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पेटेंट कानून को मानवीय चेहरा देना होगा
भारत डोगरा
Updated Fri, 17 Jan 2014 07:56 PM IST
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वर्ष 1996 और 2003 के बीच अफ्रीका में 90 लाख से अधिक लोग एड्स की बीमारी से मारे गए। इनमें से अधिकांश लोग इस कारण नहीं बचाए जा सके, क्योंकि उन्हें जीवन-रक्षक दवा नहीं मिली। हालांकि एड्स के निश्चित इलाज वाली प्रामाणिक दवा नहीं है। पर ऐसी दवाएं उस समय भी उपलब्ध थीं, जो एड्स प्रभावित व्यक्ति को काफी ठीक हालत में जीवन निर्वाह करने लायक बना देती हैं।
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सवाल यह है कि ये दवाएं अफ्रीका के मरीजों को क्यों नहीं मिलीं। 90 लाख से अधिक लोगों का जीवन क्यों नहीं बचाया जा सका? इसका मुख्य कारण यह था कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो दवाएं बेच रही थीं, उसमें मुनाफा आश्चर्यजनक हद तक अधिक था। ये कंपनियां एक मरीज से दवा की सालाना कीमत बारह से पंद्रह हजार डॉलर वसूल रही थीं। जबकि इन दवाओं को इससे तीन से पांच प्रतिशत तक की कीमत पर उपलब्ध करवाना संभव था। एक भारतीय कंपनी ने सालाना 350 डॉलर की कीमत पर उचित गुणवत्ता की दवा उपलब्ध करवाने की पेशकश भी की। इसकी गुणवत्ता को विश्व स्तर पर मान्यता भी मिली। इसके बावजूद यह वैकल्पिक सस्ती दवा अफ्रीकी मरीजों तक वर्षों तक नहीं पहुंच पाई। बहुत विरोध-प्रदर्शन व स्थानीय सरकारों के प्रयासों के बाद जब यह दवा अफ्रीका पहुंची, तब तक लाखों मरीज मर चुके थे।
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यह स्तब्ध कर देने वाला उदाहरण है कि मोटे मुनाफे के लालच में बहुराष्ट्रीय कंपनियां किस हद तक जीवन-रक्षा के मूल उद्देश्य से पीछे हट सकती हैं। इन कंपनियों ने इस आधार पर सस्ती दवाओं को अफ्रीका के कुछ देशों में पहुंचने नहीं दिया, क्योंकि वहां प्रचलित पेटेंट कानून उन्हें इन महंगी दवाओं को बेचने का एकाधिकार देता था। दूसरी ओर, भारत में एड्स की सस्ती दवा का उत्पादन इस कारण संभव हुआ, क्योंकि उस समय यहां का पेटेंट कानून राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम था। भारत में पेटेंट कानून उत्पाद पर पेटेंट नहीं देता था, यानी कुछ दूसरे तौर-तरीके से सस्ती दवाओं का उत्पादन संभव था।
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पेटेंट कानून की इस विशेषता के कारण ही भारतीय कंपनी डंके की चोट पर सस्ती दवाओं के उत्पादन की घोषणा कर सकी। उसे कानूनी उलझन का भी सामना नहीं करना पड़ा। पर विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही भारत को पेटेंट कानूनों में ऐसे बदलाव करने पड़े, जिससे मोटे मुनाफे वाले स्वार्थों को अंगूठा दिखाकर वह सस्ती दवा का उत्पादन नहीं कर सकेगा। इससे क्षति सिर्फ हमें नहीं, विश्व के उन तमाम मरीजों को होगी, जिन्हें भारत से सस्ती जीवन रक्षक दवा प्राप्त हो जाती थी।
हमें चाहिए था कि हम उसी समय अपने पेटेंट कानून को पहले की तरह राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की मजबूती देने के लिए प्रयास करते। इसके लिए अपने देश में जन संगठनों ने दबाव बनाया भी था। इसका कुछ अच्छा नतीजा यह आया कि कुछ ऐसे प्रावधान आज भी पेटेंट कानून में मौजूद हैं, जिनसे मरीजों के हितों की रक्षा हो सकती है। मसलन, जब कंपनियां किसी दवा के पेटेंट को उसकी अवधि पूरी होने के बाद भी उसमें थोड़ा-बहुत बदलाव कर बढ़ाना चाहती हैं, तो उनकी राह में कानूनी बाधा आ सकती है। ल्यूकेमिया से रक्षा करने वाली दवा ग्लीवेक के संदर्भ में एक लंबी कानूनी लड़ाई भारत में लड़ी गई, तो मरीजों के हितों की रक्षा इस आधार पर ही हो सका कि पेटेंट कानून में थोड़े-बहुत सही प्रावधान बचे हैं।
लेकिन केवल इसी से काम चलने वाला नहीं है। आने वाले समय में पेटेंट कानून को मरीजों के हितों की रक्षा व सस्ती दवाओं की उपलब्धि के और अनुकूल बनाना होगा। इसके लिए विश्व व्यापार संगठन में संघर्ष करना होगा और अधिकतम गरीब व विकासशील देशों को अपने पक्ष में करना होगा। मरीजों के हकों के अतिरिक्त किसानों के बीज अधिकारों की दृष्टि से भी पेटेंट कानून में सुधार जरूरी है।
इसका अर्थ यह नहीं कि जिसने किसी नई दवा की खोज की है, उसे कोई विशेष लाभ नहीं मिलेगा। एक दवा का उत्पादन जो भी करे, वह इसकी खोज करने वाले को कुछ रॉयल्टी दे सकते हैं। इससे सस्ती दवाओं के उत्पादन की राह खुली रहेगी। हम मानवता के पक्षधरों को यह कोशिश तो करनी ही होगी कि अफ्रीका जैसी दुखद घटना दोबारा न हो।