर पाप किया है। उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। वह तत्क्षण साधु के चरणों में गिर गए और जीव-हिंसा न करने का संकल्प लिया। साधु ने उन्हें गले से लगा लिया।
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